अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 26/ मन्त्र 6
के॒तुं कृ॒ण्वन्न॑के॒तवे॒ पेशो॑ मर्या अपे॒शसे॑। समु॒षद्भि॑रजायथाः ॥
स्वर सहित पद पाठके॒तुम् । कृ॒ण्वन् । अ॒के॒तवे॑ । पेश॑: । म॒र्या॒: । अ॒पे॒शसे॑ ॥ सम् । उ॒षत्ऽभि॑: । अ॒जा॒य॒था॒: ॥२६.६॥
स्वर रहित मन्त्र
केतुं कृण्वन्नकेतवे पेशो मर्या अपेशसे। समुषद्भिरजायथाः ॥
स्वर रहित पद पाठकेतुम् । कृण्वन् । अकेतवे । पेश: । मर्या: । अपेशसे ॥ सम् । उषत्ऽभि: । अजायथा: ॥२६.६॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
४-६ परमेश्वर के गुणों का उपदेश।
पदार्थ
(मर्याः) हे मनुष्यो ! (अकेतवे) अज्ञान हटाने के लिये (केतुम्) ज्ञान को और (अपेशसे) निर्धनता मिटाने के लिये (पेशः) सुवर्ण आदि धन को (कृण्वन्) करता हुआ वह [परमात्मा-मन्त्र० , ६] (उषद्भिः) प्रकाशमान गुणों के साथ (सम्) अच्छे प्रकार (अजायथाः) प्रकट हुआ है ॥६॥
भावार्थ
मनुष्य प्रयत्न करके परमात्मा को विचारते हुए सृष्टि के पदार्थों से उपकार लेकर ज्ञानी और धनी होवें ॥६॥
टिप्पणी
यह मन्त्र यजुर्वेद में भी है-२६।३७ और महर्षिदयानन्दकृत ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका पृष्ठ ३०७ ग्रन्थप्रामाण्याप्रामाण्यविषय में भी व्याख्यात है ॥ ६−(केतुम्) केतुरिति प्रज्ञानाम-निघ० ३।९। प्रज्ञानम् (कृण्वन्) कृवि हिंसाकरणयोः-शतृ। कुर्वन् सन् सः परमेश्वरः-म० , ६ (अकेतवे) क्रियार्थोपपदस्य च कर्मणि स्थानिनः। पा० २।३।१४। इति तुमुनः कर्मणि चतुर्थी। अज्ञानं नाशयितुम् (पेशः) पिश गतौ-अवयवे दीपनायां च-असुन्। पेश इति हिरण्यनाम-निघ० १।२। पेश इति रूपनाम पिंशतेर्विपिशितं भवति निरु० ८।११। सुवर्णादिधनं रूपं वा (मर्याः) मनुष्याः (अपेशसे) निर्धनतां नाशयितुम् (सम्) सम्यक् (उषद्भिः) उष दाहे-शतृ। प्रकाशमानैर्गुणैः (अजायथाः) प्रथमपुरुषस्य मध्यमपुरुषः। अजायत। प्रादुरभवत् ॥
विषय
केतं+पेशस
पदार्थ
१. हे (मर्या:) = मनुष्यो! प्रभु (अकेतवे) = प्रज्ञानरहित के लिए (केतं कृण्वन) = प्रज्ञान को करता हुआ है तथा (अपेशसे) = तेजस्विता की कमी से रूपरहित के लिए (पेश:) = तेजस्विता से दीस रूप को देते हैं। प्रभु प्रज्ञान व शक्ति प्राप्त कराते हैं। २. हे प्रभो। आप (उपद्धिः) = अन्धकार का दहन करनेवाली रश्मियों के साथ (सं अजायथा:) = हमारे हृदयों में प्रादुर्भूत होते हैं।
भावार्थ
हम हृदयों में प्रभु के प्रकाश को देखने का प्रयत्न करें। प्रभु हमें ज्ञान व शक्ति प्राप्त कराते हैं। प्रज्ञान को प्राप्त करके ज्ञानेन्द्रियों द्वारा प्रभु का उत्तमता से प्रतिपादन करनेवाला यह उपासक 'गो-सूक्ति' बनता है। शक्ति प्राप्त करके कर्मेन्द्रियों द्वारा प्रभु का प्रतिपादन करता हुआ यह व्यक्ति 'अश्वसूक्ति' है। ये ही अगले सूक्त के ऋषि हैं -
भाषार्थ
(मर्याः) हे उपासक जनो! देखों कि योगविधि द्वारा युक्त किया गया परमेश्वर (उषद्भिः) उषाकालों के साथ-साथ (सम् अजायथाः) हम योगिजनों में सम्यक्=प्रकट हो गया है। वह (अकेतवे) प्रज्ञानरहित उपासक के लिए (केतुम्) प्रज्ञान (कृण्वन्) प्रकट करता है। और (अपेशसे) जिस आध्यात्मिक रंग-रूप नहीं चढ़ा उस पर (पेशः) नया आध्यात्मिक रंग रूप चढ़ा देता है। [पेशः=रूपम् (निघं০ ३.७)।]
विषय
राजा और ईश्वर का वर्णन
भावार्थ
हे (मर्याः) मनुष्यो ! (अकेतवे) अज्ञानी पुरुष को (केतुम् कृण्वन्) ज्ञान देता है और (अपेशसे) धनरहित पुरुष को (पेशः कृण्वन्) धन प्रदान करता है। हे इन्द ! (उषद्भिः) उषाकालों से प्रकाशित सूर्य के समान (उषद्भिः) दाह करने वाले शत्रुसंतापक वीर पुरुषों के साथ (सम् अजायथाः) परम शत्रु संतापक होकर प्रकट होता है।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
१-३ शुनःशेपः ४-६ मधुच्छन्दाः ऋषिः। इन्द्रो देवता। १६ गायत्र्यः षडृचं सूक्तम्॥
इंग्लिश (4)
Subject
Self-integration
Meaning
Children of the earth, know That who creates light and knowledge for the ignorant in darkness and gives form and beauty to the formless and chaotic, and regenerate yourselves by virtue of the men of knowledge and passion for action.
