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अथर्ववेद के काण्ड - 2 के सूक्त 36 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 36/ मन्त्र 5
    ऋषिः - पतिवेदनः देवता - सूर्यः छन्दः - अनुष्टुप् सूक्तम् - पतिवेदन सूक्त
    104

    भग॑स्य॒ नाव॒मा रो॑ह पू॒र्णामनु॑पदस्वतीम्। तयो॑प॒प्रता॑रय॒ यो व॒रः प्र॑तिका॒म्यः॑ ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    भग॑स्य । नाव॑म् । आ । रो॒ह॒ । पू॒र्णाम् । अनु॑पऽदस्वतीम् । तया॑ । उ॒प॒ऽप्रता॑रय । य: । व॒र: । प्र॒ति॒ऽका॒म्य᳡: ॥३६.५॥


    स्वर रहित मन्त्र

    भगस्य नावमा रोह पूर्णामनुपदस्वतीम्। तयोपप्रतारय यो वरः प्रतिकाम्यः ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    भगस्य । नावम् । आ । रोह । पूर्णाम् । अनुपऽदस्वतीम् । तया । उपऽप्रतारय । य: । वर: । प्रतिऽकाम्य: ॥३६.५॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 2; सूक्त » 36; मन्त्र » 5
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    विवाह संस्कार का उपदेश।

    पदार्थ

    [हे कन्या !] (भगस्य) ऐश्वर्य की (पूर्णाम्) भरी-भरायी और (अनुपदस्वतीम्) अटूट (नावम्) नाव पर (आ रोह) चढ़। और (तया) उस [नाव] से [अपने वर को] (उप प्रतारय) आदरपूर्वक पार लगा, (यः) जो (वरः) वर (प्रति–काम्यः) प्रतिज्ञा करके चाहने [प्रीति करने] योग्य है ॥५॥

    भावार्थ

    इस मन्त्र में गृहपत्नी की भारी उत्तरदातृता [ज़िम्मेदारी] का वर्णन है। जैसे नाविक खान-पान आदि आवश्यक सामग्री से लदी-लदायी और बड़ी दृढ़ नौका से जलयात्रियों को समुद्र से पार लगाता है, वैसे ही गृहपत्नी अपने घर को धन-धान्य आदि ऐश्वर्य से भरपूर और दृढ़ रक्खे और पति को नियम में बाँधकर पूरे प्रेम से प्रसन्न रखकर गृहस्थाश्रम से पार लगावे ॥५॥

    टिप्पणी

    ५–भगस्य। भजनीयस्य। ऐश्वर्यस्य। नावम्। ग्लानुदिभ्यां डौः। उ० २।६४। इति णुद प्रेरणे–डौ। नुद्यते जले सा नौः। समुद्रादिसन्तरणार्थयानविशेषम्। पोतम्। समुद्रयानम्। गृहस्थाश्रमरूपम्। आरोह। अधितिष्ठा आरुढा भव। पूर्णाम्। पॄ पूर वा पूर्त्तौ–क्त, तस्य नः। पूरिताम्। कृतपूरणाम्। अनुपदस्वतीम्। अन्+उप+दसु उपक्षये–क्विप्। मतुप्, मस्य वः। अखण्डिताम्। अक्षीणाम्। तया। नावा। उपप्रतारय। उप पूजया शक्त्या वा पारय। यः। पूर्वोक्तः। वरः। ॠदोरप्। पा० ३।३।५७। इति वृञ् वरणे–अप्। वरणीयः। श्रेष्ठः पतिः। जामाता प्रतिकाम्यः। कमु स्पृहि–णिच्, कर्मणि यत् प्रति निश्चयेन प्रतिज्ञया कमनीयः कामनायोग्यः ॥

