अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 131/ मन्त्र 9
ऋषिः -
देवता - प्रजापतिर्वरुणो वा
छन्दः - प्राजापत्या गायत्री
सूक्तम् - कुन्ताप सूक्त
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वनि॑ष्ठा॒ नाव॑ गृ॒ह्यन्ति॑ ॥
स्वर सहित पद पाठवनि॑ष्ठा॒: ॥ न । अव॑ । गृ॒ह्यन्ति॑ ॥१३१.९॥
स्वर रहित मन्त्र
वनिष्ठा नाव गृह्यन्ति ॥
स्वर रहित पद पाठवनिष्ठा: ॥ न । अव । गृह्यन्ति ॥१३१.९॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
ऐश्वर्य की प्राप्ति का उपदेश।
पदार्थ
(वनिष्ठाः) अत्यन्त उपकारी लोग (न) नहीं (अव गृह्यन्ति) रुकते हैं ॥९॥
भावार्थ
सब मनुष्य और स्त्रियाँ सदा उपकार करके क्लेशों से बचें और परस्पर प्रीति से रहें ॥६-११॥
टिप्पणी
९−(वनिष्ठाः) वनितृ-इष्ठन्, तृचो लोपः। वनितृतमाः। उपकारितमाः (न) निषेधे (अव गृह्यन्ति) अवग्रहं प्रतिरोधं प्राप्नुवन्ति ॥
विषय
संविभाग की वृत्ति
पदार्थ
१. गतमन्त्र का वर्तक प्रार्थना करता है कि (वनेनती) = संभजन में झुकाववाली [वन संभक्ती] बनी शक्तियों का विकास करनेवाली चित्तवृत्ति (आ अय) = मुझे सर्वथा प्राप्त हो। वस्तुत: जब हम संभजन की वृत्तिवाले होते है-सब-कुछ स्वयं ही नहीं खा लेते तब इस समय हमारी शक्तियों का प्रादुर्भाव होता है। वस्तुतः उत्तम कार्यों में वर्तनेवाला व्यक्ति सदा इस संभजन की वृत्ति को अपनाता है। २. ये (वनिष्ठा:) = अधिक-से-अधिक संविभाग की वृत्तिवाले लोग (न अवगृह्मान्ति) = परस्पर विरोध की वृत्तिवाले नहीं होते। एक-दूसरे का ये संग्रह करनेवाले ही होते हैं।
भावार्थ
संविभाग की वृत्ति हमारी शक्तियों का विकास करती है। यह हमें परस्पर के संघर्ष से दूर रखकर उन्नत करती है।
भाषार्थ
(वनिष्ठाः) श्रद्धामय भक्ति के सर्वश्रेष्ठ उपासक (न अवगृह्यन्ति) यह धारणा नहीं रखते कि—[वनिष्ठाः=वन संभक्तौ।]
विषय
missing
भावार्थ
जिस प्रकार खाया हुआ भोजन आतों में अटकता नहीं प्रत्युत पच कर कुछ मल बाहर हो जाता है और शेष अंगों में मांस रुधिर आदि बनकर चला जाता है उसी प्रकार राजा के पास आया धन भी मुक्त होकर पुनः अन्यों के पास चला जाता है।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
missing
इंग्लिश (4)
Subject
Prajapati
Meaning
Those who are absolutely dedicated are never forsaken.
Translation
The men engaged in well-being of theirs do not be at rest.
Translation
The men engaged in well-being of theirs do not be at rest.
Translation
Nothing lies hidden even in the innermost recesses of the universe.
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
९−(वनिष्ठाः) वनितृ-इष्ठन्, तृचो लोपः। वनितृतमाः। उपकारितमाः (न) निषेधे (अव गृह्यन्ति) अवग्रहं प्रतिरोधं प्राप्नुवन्ति ॥
बंगाली (2)
मन्त्र विषय
ঐশ্বর্যপ্রাপ্ত্যুপদেশঃ
भाषार्थ
(বনিষ্ঠাঃ) অত্যন্ত উপকারী মনুষ্য (ন) না (অব গৃহ্যন্তি) প্রতিরোধ প্রাপ্ত হয় ॥৯॥
भावार्थ
(বনেনতী) উপকারে বিনয়ী/নম্র হয়ে (জনী) মাতা হয়ে (আয়) তুমি এসো ॥৮॥
भाषार्थ
(বনিষ্ঠাঃ) শ্রদ্ধাময় ভক্তির সর্বশ্রেষ্ঠ উপাসক (ন অবগৃহ্যন্তি) এই ধারণা রাখে না —[বনিষ্ঠাঃ=বন সম্ভক্তৌ।]
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