Translation
O men, you imparting knowledge to him who is deprived of it and providing with wealth, the man who has no wealth, emerge strong with shining zeal.
Translation
O men, you imparting knowledge to him who is deprived of it and providing with wealth, the man who has no wealth, emerge strong with shining zeal.
Translation
O men, look at him (the Sun), born along with the dawns, giving intelligence to the sleeping men, who had lost all sense of perception during sleep, and giving form and shape to things, which had lost all their identity in the darkness of the night.
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
यह मन्त्र यजुर्वेद में भी है-२६।३७ और महर्षिदयानन्दकृत ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका पृष्ठ ३०७ ग्रन्थप्रामाण्याप्रामाण्यविषय में भी व्याख्यात है ॥ ६−(केतुम्) केतुरिति प्रज्ञानाम-निघ० ३।९। प्रज्ञानम् (कृण्वन्) कृवि हिंसाकरणयोः-शतृ। कुर्वन् सन् सः परमेश्वरः-म० , ६ (अकेतवे) क्रियार्थोपपदस्य च कर्मणि स्थानिनः। पा० २।३।१४। इति तुमुनः कर्मणि चतुर्थी। अज्ञानं नाशयितुम् (पेशः) पिश गतौ-अवयवे दीपनायां च-असुन्। पेश इति हिरण्यनाम-निघ० १।२। पेश इति रूपनाम पिंशतेर्विपिशितं भवति निरु० ८।११। सुवर्णादिधनं रूपं वा (मर्याः) मनुष्याः (अपेशसे) निर्धनतां नाशयितुम् (सम्) सम्यक् (उषद्भिः) उष दाहे-शतृ। प्रकाशमानैर्गुणैः (अजायथाः) प्रथमपुरुषस्य मध्यमपुरुषः। अजायत। प्रादुरभवत् ॥
बंगाली (2)
मन्त्र विषय
৪-৬ পরমেশ্বরগুণোপদেশঃ
भाषार्थ
(মর্যাঃ) হে মনুষ্যগন ! (অকেতবে) অজ্ঞান দূর করার জন্য (কেতুম্) জ্ঞানকে এবং (অপেশসে) নির্ধনতা দূর করার জন্য (পেশঃ) সুবর্ণ আদি ধনকে (কৃণ্বন্) করে সেই [পরমাত্মা-মন্ত্র০ ৪, ৬] (উষদ্ভিঃ) প্রকাশমান গুণসমূহের সাথে (সম্) ভালোভাবে (অজায়থাঃ) প্রকট হয়েছেন ॥৬॥
भावार्थ
মনুষ্য প্রচেষ্টা করে পরমাত্মার বিচার করে সৃষ্টির পদার্থসমূহ থেকে উপকার গ্রহণ করে জ্ঞানী ও ধনী হবে/হোক ॥৬॥ এই মন্ত্র যজুর্বেদেও আছে-২৬।৩৭ এবং মহর্ষিদয়ানন্দকৃত ঋগ্বেদাদিভাষ্যভূমিকা পৃষ্ঠা ৩০৭ গ্রন্থপ্রামাণ্যাপ্রামাণ্যবিষয়েও ব্যাখ্যাত রয়েছে ॥
भाषार्थ
(মর্যাঃ) হে উপাসকগণ! দেখো যোগবিধি দ্বারা যুক্ত পরমেশ্বর (উষদ্ভিঃ) ঊষাকালের সাথে-সাথে (সম্ অজায়থাঃ) আমাদের যোগীদের মধ্যে সম্যক্=প্রকট হয়েছেন। তিনি (অকেতবে) প্রজ্ঞানরহিত উপাসকের জন্য (কেতুম্) প্রজ্ঞান (কৃণ্বন্) প্রকট করেন। এবং (অপেশসে) যে আধ্যাত্মিক রঙ-রূপ যুক্ত হয়নি উহার ওপর (পেশঃ) নতুন আধ্যাত্মিক রঙ রূপ যুক্ত করেন। [পেশঃ=রূপম্ (নিঘং০ ৩.৭)।]
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