अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 28/ मन्त्र 4
ऋषिः - गोषूक्त्यश्वसूक्तिनौ
देवता - इन्द्रः
छन्दः - गायत्री
सूक्तम् - सूक्त-२८
47
अ॒पामू॒र्मिर्मद॑न्निव॒ स्तोम॑ इन्द्राजिरायते। वि ते॒ मदा॑ अराजिषुः ॥
स्वर सहित पद पाठअ॒पाम् । ऊ॒र्मि: । मद॑न्ऽइव । स्तोम॑: । इ॒न्द्र॒ । अ॒जि॒र॒ऽय॒ते॒ । वि । ते॒ । मदा॑: । अ॒रा॒जि॒षु॒: ॥२८.४॥
स्वर रहित मन्त्र
अपामूर्मिर्मदन्निव स्तोम इन्द्राजिरायते। वि ते मदा अराजिषुः ॥
स्वर रहित पद पाठअपाम् । ऊर्मि: । मदन्ऽइव । स्तोम: । इन्द्र । अजिरऽयते । वि । ते । मदा: । अराजिषु: ॥२८.४॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
परमेश्वर की उपासना का उपदेश।
पदार्थ
(इन्द्र) हे इन्द्र ! [बड़े ऐश्वर्यवाले परमात्मन्] (ते) तेरी (स्तोमः) बड़ाई (अपाम्) जलों की (मदन्) हर्ष बढ़ानेवाली (ऊर्मिः इव) लहर के समान (अजिरायते) वेग से चलती है, और (मदाः) आनन्द (वि अराजिषुः) विराजते हैं [विविध प्रकार ऐश्वर्य बढ़ाते हैं] ॥४॥
भावार्थ
न्यायकारी जगदीश्वर की उत्तम नीति को मानकर सब लोग आनन्द पाकर शीघ्र ऐश्वर्य बढ़ावें ॥४॥
टिप्पणी
४−(अपाम्) जलानाम् (ऊर्मिः) तरङ्गः (मदन्) आनन्दयन् (इव) यथा (स्तोमः) स्तुतिः (इन्द्र) हे परमैश्वर्यवन् (अजिरायते) अजिरशिशिरशिथिल०। उ० १।३। अज गतिक्षेपणयोः-किरच्। अजिरं क्षिप्रनाम-निघ० २।१। तत्करोतीत्युपसंख्यानं सूत्रयत्याद्यर्थम्। वा० पा०। ३।१।२६। अजिर-णिच्, सांहितिको दीर्घः। अजिरं क्षिप्रं करोति। शीघ्रं गच्छति (वि) विविधम् (ते) तव (मदाः) आनन्दाः (अराजिषुः) लङर्थे लुङ्। राजतीति ऐश्वर्यकर्मा-निघ० २।२१। ऐश्वर्यं वर्धयन्ति। शोभन्ते ॥
विषय
सोमः अजिरायते
पदार्थ
१. हे (इन्द्र) = सर्वशक्तिमन् प्रभो! (अपाम् ऊर्मि: इव) = समुद्रगत जलों की तरंग की भाँति मदन उल्लसित होती हुई (स्तोम:) = स्तुतिवाणी (अजिरायते) = क्षिप्रगामी की भाँति आचरण करती है, अर्थात् शीघ्रता से मेरे मुख से आपके प्रति निर्गत होती है। हम उल्लासयुक्त होकर प्रभु के स्तवन में प्रवृत्त होते हैं। २. हे प्रभो! ऐसा करने पर (ते मदा:) = आपके द्वारा प्राप्त कराये गये सोमपानजनित मद [उल्लास] (अराजिषु:) = विशिष्टरूप से दीप्त होते हैं। हम सोम-रक्षण द्वारा आनन्दमय जीवनवाले बनते हैं।
भावार्थ
हम प्रभु-स्तवन करते हैं। उल्लसित जीवनवाले होकर सोम-रक्षण से एक विशिष्ट आनन्द का अनुभव करते हैं। अगले सूक्त के ऋषि भी पूर्ववत् ही हैं -
भाषार्थ
(अपाम्) जलों की (ऊर्मिः) तरङ्गों के (इव) सदृश (स्तोमः) सामगान की तरङ्गें, (इन्द्र) हे परमेश्वर! (मदन्) आपको प्रसन्न करती हुईं (अजिरायते) नदी के प्रवाह के सदृश प्रवाहित हो रही हैं। और (मदाः ते) मुझ उपासकों में मस्ती देनेवाले आपके आनन्दरस (वि) विशेषरूप में (अराजिषुः) मुझ उपासक पर राज्य कर रहे हैं।
