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अथर्ववेद के काण्ड - 2 के सूक्त 36 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 36/ मन्त्र 4
    ऋषिः - पतिवेदनः देवता - इन्द्रः छन्दः - त्रिष्टुप् सूक्तम् - पतिवेदन सूक्त
    83

    यथा॑ख॒रो म॑घवं॒श्चारु॑रे॒ष प्रि॒यो मृ॒गाणां॑ सु॒षदा॑ ब॒भूव॑। ए॒वा भग॑स्य जु॒ष्टेयम॑स्तु॒ नारी॒ संप्रि॑या॒ पत्यावि॑राधयन्ती ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    यथा॑ । आ॒ऽख॒र: । म॒घ॒ऽव॒न् । चारु॑: । ए॒ष: । प्रि॒य: । मृ॒गाणा॑म् । सु॒ऽसदा॑: । ब॒भूव॑ । ए॒व । भग॑स्य । जु॒ष्टा । इ॒यम् । अ॒स्तु॒ । नारी॑ । सम्ऽप्रि॑या । पत्या॑ । अवि॑ऽराधयन्ती ॥३६.४॥


    स्वर रहित मन्त्र

    यथाखरो मघवंश्चारुरेष प्रियो मृगाणां सुषदा बभूव। एवा भगस्य जुष्टेयमस्तु नारी संप्रिया पत्याविराधयन्ती ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    यथा । आऽखर: । मघऽवन् । चारु: । एष: । प्रिय: । मृगाणाम् । सुऽसदा: । बभूव । एव । भगस्य । जुष्टा । इयम् । अस्तु । नारी । सम्ऽप्रिया । पत्या । अविऽराधयन्ती ॥३६.४॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 2; सूक्त » 36; मन्त्र » 4
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    विवाह संस्कार का उपदेश।

    पदार्थ

    (मघवन्) हे पूजनीय, वा महाधनी परमेश्वर, (यथा) जैसे (एषः) यह (चारुः) सुन्दर (आखरः) खोह वा माँद (मृगाणाम्) जंगली पशुओं का (प्रियः) प्रिय और (सुषदाः) रमणीक घर (बभूव) हुआ है [होता है], (एव=एवम्) ऐसे ही (इयम्) यह (नारी) नारी (भगस्य) ऐश्वर्यवान् [पति] की (जुष्टा) दुलारी और (संप्रिया) प्रियतमा होकर (पत्या) पति से (अविराधयन्ती) वियोग न करती हुयी (अस्तु) रहे ॥४॥

    भावार्थ

    जिस प्रकार आरण्यक नर-नारी पशु आनन्दपूर्वक अपने विलों में विश्राम करते हैं, इसी प्रकार मनुष्यजातीय पति-पत्नी परस्पर मिल-जुलकर उपकार करते हुए सदा सुख से रहें ॥४॥ मनु भगवान् ने कहा है–अ० ५।१४८। बाल्ये पितुर्वशे तिष्ठेत् पाणिग्राहस्य यौवने। पुत्राणां भर्तरि प्रेते न भजेत् स्त्री स्वतन्त्रताम् ॥१॥ स्त्री बालकपन में पिता के, युवावस्था में पति के और पति के मरने पर पुत्रों के वश में रहे, स्त्री स्वतन्त्रता का उपभोग न करे ॥ सायणभाष्य में (मघवन्) के स्थान में [मघवान्] और (अविराधयन्ती) के स्थान में [अभिराधयन्ती=अभि वर्धयन्ती, समृद्धा भवन्ती] है ॥

    टिप्पणी

    ४–यथा। येन प्रकारेण। आखरः। आङ् पूर्वात् खनु अवदारणे–डर प्रत्ययः, डित्वाट् टिलोपः। आखन्यते, आखरः। गर्तः। विलम्। मघवन्। अ० २।५।७। हे पूजनीय। हे धनवन् परमेश्वर। चारुः। अ० २।५।१। शोभनः। मनोज्ञः। प्रियः। प्री–क। हृद्यः। सुखकरः। मृगाणाम्। मृग अन्वेषणे–इगुपधत्वात् कः। पशूनाम्। सुषदाः। षद्लृ विशरणगत्यवसादनेषु–असुन्। सुखेन स्थातुं योग्यः। सुखस्थानः। एव। एवम्। तथा। भगस्य। ऐश्वर्यवतः पत्युः। जुष्टा। प्रीता। अस्तु। भवतु। सम्प्रिया। सम्प्रियमाणा। पत्या। भर्त्रा। अविराधयन्ती। अ+विपूर्वात् राध वियोगे–शतृ, ङीप्। वियोगम् अकुर्वाणा। अन्यद् गतम् ॥

