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अथर्ववेद के काण्ड - 2 के सूक्त 36 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 36/ मन्त्र 1
    ऋषिः - पतिवेदन देवता - अग्निः छन्दः - भुरिगनुष्टुप् सूक्तम् - पतिवेदन सूक्त
    270

    आ नो॑ अग्ने सुम॒तिं सं॑भ॒लो ग॑मेदि॒मां कु॑मा॒रीं स॒ह नो॒ भगे॑न। जु॒ष्टा व॒रेषु॒ सम॑नेषु व॒ल्गुरो॒षं पत्या॒ सौभ॑गमस्त्व॒स्यै ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    आ । न॒: । अ॒ग्ने॒ । सु॒ऽम॒तिम् । स॒म्ऽभ॒ल: । ग॒मे॒त् । इ॒माम् । कु॒मा॒रीम् । स॒ह । न॒: । भगे॑न । जु॒ष्टा । व॒रेषु॑ । सम॑नेषु । व॒ल्गु: । ओ॒षम्‌ । पत्या॑ । सौभ॑गम् । अ॒स्तु॒ । अ॒स्यै ॥३६.१॥


    स्वर रहित मन्त्र

    आ नो अग्ने सुमतिं संभलो गमेदिमां कुमारीं सह नो भगेन। जुष्टा वरेषु समनेषु वल्गुरोषं पत्या सौभगमस्त्वस्यै ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    आ । न: । अग्ने । सुऽमतिम् । सम्ऽभल: । गमेत् । इमाम् । कुमारीम् । सह । न: । भगेन । जुष्टा । वरेषु । समनेषु । वल्गु: । ओषम्‌ । पत्या । सौभगम् । अस्तु । अस्यै ॥३६.१॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 2; सूक्त » 36; मन्त्र » 1
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    विवाह संस्कार का उपदेश।

    पदार्थ

    (अग्ने) अग्निवत् तेजस्वी राजन् (सम्भलः) यथाविधि सम्भाषण वा निरूपण करनेवाला वर (इमाम्) इस (सुमतिम्) सुन्दर बुद्धिवाली (कुमारीम्) कुमारी को (नः) हमारेलिये (भगेन सह+वर्त्तमानः सन्) ऐश्वर्य के साथ वर्त्तमान होकर (नः) हममें (आ=आगत्य) आकर (गमेत्) ले जावे। [इयम् कुमारी] [यह कन्या] (वरेषु) वर पक्षवालों में (जुष्टा) प्रिय और (समनेषु) साधु विचारवालों में (वल्गुः) मनोहर है। (अस्यै) इस [कन्या] के लिये (ओषम्) शीघ्र (पत्या) पति के साथ (सौभगम्) सुहागपन (अस्तु) होवे ॥१॥

    भावार्थ

    यहाँ (अग्नि) शब्द राजा के लिये है। माता-पिता आदि राजव्यवस्था के अनुसार योग्य आयु में गुणवती कन्या का विवाह गुणवान् वर से करें, जिससे वह कन्या पतिकुल में सबको प्रसन्न रक्खे और आप आनन्द से रहे। इसी आशय को राजप्रकरण में मनु महाराज ने अ० ७।१५२। में वर्णन किया है “[कन्यानां संप्रदानं च कुमाराणां च रक्षणम्।] कन्याओं के नियमपूर्वक दान [विवाह] का और कुमारों की रक्षा का [राजा चिन्तन करे]”। (ओषम्) के स्थान पर सायणभाष्य में [ऊषम्] है ॥१॥