टिप्पणी
[अजिरायते=अजिरा (=नदी, निघं০ १.१३)+क्यच्।]
विषय
राजा का कर्त्तव्य
भावार्थ
हे (इन्द्र) ऐश्वर्यवन् ! राजन् ! (स्तोमः) तेरी स्तुतियों का समूह (अपाम् ऊर्मिः इव) समुद्र के तरङ्ग के समान (मदन् इव) मानो हर्ष से तरङ्गित सा होकर (अजिरायते) बड़े वेग से उमड़ा सा पड़ता है। (ते मदाः) तेरे आनन्द, प्रमोद और उत्साह के कार्य (वि अराजिषुः) विविधरूपों में विराजते दीख रहे हैं।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
गोसूक्त्यश्वसूक्तिना वृषी। १, २ गायत्र्यौ। ३, ४ त्रिष्टुभौ। चतुर्ऋचं सूक्तम्॥
इंग्लिश (4)
Subject
Self-integration
Meaning
Like exulting waves of the sea, this hymn of adoration rises and reaches you, and the vibrations of your joyous response too emanate and pervade everywhere.
Translation
Like a wave of water-flow the gust of this air catches speed and its gladdening powers glow in splendour.
Translation
Like a wave of water-flow the gust of this air catches speed and its gladdening powers glow in splendor.
Translation
O All-powerful God, Thy laud gushes forth like the joyous waves of waters and Thy pleasant deeds shine forth in various forms..
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
४−(अपाम्) जलानाम् (ऊर्मिः) तरङ्गः (मदन्) आनन्दयन् (इव) यथा (स्तोमः) स्तुतिः (इन्द्र) हे परमैश्वर्यवन् (अजिरायते) अजिरशिशिरशिथिल०। उ० १।३। अज गतिक्षेपणयोः-किरच्। अजिरं क्षिप्रनाम-निघ० २।१। तत्करोतीत्युपसंख्यानं सूत्रयत्याद्यर्थम्। वा० पा०। ३।१।२६। अजिर-णिच्, सांहितिको दीर्घः। अजिरं क्षिप्रं करोति। शीघ्रं गच्छति (वि) विविधम् (ते) तव (मदाः) आनन्दाः (अराजिषुः) लङर्थे लुङ्। राजतीति ऐश्वर्यकर्मा-निघ० २।२१। ऐश्वर्यं वर्धयन्ति। शोभन्ते ॥
बंगाली (2)
मन्त्र विषय
পরমেশ্বরোপাসনোপদেশঃ
भाषार्थ
(ইন্দ্র) হে ইন্দ্র! [পরম্ ঐশ্বর্যবান্ পরমাত্মা] (তে) তোমার (স্তোমঃ) স্তুতি/প্রশংসা (অপাম্) জলের (মদন্) আনন্দ বৃদ্ধিকারী (ঊর্মিঃ ইব) ঢেউ এর ন্যায় (অজিরায়তে) শীঘ্রগামী, এবং (মদাঃ) আনন্দ (বি অরাজিষুঃ) বিরাজ করে [বিবিধ প্রকার ঐশ্বর্য বৃদ্ধি করে]॥৪॥
भावार्थ
ন্যায়কারী জগদীশ্বরের উত্তম নীতি মানৃ করে সকল মনুষ্য আনন্দিত হয়ে শীঘ্রই ঐশ্বর্য বৃদ্ধি করুক ॥৪॥
भाषार्थ
(অপাম্) জলের (ঊর্মিঃ) তরঙ্গের (ইব) সদৃশ (স্তোমঃ) সামগানের তরঙ্গ, (ইন্দ্র) হে পরমেশ্বর! (মদন্) আপনাকে প্রসন্ন করে (অজিরায়তে) নদীর প্রবাহের সদৃশ প্রবাহিত হচ্ছে। এবং (মদাঃ তে) আমার [উপাসকের] মধ্যে উন্মাদনা প্রদানকারী আপনার আনন্দরস (বি) বিশেষরূপে (অরাজিষুঃ) আমার [উপাসকের] ওপর শাসন করছে।
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