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    विषय

    ऐश्वर्यपूर्ण नाव

    पदार्थ

    १. कन्ये! तु उस (नावम् आरोह) = गृहस्थ की नौका पर आरुढ़ हो जो (भगस्य पूर्णाम) = ऐश्वर्य से पूर्ण है तथा (अनुपदस्वतीम्) = क्षीण होनेवाली नहीं, अर्थात् गृहस्थ में आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए धन-धान्य की कमी न होनी चाहिए तथा गृहस्थ में भोगासक्त होकर शक्तियों को क्षीण न कर बैठे। २. (तया) = ऐसी गृहस्थ की नाव के द्वारा (उपप्रतारय) = उसके समीप अपने को प्राप्त करा (य:) = जोकि (प्रतिकाम्य:) = प्रत्येक दृष्टि से कमनीय-सुन्दर (वर:) = वर है। जो वर शारीरिक दृष्टिकोण से स्वस्थ है, मन के दृष्टिकोण से उदार है तथा मस्तिष्क के दृष्टिकोण से सुलझा हुआ है। पत्नी के उत्तम व्यवहार से घर फूलता-फलता है। घर जहाँ ऐश्वर्य-सम्पन्न बनता है, वहाँ इस घर के लोगों की शक्तियाँ भी अक्षीण बनी रहती हैं। पत्नी घर को सुन्दर बनाकर पति की अधिकाधिक प्रिय बनती है।

     

    भावार्थ

    पत्नी अपने प्रयत्न से घर की व्यवस्था को ऐसा बनाए कि घर का ऐश्वर्य बढ़े और सब गृहवासियों की शक्ति अक्षुण्ण बनी रहे। ऐसा करने पर पत्नी पति के अधिकाधिक समीप आ जाती है-पति की प्रियतमा बन जाती है।

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    भाषार्थ

    हे कन्ये! (भगस्य) सौभाग्य की (नावम्) नौका पर (आरोह) आरोहण कर, (पूर्णाम्) जो कि सुखसम्पूर्णा है, (अनुपदस्वतीम्) क्षय करनेवाली नहीं। (तया) उस नौका द्वारा (उप प्रतारय) पति को गृहस्थ-समुद्र से तैरा, (यः) जो (वरः) वर, अर्थात् पति के (प्रतिकाम्यः) प्रत्येक सम्बन्धी को काम्य है, अभीष्ट है।

    टिप्पणी

    [नावम्= नौका है विवाह। अनुपदस्वतीम् = अ + नुट् + उप + दसु उपक्षये मतुप्। प्रतारय= तैरा। मनु के अनुसार गृहस्थाश्रम समुद्ररूप है। यथा "यथा नदीनदाः सर्वे समुद्रे यान्ति संस्थितिम्। तथैवाश्रमिणः सर्वे गृहस्थे यान्ति संस्थितिम्" (६।९०) में गृहस्थाश्रम को समुद्र से उपमित किया है।]

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    विषय

    कन्या के लिये योग्य पति की प्राप्ति ।

    भावार्थ

    हे कन्ये (यः) जो (वरः) वर (प्रतिकाम्यः) तेरी अभिलाषा के योग्य है, तू उस (भगस्य) सौभाग्यशील पति की (पूर्णाम्) पूरी (अनुपदस्वतीम्) विनाशरहित, शरणदायिनी (नावं) कष्टसागर के पार उतारने वाली नाव के समान शरण में (आरोह) चढ़, जा बैठ, (तया) उससे (उप प्रतारय) अपने उस पति को और अपने को भी कष्टसागर या ऋण से पार उतार ।

    टिप्पणी

    (प्र०) ‘नावमारुह पूर्णामनुपरस्वतीम् । त्रयो पूषाहितं यः पतिः पतिकाम्यः’ इति पैप्प० सं० ।

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    पतिवेदन ऋषिः। अग्नीषोमौ मन्त्रोक्ता सोमसूर्येन्द्रभगधनपतिहिरण्यौषधयश्च देवताः। १ भुरिग्। २, ५-७ अनुष्टुभः। ३, ४ त्रिष्टुभौ। ८ निचृत् पुरोष्णिक् । अष्टर्चं सूक्तम्॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Happy Matrimony

    Meaning

    O bride, ascend the ark of matrimonial glory, full, perfect and unfailing, and thereby take your husband across the seas, in covenanted love.

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    Subject

    Sürya

    Translation

    May you embark upon the boat of marital bliss, which is full and faultless, With it let you get across to the husband (of your choice),who is worthy of you.

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    Translation

    O’ bride; mount over this ship of household Wife which is inexhaustible and full of fortunes and with this carry on your husband who is the groom desiring you with Vedic vows.