    टिप्पणी

    १–नः। अस्मान्। अग्ने। हे अग्निवत्तेजस्विन् राजन्। सुमतिम्। सु+मन बोधे–क्तिन्। शोभनबुद्धियुक्ताम्। सम्भलः। सम्+भल परिभाषणहिंसादानेषु निरूपणे च–पचाद्यच्। सम्यग् भलते परिभाषते निरूपयति वा स सम्भलः। यथाविधि परिभाषकः यथाशास्त्रं निरूपकः। आ+गमेत्। द्विकर्मकः। आगत्य गमयेत् नयेत्। इमाम्। प्रसिद्धाम्। गुणवतीम्। कुमारीम्। कुमार क्रीडने–अच्। वयसि प्रथमे। पा० ४।१।२०। इति ङीप्। कन्याम्। सह। सहितः। नः। अस्मदर्थम्। भगेन। भजनीयेन गुणेन ऐश्वर्येण। जुष्टा। प्रीता सेविता। वरेषु। वृञ् वरणे–अप्। यद्वा वर ईप्से–घञ् श्रेष्ठेषु वरयितृषु, वरपक्षीयेषु। समनेषु। सम्+अन जीवने–घञ्। यद्वा। सम्+आङ्+णीञ् प्रापणे–अच्। सम्यग् अनिति आनीयते वा। समानं तुल्यं साधु वा। समानस्य सभावः। मन बोधे–पचाद्यच्। साधुमननयुक्तेषु। वल्गुः। वलेर्गुक् च। उ० १।१९। इति वल प्राणने–उ प्रत्ययः, गुक् आगमः। रुचिरा। मनोहरा। ओषम्। उष दाहे, वधे–घञ्। क्षिप्रम्। निघ० २।१५। पत्या। स्वामिना सह। सौभगम्। सुभग–अण्। सुभगत्वम्। अस्यै। कुमार्यै। अन्यद् गतम् ॥

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    विषय

    सुमतिं सम्भलः [गमेत्]

    पदार्थ

    १. हे (अग्ने) = परमात्मन् ! (नः) = हमारी (सुमतिम्) = कल्याणी मतिवाली, समझदार इस कन्या को (सम्भल:) = [भल परिभाषणे] बोलने में अत्यन्त मधुर वर (आगमेत) = प्राप्त हो। कन्या सुमति है छल-छिद्रवाली नहीं, उसे साधुस्वभाव पति ही प्राप्त हो। २. (नः) = हमारी (इमां कुमारीम्) = इस कुमारी को (भगेन सह) = ऐश्वर्य के साथ यह वर प्राप्त हो। पति के लिए आवश्यक है कि वह कमानेवाला हो, क्योंकि गृहस्थ बिना धन के चल ही नहीं सकता। ३. हमारी यह कन्या (समनेषु)=[सहृदयेषु-सा०] सहदय-प्रेम-दयादि भावों से पूर्ण हृदयवले (बरेषु) = वरपक्ष के व्यक्तियों में (जुष्टा) = प्रीतिपूर्वक सेवा करनेवाली हो-उन्हें प्रिय हो। (वल्गः) = इसका जीवन वहाँ सुन्दर हो। (पत्या) = पति के साथ (ओषम्) = सब प्रकार सहनिवासवाला-सहनिवासका साधनभूत (सौभगम्) = सौभाग्य (अस्यै अस्तु) = इसके लिए हो।

    भावार्थ

    पति बोलने में मधुर [संभल:], कमानेवाला [भगेन सह], पत्नी के साथ कार्यों को करनेवाला [ओषं सौभगम्] हो। पत्नी समझदार [सुमतिः], सर्वप्रिय [जुष्टा] व सुन्दर जीवनवाली [बल्ाः] हो।

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    भाषार्थ

    (अग्ने) हे सर्वाग्रणी परमेश्वर ! (संभल:) सम्यक्-भाषी [वर], (सुमतिम्) सुमति (इमाम् न: कुमारीम्) इस हमारी कुमारी को (आ गमेत्) प्राप्त हो (भगेन सह) सम्पत्ति के साथ। [यह कुमारी] (वरेषु) वरण करनेवालों में (जुष्टा) प्रिया, (समनेषु) सामाजिक जीवनों में (वल्गुः) रुचि रखती है, (पत्या) पति के साथ (अस्यै) इसके लिये (ओषम्) प्रत्येक उषाकाल में (सौभगम्) सौभाग्य (अस्तु) हो।

    टिप्पणी

    [अग्ने= अग्नि: अग्रणीर्भवति (निरुक्त ७।४।१४)। संभल:= सम् +भल परिभाषणे (भ्वादिः)। भगेन= सम्पत्ति के साथ, न कि निर्धन। गृहस्थ सम्पत्ति के बिना चल नहीं सकता। (जुष्टा= जुषी प्रीतिसेवनयोः (तुदादिः)। समनेषु = सम् (सामाजिक) + अन (जीवन), अन प्राणने (अदादिः)। ओषम्= "आ उषा" काल में, अर्थात् प्रतिदिन, उषाकाल से प्रारम्भ कर।]

