अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 131/ मन्त्र 14
ऋषिः -
देवता - प्रजापतिर्वरुणो वा
छन्दः - प्राजापत्या गायत्री
सूक्तम् - कुन्ताप सूक्त
57
अश्व॑त्थ॒ खदि॑रो ध॒वः ॥
स्वर सहित पद पाठअश्व॑त्थ॒ । खदि॑र: । ध॒व: ॥१३१.१४॥
स्वर रहित मन्त्र
अश्वत्थ खदिरो धवः ॥
स्वर रहित पद पाठअश्वत्थ । खदिर: । धव: ॥१३१.१४॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
ऐश्वर्य की प्राप्ति का उपदेश।
पदार्थ
(अश्वत्थ) हे अश्वत्थामा ! [बलवानों में ठहरनेवाले वीर] (खदिरः) दृढ़चित्तवाला (धवः) मनुष्य [होवे] ॥१४॥
भावार्थ
मनुष्य उचित रीति से भोजन आदि का उपहार वा दान और कर आदि का ग्रहण करके दृढ़चित्त होकर शत्रुओं का नाश करे ॥१२-१६॥
टिप्पणी
१४−(अश्वत्थ) अथ० ३।६।१। अश्व+ष्ठा गतिनिवृत्तौ-क, पृषोदरादिरूपम्। अश्वेषु बलवत्सु स्थितिशील। अश्वत्थामन् वीर (खदिरः) अथ० ३।६।१। खद स्थैर्यहिंसयोः-किरच्। स्थिरचित्तः (धवः) अथ० ।।। धावु गतिशुद्ध्योः-पचाद्यच्, ह्रस्वः। धव इति मनुष्यनाम तद्वियोगाद्विधवा-निरु० ३।१। शुद्धः। मनुष्यः ॥
विषय
त्याग व प्रभु-प्राप्ति
पदार्थ
१. (पाक) = हे साधना द्वारा ज्ञानाग्नि में अपना परिपाक करनेवाले जीव ! तू तो (बलि:) = भूतयज्ञ में पड़नेवाली आहति ही हो गया है। २. (शक) = हे शक्तिशालिन् साधक! तु (बलि:) = भूतयज्ञ की आहुति बना है। 'तैजस' [शक] व 'प्राज्ञ' [पाक] बनकर तू 'वैश्वानर' बनता है। इसप्रकार इन तीनों पगों को रखकर तु चौथे पग में [सोऽयमात्मा चतुष्पात्] उस 'सत्य, शिव, सुन्दर' प्रभु को पानेवाला बना है। ३. उस सर्वव्यापक 'अश्व' नामक [अश् व्याप्ती] प्रभु में स्थित होनेवाले 'अश्वत्थ' [अश्वे तिष्ठति] तू (खदिरः) = [खद स्थैर्य]-स्थिर वृत्तिवाला है। तेरा मन डॉवाडोल नहीं रहा। (धव:) = [धू कम्पने] तूने सब वासनाओं को कम्पित करके अपने जीवन को बासनाओं से शून्य बनाया है।
भावार्थ
हम ज्ञानाग्नि में अपने को परिपक्व करके तथा शक्तिशाली बनकर भूतयज्ञ में प्राणिमात्र के हित के लिए अपने को आहुत कर दें तभी हम प्रभु में स्थित होंगे। प्रभु में स्थित होने पर स्थिर वृत्ति के बनेंगे तथा वासनाशून्य जीवनवाले होंगे।
भाषार्थ
तदनन्तर सद्गुरु मानो कहता है उपासक को, कि (अश्वत्थ) हे मनरूपी-अश्व के अधिष्ठाता! (खदिरः) तूने राजस और तामस वृत्तियों का विनाश कर लिया है, (धवः) तू धवल अर्थात् परिशुद्ध सात्विक चित्तवृत्तियोंवाला हो चुका है। अतः—
टिप्पणी
[खदिरः=खदति हिनस्तीति (उणादि कोष १.५३)।]
विषय
missing
भावार्थ
वह (अश्वत्थः) अश्व के समान चतुरंग सेना रूप चारों चरणों पर विराजता है। वह (खदिरः) खदिर वृक्ष के समान दृढ़ एवं (खदिरः) अतिस्थिर होकर विराजता है। वह (धवः) उत्तम पुष्पवान् धव नामक वृक्ष के समान सुन्दर, सुभूषित और मनोहर है।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
missing
इंग्लिश (4)
Subject
Prajapati
Meaning
O devotee, undisturbed and stable in mind, risen pure above mental fluctuations of lower order, you are now redeemed to your original purity.
Translation
The man having well established position in heroes be men of firm intention.
Translation
The man having well-established position in heroes be men of firm intention.
Translation
He (i.e., God), is everlasting and all-pervading, like ‘Ashvatha tree, firm and steady like ‘Khadira’ tree, pure and spotless like a ‘Dhava’ tree.
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
१४−(अश्वत्थ) अथ० ३।६।१। अश्व+ष्ठा गतिनिवृत्तौ-क, पृषोदरादिरूपम्। अश्वेषु बलवत्सु स्थितिशील। अश्वत्थामन् वीर (खदिरः) अथ० ३।६।१। खद स्थैर्यहिंसयोः-किरच्। स्थिरचित्तः (धवः) अथ० ।।। धावु गतिशुद्ध्योः-पचाद्यच्, ह्रस्वः। धव इति मनुष्यनाम तद्वियोगाद्विधवा-निरु० ३।१। शुद्धः। मनुष्यः ॥
बंगाली (2)
मन्त्र विषय
ঐশ্বর্যপ্রাপ্ত্যুপদেশঃ
भाषार्थ
(অশ্বত্থ) হে অশ্বত্থামা! [বলবানদের মধ্যে বিদ্যমান বীর] (খদিরঃ) দৃঢ় চিত্তযুক্ত (ধবঃ) মনুষ্য [হও] ॥১৪॥
भावार्थ
মনুষ্য উচিত রীতিতে ভোজন আদির উপহার বা দান এবং কর আদি গ্রহণ করে দৃঢ়চিত্ত হয়ে শত্রুদের বিনাশ করুক ॥১২-১৬॥
भाषार्थ
তদনন্তর সদ্গুরু মানো উপাসককে বলে, (অশ্বত্থ) হে মনরূপী-অশ্বের অধিষ্ঠাতা! (খদিরঃ) তুমি রাজস এবং তামস বৃত্তির বিনাশ করে নিয়েছো/করেছো, (ধবঃ) তুমি ধবল অর্থাৎ পরিশুদ্ধ সাত্ত্বিক চিত্তবৃত্তিসম্পন্ন হয়ে গেছ/হয়েছো। অতঃ—
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