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अथर्ववेद के काण्ड - 20 के सूक्त 39 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 39/ मन्त्र 5
    ऋषिः - गोषूक्तिः, अश्वसूक्तिः देवता - इन्द्रः छन्दः - गायत्री सूक्तम् - सूक्त-३९
    45

    अ॒पामू॒र्मिर्मद॑न्निव॒ स्तोम॑ इन्द्राजिरायते। वि ते॒ मदा॑ अराजिषुः ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    अ॒पाम् । ऊ॒र्मि: । मद॑न्ऽइव । स्तोम॑: । इ॒न्द्र॒ । अ॒जि॒र॒य॒ते॒ ॥ वि । ते॒ । मदा॑: । अ॒रा॒जि॒षु॒: ॥३९.५॥


    स्वर रहित मन्त्र

    अपामूर्मिर्मदन्निव स्तोम इन्द्राजिरायते। वि ते मदा अराजिषुः ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    अपाम् । ऊर्मि: । मदन्ऽइव । स्तोम: । इन्द्र । अजिरयते ॥ वि । ते । मदा: । अराजिषु: ॥३९.५॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 20; सूक्त » 39; मन्त्र » 5
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    परमेश्वर की उपासना का उपदेश।

    पदार्थ

    (इन्द्र) हे इन्द्र ! [बड़े ऐश्वर्यवाले परमात्मन्] (ते) तेरी (स्तोमः) बड़ाई (अपाम्) जलों की (मदन्) हर्ष बढ़ानेवाली (ऊर्मिः इव) लहर के समान (अजिरायते) वेग से चलती है, और (मदः) आनन्द (वि अराजिषुः) विराजते हैं [विविध प्रकार ऐश्वर्य बढ़ाते हैं] ॥॥

    भावार्थ

    न्यायकारी परमात्मा की उत्तम नीति को मानकर सब लोग आनन्द पाकर शीघ्र ऐश्वर्य बढ़ावें ॥॥

    टिप्पणी

    −मन्त्राः २- व्याख्याताः-अ०२–०।२८।१-४॥

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    विषय

    मदा:

    पदार्थ

    १.हे (इन्द्र) = सर्वशक्तिमन् प्रभो! (अपाम् ऊर्मि: इव) = जलों की तरंग की भाँति (मदन) = उल्लसित होता हुआ (स्तोमः) = यह स्तवन (अजिरायते) = अत्यन्त शीघ्र गतिवाला होता है। यह स्तोम हमारे मुख से उच्चरित होकर शीघ्रता से आपकी ओर गतिवाला होता है। २. ऐसा होने पर हे प्रभो! (ते मदा:) = आपसे प्राप्त कराये गये उल्लासजनक सोम (वि अराजिषुः) = विशिष्ट रूप से दीप्त होते हैं। प्रभु-स्तवन से वासनाओं का आक्रमण नहीं होता और सोम-रक्षण होकर आनन्द का अनुभव होता है।

    भावार्थ

    हम प्रभु-स्तवन में प्रवृत्त होते हैं, परिमाणत: हमारा जीवन शक्ति-सम्पन्न व उल्लासमय बनता है। अगले सूक्त का ऋषि 'मधुच्छन्दाः ' ही है-उत्तम मधुर इच्छाओंवाला -

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    भाषार्थ

    (अपाम्) जलों की (ऊर्मिः) तरङ्गों के (इव) सदृश (स्तोमः) सामगान की तरङ्गें, (इन्द्र) हे परमेश्वर! (मदन्) आपको प्रसन्न करती हुईं (अजिरायते) नदी के सदृश प्रवाहित हो रही हैं, और (मदाः ते) मुझ उपासक में मस्ती देनेवाले आपके आनन्दरस (वि) विशेषरूप में (अराजिषुः) मुझ उपासक पर राज्य कर रहे हैं।

    टिप्पणी

    [व्याख्या के लिए देखो मन्त्रसंख्या (सू০ २८, मं০ ४)।]

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    विषय

    ईश्वर और राजा।

    भावार्थ

    हे (इन्द्र) इन्द्र ! प्रभो ! (स्तोमः) तेरा स्तुति समूह अथवा तेरा वीर्य, सामर्थ्य अथवा तेरा बड़ा स्वरूप (मदन्) अति हर्षित मानो (अपाम् ऊर्मिः इव) जलों के तरङ्ग के समान (अजिरायते) वेग से बराबर बढ़ा करता है। (ते मदाः) तेरे हर्ष या आनन्द तरङ्ग (वि अराजिषुः) विविध रूपों में प्रकट होते हैं।

    टिप्पणी

    वीर्यं वै स्तोमाः। तां० २। ५। ४॥ यज्ञो वै स्तोमः। श० ८।४।३।२॥ मदः—यो वा ऋचि मदो यः सामन् रसो वै सः श० ४। २। ३। ५॥

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    १ मधुच्छन्दाः २-५ इरिम्बिठिश्च ऋषी। इन्द्रो देवता। गायत्र्यः। पञ्चर्चं सूक्तम्॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    lndra Devata

    Meaning

    Like exulting waves of the sea, this hymn of adoration rises and reaches you, and the vibrations of your joyous response too emanate and pervade everywhere.

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    Translation

    O Almighty God, your strength (stoma) moving the worlds like water wave continuously exceeds in strength and Your pleasant operations become manifest to all.

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    Translation

    O Almighty God, your strength (Stoma) moving the worlds like water wave continuously excesds in strength and Your pleasant operations become manifest to all.

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    Translation

    O Mighty Lord, .Thy energy and glory go on joyously forward like the wave of waters. They shine in various forms in the world.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    −मन्त्राः २- व्याख्याताः-अ०२–०।२८।१-४॥

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    बंगाली (2)

    मन्त्र विषय

    পরমেশ্বরোপাসনোপদেশঃ

    भाषार्थ

    (ইন্দ্র) হে ইন্দ্র! [পরম্ ঐশ্বর্যবান্ পরমাত্মা] (তে) তোমার (স্তোমঃ) স্তুতি/প্রশংসা (অপাম্) জলের (মদন্) আনন্দ বৃদ্ধিকারী (ঊর্মিঃ ইব) ঢেউ এর ন্যায় (অজিরায়তে) শীঘ্রগামী, এবং (মদাঃ) আনন্দ (বি অরাজিষুঃ) বিরাজ করে [বিবিধ প্রকার ঐশ্বর্য বৃদ্ধি করে]॥৫॥

    भावार्थ

    ন্যায়কারী জগদীশ্বরের উত্তম নীতি মানৃ করে সকল মনুষ্য আনন্দিত হয়ে শীঘ্রই ঐশ্বর্য বৃদ্ধি করুক ॥৫॥

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    भाषार्थ

    (অপাম্) জলের (ঊর্মিঃ) তরঙ্গের (ইব) সদৃশ (স্তোমঃ) সামগানের তরঙ্গ-সমূহ, (ইন্দ্র) হে পরমেশ্বর! (মদন্) আপনাকে প্রসন্ন করে (অজিরায়তে) নদীর সদৃশ প্রবাহিত হচ্ছে, এবং (মদাঃ তে) আমার [উপাসকের] মধ্যে আনন্দ প্রদায়ী আপনার আনন্দরস (বি) বিশেষরূপে (অরাজিষুঃ) আমার [উপাসকের] ওপর রাজ্য/রাজত্ব করছে।

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