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    विषय

    पति के साथ अविरोध

    पदार्थ

    १. हे (मघवन) = ऐश्वर्यशालिन् प्रभो! (यथा) = जैसे (एष:) = यह (आखर:) = बिल या माँद [cave] (चारु:) = सुन्दर है, (मगाणां प्रिय:) = इसमें निवास करनेवाले पशुओं की प्रीतिजनक है, (सुषदा: बभूव) = उनके लिए सुख से बैठने योग्य हुई है, (एव) = इसीप्रकार यह घर चाहे छोटा है, परन्तु सुन्दर है [चारु:], प्रीति देनेवाला है [प्रियः] तथा उठने-बैठने की पूरी सुविधावाला है [सुषदाः]। २. इस घर में रहती हुई (इयं नारी) = यह स्त्री (भगस्य जष्टा) = ऐश्वर्य से प्रीतिपूर्वक सेवन की गई (अस्तु) = हो-इसे यहाँ ऐश्वर्य की कमी न रहे। (संप्रिया) = यह सबको अच्छी प्रकार प्रीणित करनेवाली हो-सबके लिए प्रिय बने। (पत्या) = पति के साथ (अविराधयन्ती) = विरोध करनेवाली न हो। गृहस्थ की सफलता का मूलमन्त्र तो पति के साथ अविरोध ही है।

    भावार्थ

    घर प्रिय, सुन्दर व सुखद हो। घर में धन-धान्य की कमी न हो। पति-पत्नी का पूर्ण सामञ्जस्य व मेल हो।

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    भाषार्थ

    (यथा) जैसे (एष:) यह (आखरः) सब प्रकार से अर्थात् कठोर जङ्गल-प्रदेश, (मघवान्) महनीय भोग्य पदार्थों से युक्त हुआ, (मृगाणाम्) जंगल के पशुओं का (प्रियः) प्रिय हुआ, (सुषदाः) सुख से स्थिति योग्य (बभूव) होता है, (एवा) इसी प्रकार (भगस्य जुष्टा) भगों से सम्पन्न पति की प्रिया, (इयम् नारी अस्तु) यह नारी हो, (सं प्रिया) सम्यक्-प्रिया हुई, (पत्या) पति के साथ (अविराधयन्ती) विरोध न करती हुई, अपितु उसके कार्यों का विधिवत् सम्पादन करती हुई।

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    विषय

    कन्या के लिये योग्य पति की प्राप्ति ।

    भावार्थ

    (मघवन्) हे ऐश्वर्यवन् पते ! (यथा एषः चारुः आखरः) जैसे यह सुन्दर गृह अर्थात् पशु-शाला (सुषदाः) पशुओं के सुखपूर्वक बैठने योग्य होकर (मृगाणां प्रियः) पशुओं को प्यारा (बभूव) हो जाता है (एवं) ऐसे ही (पत्या) पति के साथ (अविराधयन्ती) बिगाड़ न करती हुई (इयं नारी) यह नारी भी (भगस्य) भाग्यवान् पति की (जुष्टा) प्रेम-पात्री और (संप्रिया) अति प्रियतमा (अस्तु) हो ।

    टिप्पणी

    (द्वि०) ‘सुषदं बभूव’ इति ह्विटनिकामितः पाठः (प्र०) ‘मघवान्’ (च०) ‘पत्याभिराधयन्ती’ इति सायणाभिमतौ पाठौ। (प्र०) यथा खरं मघवंश्चारुरेषु (तृ० च०) या वयं जुष्टा भमस्यास्तु सम्प्रिया इति पैप्प० सं०।

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    पतिवेदन ऋषिः। अग्नीषोमौ मन्त्रोक्ता सोमसूर्येन्द्रभगधनपतिहिरण्यौषधयश्च देवताः। १ भुरिग्। २, ५-७ अनुष्टुभः। ३, ४ त्रिष्टुभौ। ८ निचृत् पुरोष्णिक् । अष्टर्चं सूक्तम्॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Happy Matrimony

    Meaning

    Indra, lord of prosperity, just as a dwelling is the favourite haunt of deer together, so may this woman, dear in communion with her husband, happy and prosperous, be ever the favourite of her husband in the home.

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    Subject

    Indra

    Translation

    O bounteous Lord, as this beautiful cave or lair has become a comfortable resting place for animals, so may this woman enjoy marital bliss, always dear to and never disagreeing with her husband.

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    Translation

    O’ Almighty Lord; As this nice stable of animals providing them with resting place becomes their lovely abode in the same manner this woman without irritating to her husband favor, be affectionate to him, accompanied by all prosperity.

