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अथर्ववेद के काण्ड - 20 के सूक्त 131 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 131/ मन्त्र 6
    ऋषिः - देवता - प्रजापतिर्वरुणो वा छन्दः - प्राजापत्या गायत्री सूक्तम् - कुन्ताप सूक्त
    48

    अहु॑ल कुश वर्त्तक ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    अह॑ल । कुश । वर्त्तक ॥१३१.६॥


    स्वर रहित मन्त्र

    अहुल कुश वर्त्तक ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    अहल । कुश । वर्त्तक ॥१३१.६॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 20; सूक्त » 131; मन्त्र » 6
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    ऐश्वर्य की प्राप्ति का उपदेश।

    पदार्थ

    (अहल) हे प्रकाशमान ! (कुश) हे पापनाशक ! (वर्त्तक) हे प्रवृत्ति करनेवाले ! [मनुष्य] ॥६॥

    भावार्थ

    सब मनुष्य और स्त्रियाँ सदा उपकार करके क्लेशों से बचें और परस्पर प्रीति से रहें ॥६-११॥

    टिप्पणी

    ६−(अहल) शकिशम्योर्नित्। उ० १।११२”। अहि गतौ दीप्तौ च-कलप्रत्ययः। हे दीप्यमान (कुश) कु पापं श्यतीति, शो तनूकरणे-डप्रत्ययः। हे पापनाशक (वर्त्तक) वृतु वर्तने-ण्वुल्। हे प्रवृत्तिशील ॥

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    विषय

    कुश

    पदार्थ

    १. गतमन्त्र में वर्णित वरुण को सम्बोधित करते हुए कहते हैं कि अ-हल-अविलेखनीय वासनाओं से अविदारणीय! (कुश) = [श्यति कु-बुराई] बुराई को विनष्ट करनेवाले! (वर्तक) = सदा धर्म-कार्यों में वर्तनेवाले वरुण! धन के कारण वासनाओं में न फंसनेवाला यह व्यक्ति (आ ऊहति) = सब बुराइयों को [push, remove] दूर करता है। इसप्रकार दूर करता है (इव) = जैसेकि (शफेन) = खुर से एक गौ शत्रु को आहत करती है। खुर के प्रहार से गौ जैसे शत्रुओं को दूर करती है, इसी प्रकार वह वरुण धर्मकायों में वर्तता हुआ सब बुराइयों को दूर रखता है।

    भावार्थ

    हम अपने जीवनों में वासनाओं से विलेखित-अवदीर्ण हों। बुराई का अन्त करनेवाले हों। सदा धर्म-कार्यों में वर्ते और इसप्रकार जीवन से सब बुराइयों को दूर रक्खें।

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    भाषार्थ

    (अहल) जीवन में पवित्रता और त्याग का हल विना-फिरे हे व्यक्ति! (कुश) तथा पार्थिव भोगों में शयन किये हुए हे व्यक्ति! (वर्त्तक) और सांसारिक व्यवहारों में ही वर्तनेवाले हे व्यक्ति!

    टिप्पणी

    [कुश=कु (पृथिवी)+श (शयन)।]

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    विषय

    missing

    भावार्थ

    (अहल) हे ‘अहल’ अविलेखनयोग्य ! तुझ को कोई उखाड़ नहीं सकता। तू (कुशवर्त्तक) कुश घास के समान रहता है। जैसे कुश घास जहां हल नहीं चलता वहां जम आता है। और हल चल जाने पर फिर भी बार बार आता है इसी प्रकार राज भी जड़ से नहीं उखड़ता। वह बार बार सिर उठाता है।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    missing

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Prajapati

    Meaning

    The man without the plough, dedicated to the yajna-vedi sits on the grass in meditation.

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    Translation

    O brilliant one, O destroyer of evils, O active one I praise you.

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    Translation

    O brilliant one, O destroyer of evils, O active one I praise you.

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    Translation

    Thou art everlasting, like the kusha-grass, difficult to be uprooted.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    ६−(अहल) शकिशम्योर्नित्। उ० १।११२”। अहि गतौ दीप्तौ च-कलप्रत्ययः। हे दीप्यमान (कुश) कु पापं श्यतीति, शो तनूकरणे-डप्रत्ययः। हे पापनाशक (वर्त्तक) वृतु वर्तने-ण्वुल्। हे प्रवृत्तिशील ॥

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    बंगाली (2)

    मन्त्र विषय

    ঐশ্বর্যপ্রাপ্ত্যুপদেশঃ

    भाषार्थ

    (অহল) হে প্রকাশমান! (কুশ) হে পাপনাশক! (বর্ত্তক) হে প্রবৃত্তিশীল! [মনুষ্য] ॥৬॥

    भावार्थ

    সকল নর-নারী পরস্পর সর্বদা উপকার করে ক্লেশ মুক্ত এবং আনন্দিত থাকুক ॥৬-১১॥

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    भाषार्थ

    (অহল) জীবনে পবিত্রতা এবং ত্যাগের হল/হাল/লাঙল না ধারণকারী হে ব্যক্তি! (কুশ) তথা পার্থিব ভোগের মধ্যে শায়িত হে ব্যক্তি! (বর্ত্তক) এবং সাংসারিক ব্যবহারেই আচরণকারী হে ব্যক্তি!

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