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    Translation

    O God, just as this beautiful lair is dear to wild beasts as a pleasant dwelling; so may this woman be her husband, darling, loved by her lord, and never separated from him.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    ५–भगस्य। भजनीयस्य। ऐश्वर्यस्य। नावम्। ग्लानुदिभ्यां डौः। उ० २।६४। इति णुद प्रेरणे–डौ। नुद्यते जले सा नौः। समुद्रादिसन्तरणार्थयानविशेषम्। पोतम्। समुद्रयानम्। गृहस्थाश्रमरूपम्। आरोह। अधितिष्ठा आरुढा भव। पूर्णाम्। पॄ पूर वा पूर्त्तौ–क्त, तस्य नः। पूरिताम्। कृतपूरणाम्। अनुपदस्वतीम्। अन्+उप+दसु उपक्षये–क्विप्। मतुप्, मस्य वः। अखण्डिताम्। अक्षीणाम्। तया। नावा। उपप्रतारय। उप पूजया शक्त्या वा पारय। यः। पूर्वोक्तः। वरः। ॠदोरप्। पा० ३।३।५७। इति वृञ् वरणे–अप्। वरणीयः। श्रेष्ठः पतिः। जामाता प्रतिकाम्यः। कमु स्पृहि–णिच्, कर्मणि यत् प्रति निश्चयेन प्रतिज्ञया कमनीयः कामनायोग्यः ॥

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    बंगाली (2)

    भाषार्थ

    হে কন্যা ! (ভগস্য) সৌভাগ্যের (নাবম্) নৌকায় (আরোহ) আরোহণ করো, (পূর্ণাম্) যা সুখসম্পূর্ণ, (অনুপদস্বতীম্) ক্ষয়কারী নয়। (তয়া) সেই নৌকা দ্বারা (উপ প্রতারয়) পতিকে গৃহস্থ-সমুদ্র থেকে পার/উদ্ধার করো, (যঃ) যা (বরঃ) বর, অর্থাৎ পতির (প্রতিকাম্যঃ) প্রত্যেক সম্পর্কিতদের কাম্য, অভীষ্ট।

    टिप्पणी

    [নাবম্= নৌকা হল বিবাহ । অনুপদস্বতীম্ = অ + নুট্ + উপ + দসু উপক্ষয়ে+মতুপ্ । প্রতারয়=পার করো । মনুর অনুসারে গৃহস্থ আশ্রম সমুদ্ররূপ। যথা "যথা নদীনদাঃ সর্বে সমুদ্রে যান্তি সংস্থিতিম্। তথৈবাশ্রমিণঃ সর্বে গৃহস্থে যান্তি সংস্থিতিম্" (৬।৯০) এ গৃহস্থাশ্রম কে সমুদ্রের সাথে উপমিত করা হয়েছে।]

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    मन्त्र विषय

    বিবাহসংস্কারোপদেশঃ

    भाषार्थ

    [হে কন্যা !] (ভগস্য) ঐশ্বর্যের (পূর্ণাম্) পূর্ণ ও (অনুপদস্বতীম্) অটূট/সুদৃঢ় (নাবম্) নৌকায় (আ রোহ) আরোহণ করো। এবং (তয়া) সেই [নৌকা] দ্বারা [নিজের বরকে] (উপ প্রতারয়) আদরপূর্বক রক্ষা/উদ্ধার করো, (যঃ) যে (বরঃ) বর (প্রতি–কাম্যঃ) প্রতিজ্ঞা দ্বারা যাচন [প্রীতি করার] যোগ্য॥৫॥

    भावार्थ

    এই মন্ত্রে গৃহপত্নীর উত্তরদাতৃতা [কর্তব্যের] বর্ণনা হয়েছে। যেমন নাবিক ভোজন-পান আদি আবশ্যক সামগ্রী নিয়ে দোদুল্যমান এবং সুদৃঢ় নৌকা দ্বারা জলযাত্রীদের সমুদ্র থেকে পার করে, সেভাবেই গৃহপত্নী নিজের ঘরকে ধন-ধান্য আদি ঐশ্বর্যে ভরপূর ও দৃঢ় রাখুক এবং পতিকে নিয়মে বেঁধে পূর্ণ প্রেমপূর্বক প্রসন্ন রেখে গৃহস্থাশ্রম থেকে উদ্ধার করুক ॥৫॥

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