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    Translation

    O God, may this woman find a husband. May the learned and prosperous husband make her happy. May she bear sons, and become queen of the household. Being blessed, may she rule beside her consort!

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    ४–यथा। येन प्रकारेण। आखरः। आङ् पूर्वात् खनु अवदारणे–डर प्रत्ययः, डित्वाट् टिलोपः। आखन्यते, आखरः। गर्तः। विलम्। मघवन्। अ० २।५।७। हे पूजनीय। हे धनवन् परमेश्वर। चारुः। अ० २।५।१। शोभनः। मनोज्ञः। प्रियः। प्री–क। हृद्यः। सुखकरः। मृगाणाम्। मृग अन्वेषणे–इगुपधत्वात् कः। पशूनाम्। सुषदाः। षद्लृ विशरणगत्यवसादनेषु–असुन्। सुखेन स्थातुं योग्यः। सुखस्थानः। एव। एवम्। तथा। भगस्य। ऐश्वर्यवतः पत्युः। जुष्टा। प्रीता। अस्तु। भवतु। सम्प्रिया। सम्प्रियमाणा। पत्या। भर्त्रा। अविराधयन्ती। अ+विपूर्वात् राध वियोगे–शतृ, ङीप्। वियोगम् अकुर्वाणा। अन्यद् गतम् ॥

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    बंगाली (2)

    भाषार्थ

    (যথা) যেমন (এষঃ) এই (আখরঃ) সমস্ত প্রকারে অর্থাৎ কঠোর জঙ্গল-প্রদেশ, (মঘবান্) মহনীয় ভোগ্য পদার্থ দ্বারা যুক্ত হয়েছে, (মৃগাণাম্) জঙ্গলের পশুদের (প্রিয়ঃ) প্রিয় হয়েছে, (সুষদা) সুখপূর্বক স্থিতি যোগ্য (বভূব) হয়, (এবা) এভাবেই (ভগস্য জুষ্টা) ভগ/ঐশ্বর্য-সম্পত্তি সম্পন্ন পতির প্রিয়া, (ইয়ম্ নারী অস্তু) এই নারী হোক, (সং প্রিয়া) সম্যক্-প্রিয়া হয়ে, (পত্নী) পতির সাথে (অবিরাধয়ন্তী) বিরোধ না করে, অপিতু তাঁর কার্যের বিধিবৎ সম্পাদন করে।

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    मन्त्र विषय

    বিবাহসংস্কারোপদেশঃ

    भाषार्थ

    (মঘবন্) হে পূজনীয়, বা মহাধনী পরমেশ্বর, (যথা) যেমন (এষঃ) এই (চারুঃ) সুন্দর (আখরঃ) গুহা/গর্ত (মৃগাণাম্) বন্য পশুদের (প্রিয়ঃ) প্রিয় ও (সুষদাঃ) রমণীয় ঘর (বভূব) হয়েছে [হয়], (এব=এবম্) এভাবেই (ইয়ম্) এই (নারী) নারী (ভগস্য) ঐশ্বর্যবান্ [পতির] (জুষ্টা) আদরের এবং (সংপ্রিয়া) প্রিয়তমা হয়ে (পত্যা) পতি থেকে (অবিরাধয়ন্তী) বিয়োগ না করে (অস্তু) থাকুক ॥৪॥

    भावार्थ

    যেভাবে আরণ্যক নর-নারী পশু আনন্দপূর্বক নিজের জায়গায় বিশ্রাম করে, এইভাবে মনুষ্যজাতীয় পতি-পত্নী পরস্পর একসাথে উপকার করে সদা সুখে থাকুক ॥৪॥ মনু ভগবান্ বলেছে–অ০ ৫।১৪৮। বাল্যে পিতুর্বশে তিষ্ঠেৎ পাণিগ্রাহস্য যৌবনে। পুত্রাণাং ভর্তরি প্রেতে ন ভজেৎ স্ত্রী স্বতন্ত্রতাম্ ॥১॥ স্ত্রী বাল্যবস্থায় পিতার, যুবাবস্থায় পতির এবং পতির মৃত্যুর পর পুত্রের বশবর্তী থাকুক, স্ত্রী স্বতন্ত্রতার উপভোগ না করে ॥ সায়ণভাষ্যে (মঘবন্) এর স্থানে [মঘবান্] এবং (অবিরাধয়ন্তী) এর স্থানে [অভিরাধয়ন্তী=অভি বর্ধয়ন্তী, সমৃদ্ধা ভবন্তী] আছে ॥

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