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    विषय

    कन्या के लिये योग्य पति की प्राप्ति ।

    भावार्थ

    हे (अग्ने) अग्ने ! आचार्य ! पुरोहित ! परमात्मन् ! (सं-भलः) उत्तम रीति से आदान करने हारा योग्य पात्र या उत्तम विद्वान् प्रवक्ता (नः) हमारे पास (आ गमेद्) आवे। और (इमां) इस (सुमतिं) उत्तम ज्ञान वाली, उत्तम मति वाली, बुद्धिमती (कुमारीम्) नवयौवना कुमारी कन्या को (भगेन सह) ऐश्वर्यमय धन और सौभाग्य के साथ (आ गमेत्) आकर स्वीकार करे। अथवा भला उत्तम विद्वान्, सत्पात्र इस कुमारी को (संगमेत्) प्राप्त हो । और यह कन्या (समनेषु) समान चित्त वाले (वरेषु) वरों में से (पत्या) अपने पालन करने में समर्थ अभिलषित पति के संग (वल्गुः) मधुर वचन आलाप करे, (अस्यै) इस कन्या को (ओषं) सहवासरूप (सौभगं) सौभाग्य (अस्तु) प्राप्त हो।

    टिप्पणी

    (प्र० द्वि०) सुमतिं स्कन्दलोके इदमां कुसार्या मानो भगेन [ ? ]। (तृ० च०) ‘वल्गुरोषं पत्या भवति सुभगेमम्’ इति पैप्प० सं । सम्भलकः समादाता इति सायणः।

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    पतिवेदन ऋषिः। अग्नीषोमौ मन्त्रोक्ता सोमसूर्येन्द्रभगधनपतिहिरण्यौषधयश्च देवताः। १ भुरिग्। २, ५-७ अनुष्टुभः। ३, ४ त्रिष्टुभौ। ८ निचृत् पुरोष्णिक् । अष्टर्चं सूक्तम्॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Happy Matrimony

    Meaning

    O lord self-refulgent, Agni, let the bride-groom, noble of thought and speech, come to us with all good fortune and excellence to wed this noble minded maiden of cheerful disposition. She is lovable among the eminent and agreeable among equals in company. May she enjoy brilliance, happiness and prosperity in the company of her husband.

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    Subject

    Agnih

    Translation

    O adorable Lord, may a good yoüngman, sweet of tongue (sam-bhala) come to us (in the svayamvara) seeking this sweet-hearted maiden, and may he accept her along with gifts and riches (bhagena). May this girl, pleasing to the wooers and attractive and accomplished at the assemblies, be blessed with marital happiness in the company of this young man as her husband.

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    Translation

    O Prieet; Well-talented groom come near us and accept this our girl-who has attained right understanding and is accompanied by good fortune. She speaks in good and mild term with her husband whom she selects from the assembly of the wooers. She may soon attain happiness with her husband.

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    Translation

    Eye and Mouth are the sources for the soul, for acquiring knowledge and filling the belly. May gracious and kindly-hearted learned persons work in this world, a yajna extended by God.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    १–नः। अस्मान्। अग्ने। हे अग्निवत्तेजस्विन् राजन्। सुमतिम्। सु+मन बोधे–क्तिन्। शोभनबुद्धियुक्ताम्। सम्भलः। सम्+भल परिभाषणहिंसादानेषु निरूपणे च–पचाद्यच्। सम्यग् भलते परिभाषते निरूपयति वा स सम्भलः। यथाविधि परिभाषकः यथाशास्त्रं निरूपकः। आ+गमेत्। द्विकर्मकः। आगत्य गमयेत् नयेत्। इमाम्। प्रसिद्धाम्। गुणवतीम्। कुमारीम्। कुमार क्रीडने–अच्। वयसि प्रथमे। पा० ४।१।२०। इति ङीप्। कन्याम्। सह। सहितः। नः। अस्मदर्थम्। भगेन। भजनीयेन गुणेन ऐश्वर्येण। जुष्टा। प्रीता सेविता। वरेषु। वृञ् वरणे–अप्। यद्वा वर ईप्से–घञ् श्रेष्ठेषु वरयितृषु, वरपक्षीयेषु। समनेषु। सम्+अन जीवने–घञ्। यद्वा। सम्+आङ्+णीञ् प्रापणे–अच्। सम्यग् अनिति आनीयते वा। समानं तुल्यं साधु वा। समानस्य सभावः। मन बोधे–पचाद्यच्। साधुमननयुक्तेषु। वल्गुः। वलेर्गुक् च। उ० १।१९। इति वल प्राणने–उ प्रत्ययः, गुक् आगमः। रुचिरा। मनोहरा। ओषम्। उष दाहे, वधे–घञ्। क्षिप्रम्। निघ० २।१५। पत्या। स्वामिना सह। सौभगम्। सुभग–अण्। सुभगत्वम्। अस्यै। कुमार्यै। अन्यद् गतम् ॥

