अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 88/ मन्त्र 5
स सु॒ष्टुभा॒ स ऋक्व॑ता ग॒णेन॑ व॒लं रु॑रोज फलि॒गं रवे॑ण। बृह॒स्पति॑रु॒स्रिया॑ हव्य॒सूदः॒ कनि॑क्रद॒द्वाव॑शती॒रुदा॑जत् ॥
स्वर सहित पद पाठस: । सु॒ऽस्तु॒भा॑ । स: । ऋक्व॑ता । ग॒णेन॑ । व॒लम् । रु॒रो॒ज॒ । फ॒लि॒ऽगम् । र॒वे॑ण ॥ बृह॒स्पति॑: । उ॒स्रिया॑: । ह॒व्य॒ऽसूद॑: । कनि॑क्रदत् । वाव॑शती: । उत् । आ॒ज॒त् ॥८८.५॥
स्वर रहित मन्त्र
स सुष्टुभा स ऋक्वता गणेन वलं रुरोज फलिगं रवेण। बृहस्पतिरुस्रिया हव्यसूदः कनिक्रदद्वावशतीरुदाजत् ॥
स्वर रहित पद पाठस: । सुऽस्तुभा । स: । ऋक्वता । गणेन । वलम् । रुरोज । फलिऽगम् । रवेण ॥ बृहस्पति: । उस्रिया: । हव्यऽसूद: । कनिक्रदत् । वावशती: । उत् । आजत् ॥८८.५॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
विद्वानों के कर्तव्य का उपदेश।
पदार्थ
(सः सः) उसी ही [वीर पुरुष] ने (सुष्टुभा) बड़ी स्तुतिवाले (ऋक्वता) पूजनीय वाणीवाले (गणेन) समुदाय के साथ (फलिगम्) फूट डालनेवाले [वा मेघ के समान अन्धकार के फैलानेवाले] (वलम्) हिंसक वैरी को (रवेण) शब्द [धर्म घोषणा] (रुरोज) भङ्ग किया है। (हव्यसूदः) देने वा लेने योग्य पदार्थों की प्रतिज्ञा करनेवाले, (कनिक्रदत्) बल से पुकारते हुए (बृहस्पतिः) बृहस्पति [बड़ी विद्याओं के रक्षक मनुष्य] ने (वावशतीः) अत्यन्त कामना करती हुई (उस्रियाः) रहनेवाली प्रजाओं को (उत् आजत्) ऊँचा किया है ॥॥
भावार्थ
विद्वान् सभापति राजा अज्ञान फैलानेवाले शत्रुओं का नाश करके विद्या और धन की वृद्धि से प्रजा का पालन करें ॥॥
टिप्पणी
−(सः सः) स एव (सुष्टुभा) स्तोभतिरर्चतिकर्मा-निघ० ३।१४-क्विप्। शोभनस्तुतिमतां (ऋक्वता) ऋच स्तुतौ-क्विप्, मतुप्, मस्य वः। अयस्मयादीनि च्छन्दसि। पा० १।४।२०। पदत्वात् कुत्वं भत्वाज् जश्त्वाभावः। ऋग् वाङ्नाम-निघ० १।११। पूजनीयवाणीयुक्तेन (गणेन) समुदायेन (वलम्) हिंसकं शत्रुम् (रुरोज) बभञ्ज (फलिगम्) सर्वधातुभ्य इन्। उ० ४।११८। ञिफला विशरणे-इन्+गमेर्डः, अन्तर्गतण्यर्थः। फलिगो मेघनाम-निघ० १।१०। भेदस्य प्रापकम्। मेघमिवान्धकारम्य प्रसारकम् (रवेण) शब्देन। धर्मघोषणया (बृहस्पतिः) बृहतीनां विद्यानां रक्षकः (उस्रियाः) अ० २०।१६।६। निवासशीलाः प्रजाः (हव्यसूदः) षूद क्षरणे, अङ्गीकारे, प्रतिज्ञायां मारणे च-अच्। हव्यानां दातव्यग्राह्यपदार्थानां प्रतिज्ञाकरः (कनिक्रदत्) अ० २।३०।। भृशमाह्वयन्तम् (वावशतीः) वश कान्तौ यङलुकि-शतृ, ङीप्। भृशं कामयमानाः (उत्) उपरिभागे (आजत्) अ० २०।१६।। अगमयत् ॥
विषय
'वल व फलिगं' का विनाश
पदार्थ
१. (सः) = वे (बृहस्पति:)= ज्ञान के स्वामी प्रभु (सुष्टुभा) = उत्तम स्तुतियोंवाले गणेन मन्त्रसमूह से तथा (स:) = वे प्रभु (ऋक्वता) = ऋचाओंवाले-विज्ञानवाले [गणेन] मन्त्रसमूह से (वलम्) = ज्ञान के आवरणभूत [Vail] इस वल नामक असुर को (रुरोज) = विनष्ट करते हैं। (रवेण) = हृदयस्थरूपेण इन ज्ञान की वाणियों के उच्चारण से (फलिगम्) = विशीर्णता की ओर ले जानेवाली [बल विशरणे] आसुरीवृत्ति को विनष्ट करते हैं। २. (बृहस्पति:) = वे ज्ञान के स्वामी प्रभु (हव्यसूद:) = सब हव्य पदार्थों को-पवित्र यज्ञिय पदार्थों को प्राप्त करानेवाली (वावशती:) = हमारा अत्यन्त हित चाहती हुई (उस्त्रिया:) = ज्ञान की रश्मियों को (उदाजत्) = हममें उत्कर्षेण प्रेरित करते हैं। इन ज्ञानरश्मियों को प्राप्त करके ही हम इस संसार में अयज्ञिय बातों से दूर रहकर अपना हित सिद्ध कर पाते हैं।