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    बंगाली (2)

    भाषार्थ

    (অগ্নে) হে সর্বাগ্রণী পরমেশ্বর ! (সংভলঃ) সম্যক্-ভাষী [বর], (সুমতিম্) সুমতি (ইমাম্ নঃ কুমারীম্) আমাদের এই কুমারীকে (আ গমেৎ) প্রাপ্ত হোক (ভগেন সহ) সম্পত্তির সহিত। [এই কুমারী] (বরেষু) বরণীয়দের মধ্যে (জুষ্টা) প্রিয়া, (সমনেষু) সামাজিক জীবনে (বল্গুঃ) রুচি রাখে, (পত্নী) পতির সাথে (অস্যৈ) এঁর জন্য (ওষম্) প্রত্যেক উষাকালে (সৌভাগ্যম্) সৌভাগ্য (অস্তু) হোক।

    टिप्पणी

    [অগ্নি= অগ্নিঃ অগ্রণীর্ভবতি (নিরুক্ত ৭।৪।১৪)। সংভলঃ=সম্ +ভল পরিভাষণে (ভ্বাদিঃ)। ভগেন=সম্পত্তির সাথে, নির্ধন নয়। গৃহস্থ সম্পত্তি ছাড়া চলতে পারে না। (জুষ্টা=জুষী প্রীতিসেবনয়োঃ (তুদাদিঃ)। সমনেষু= সম্ (সামাজিক) + অন (জীবন), অন প্রাণনে (অদাদিঃ)। ওষম্= "আ উষা" কালে, অর্থাৎ প্রতিদিন, উষাকাল থেকে প্রারম্ভ করে।]

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    मन्त्र विषय

    বিবাহসংস্কারোপদেশঃ

    भाषार्थ

    (অগ্নে) অগ্নিবৎ তেজস্বী রাজন্ (সম্ভলঃ) যথাবিধি সম্ভাষণ বা নিরূপণকারী বর (ইমাম্) এই (সুমতিম্) সুন্দর বুদ্ধিমতী (কুমারীম্) কুমারীকে (নঃ) আমাদের জন্য (ভগেন সহ+বর্ত্তমানঃ সন্) ঐশ্বর্যের সাথে বর্ত্তমান হয়ে (নঃ) আমাদের মধ্যে (আ=আগত্য) এসে (গমেৎ) নিয়ে যাক। [ইয়ম্ কুমারী] [এই কন্যা] (বরেষু) বর পক্ষদের (জুষ্টা) প্রিয় ও (সমনেষু) সাধু বিচারশীলদের (বল্গুঃ) মনোহর। (অস্যৈ) এই [কন্যার] জন্য (ওষম্) শীঘ্র (পত্যা) পতির সাথে (সৌভগম্) সৌভাগ্য/সমৃদ্ধি (অস্তু) হোক ॥১॥

    भावार्थ

    এখানে (অগ্নি) শব্দ রাজার জন্য। মাতা-পিতা আদি রাজব্যবস্থার অনুসারে যোগ্য আয়ুতে গুণবতী কন্যার বিবাহ গুণবান্ বরের সাথে সম্পন্ন করুক, যাতে সেই কন্যা পতিকুলে সকলকে প্রসন্ন রাখে এবং নিজে আনন্দে থাকে। এই উদ্দেশ্যকে রাজপ্রকরণে মনু মহারাজ অ০ ৭।১৫২। বর্ণনা করেছেন “[কন্যানাং সংপ্রদানং চ কুমারাণাং চ রক্ষণম্।] কন্যাদের নিয়মপূর্বক দান [বিবাহের] এবং কুমারদের রক্ষার [রাজা চিন্তন করে]”। (ওষম্) এর স্থানে সায়ণভাষ্যে [ঊষম্] আছে ॥১॥

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