भावार्थ
प्रभु ज्ञान की वाणियों के द्वारा ज्ञान की आवरणभूत वासना को विनष्ट करते हैं और सब विदीर्ण करनेवाली आसुरवृत्तियों को दूर करते हैं। अब हव्य पदार्थों की ओर हमारा झुकाव होता है।
भाषार्थ
(सुष्टुभा) उत्तम-स्तुतियोंवाले, (ऋक्वता) वेदज्ञ (गणेन) उपासक-गुणोंवाला, (सः सः) वह ही (बृहस्पतिः) महाब्रह्माण्ड का पति, (रवेण) केवल निज मूक-आज्ञा द्वारा, (फलिगम्) फल्गु अर्थात् निःसार (वलम्) अविद्या के आवरण को, (रुरोज) छिन्न-भिन्न कर देता है। (हव्यसूदः) समर्पणीय भक्तिरसरूपी हवि को क्षरित अर्थात् प्रवाहित करनेवाले (उस्रियाः) प्रकाश-प्रवाहों को, बृहस्पति प्रवाहित कर देता है। तथा (कनिक्रदत्) योगमार्ग की अगली-अगली भूमिकाओं की ओर योगी का आह्वान करता हुआ बृहस्पति, (वावशतीः) अधिकाधिक कान्तिमयी ज्ञानरश्मियों को (उदाजत्) उदित करता रहा है।
टिप्पणी
[उस्राः=रश्मिनाम (निघं০ १.५) उस्रिया=नदीनाम (निघं০ १.१३)। मन्त्र में प्रकाश के प्रवाहों को उस्रियाः कहा है। वावशतीः=वश कान्तौ। वश्मि=कान्तिकर्मा (निघं০ २.६)। वश्= To shine (आप्टे)।]
विषय
परमेश्वर सेनापति राजा।
भावार्थ
जिस प्रकार (बृहस्पतिः) बड़ा सेनापति (सुष्टुभिः) शत्रु को स्तम्भन करने वाले (ऋक्वता) ज्ञानवान् (गणेन) सेनागण से (फलिगं वलं) शस्त्रास्त्र से युक्त घेरने वाले शत्रु को (रवेण) बड़ी गर्जना से (रुरोज) नाश करता है उसी प्रकार (सः) वह (बृहस्पतिः) वेद वाणी का—बड़े भारी ज्ञान का पालक (सु-स्तुभा) उत्तम रूप से स्तुति करने वाले (ऋक्वता) ऋग्वेद के मन्त्रों से युक्त (गणेन) विद्वद्गण से और (रवेण) वेदोपदेश के बल से (फलिगम्) फलिंग अर्थात् अंग भेदन कर देने वाले शस्त्रास्त्रों सहित आचढ़ने वाले (वलम्) व्यापक शत्रुगण को (रुरोज) तोड़ डालता है, पीड़ित करता है। और वह ही (कनिक्रदत्) उपदेश करता हुवा (वावशतीः) हम्भारव करने वाली (हव्यसूदः) घृत आदि पुष्टिकारक पदार्थों को प्रदान करने वाली (उस्त्रियः) गौओं के समान ज्ञानरस पूर्ण (वावशतीः) नित्य उपदेशमय शब्द करती हुई (हव्यसूदः) ग्राह्य ज्ञान को भरती हुई (उस्त्रियाः) वेदवाणियों को (उत् आजत्) प्रकट करता है।
टिप्पणी
ष्टुभु स्तम्भे। भ्वादिः॥
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
वामदेव ऋषिः। बृहस्पतिदेवता। त्रिष्टुभः। षडृर्चं सूक्तम्॥
इंग्लिश (4)
Subject
Brhaspati Devata
Meaning
With a mighty jubilant roar of thunder and terrible shower of electric energy, Brhaspati breaks the crooked cloud, releases the showers, activates the produ¬ ction of food for holy offerings and wins the gratitude of the green earth, fertile cows and rejoicing humanity.
Translation
This Brihaspati (fire) with the help of the luminous swift group of airs and the thundering voice of lightning cleaves the darkening cloud. The fire which accepts the offered libations, thunders out gives rise to shining lightening rays.
Translation
This Brihaspati (fire) with the help of the luminous swift group of airs and the thundering voice of lightning cleaves the darkening cloud. The fire which accepts the offered libations, thunders out gives rise to shining lightening rays.
Translation
Let us thus pay our homage to the Great Protector, the Nourisher, the Radiant Lord of all people, the Benefactor of all, the All-powerful and the Showerer of all blessings, by our sacrificial acts and bowings and oblations. O Mighty Lord of fortunes, king, commander or learned person, may be the masters of good progeny, heroic persons, and the riches of all sorts.
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
−(सः सः) स एव (सुष्टुभा) स्तोभतिरर्चतिकर्मा-निघ० ३।१४-क्विप्। शोभनस्तुतिमतां (ऋक्वता) ऋच स्तुतौ-क्विप्, मतुप्, मस्य वः। अयस्मयादीनि च्छन्दसि। पा० १।४।२०। पदत्वात् कुत्वं भत्वाज् जश्त्वाभावः। ऋग् वाङ्नाम-निघ० १।११। पूजनीयवाणीयुक्तेन (गणेन) समुदायेन (वलम्) हिंसकं शत्रुम् (रुरोज) बभञ्ज (फलिगम्) सर्वधातुभ्य इन्। उ० ४।११८। ञिफला विशरणे-इन्+गमेर्डः, अन्तर्गतण्यर्थः। फलिगो मेघनाम-निघ० १।१०। भेदस्य प्रापकम्। मेघमिवान्धकारम्य प्रसारकम् (रवेण) शब्देन। धर्मघोषणया (बृहस्पतिः) बृहतीनां विद्यानां रक्षकः (उस्रियाः) अ० २०।१६।६। निवासशीलाः प्रजाः (हव्यसूदः) षूद क्षरणे, अङ्गीकारे, प्रतिज्ञायां मारणे च-अच्। हव्यानां दातव्यग्राह्यपदार्थानां प्रतिज्ञाकरः (कनिक्रदत्) अ० २।३०।। भृशमाह्वयन्तम् (वावशतीः) वश कान्तौ यङलुकि-शतृ, ङीप्। भृशं कामयमानाः (उत्) उपरिभागे (आजत्) अ० २०।१६।। अगमयत् ॥
बंगाली (2)
मन्त्र विषय
বিদ্বৎকর্তব্যোপদেশঃ
भाषार्थ
(সঃ সঃ) সেই [বীর পুরুষ] (সুষ্টুভা) শোভন স্তুতিযুক্ত (ঋক্বতা) পূজনীয় বাণীযুক্ত (গণেন) বর্গকে সঙ্গে নিয়ে (ফলিগম্) বিভেদ সৃষ্টিকারী [বা মেঘের সমান অন্ধকার প্রসারণকারী] (বলম্) হিংসক শত্রুদের (রবেণ) শব্দ দ্বারা [ধর্ম ঘোষণা] (রুরোজ) ভঙ্গ করেছে/বিনাশ করেছে। (হব্যসূদঃ) বিনিময় যোগ্য পদার্থের প্রতিজ্ঞাকারী, (কনিক্রদৎ) বলের সহিত আহ্বান পূর্বক (বৃহস্পতিঃ) বৃহস্পতি [শ্রেষ্ঠ বিদ্যার রক্ষক মনুষ্য] (বাবশতীঃ) অত্যন্ত কামনাযুক্ত হয়ে (উস্রিয়াঃ) নিবাসী প্রজাদের (উৎ আজৎ) উঁচু স্থান দিয়েছে॥৫॥
भावार्थ
বিদ্বান্ সভাপতি রাজা অজ্ঞান বিস্তারকারী শত্রুদের বিনাশ করে বিদ্যা ও ধনের বৃদ্ধি দ্বারা প্রজার পালন করে/করুক॥৫॥
भाषार्थ
(সুষ্টুভা) উত্তম-স্তুতিযুক্ত, (ঋক্বতা) বেদজ্ঞ (গণেন) উপাসক-গুণযুক্ত, (সঃ সঃ) সেই ই (বৃহস্পতিঃ) মহাব্রহ্মাণ্ডের পতি, (রবেণ) কেবল নিজ মূক(mute)-আজ্ঞা দ্বারা, (ফলিগম্) ফল্গু অর্থাৎ নিঃসার (বলম্) অবিদ্যার আবরণকে, (রুরোজ) ছিন্ন-ভিন্ন করেন। (হব্যসূদঃ) সমর্পণীয় ভক্তিরসরূপী হবি ক্ষরিত অর্থাৎ প্রবাহিতকারী (উস্রিয়াঃ) প্রকাশ-প্রবাহকে, বৃহস্পতি প্রবাহিত করেন। তথা (কনিক্রদৎ) যোগমার্গের আগামী-আগামী ভূমিকার দিকে যোগীর আহ্বান করে বৃহস্পতি, (বাবশতীঃ) অধিকাধিক কান্তিময়ী জ্ঞানরশ্মি-সমূহ (উদাজৎ) উদিত করেন।
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