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अथर्ववेद के काण्ड - 20 के सूक्त 9 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 9/ मन्त्र 4
    ऋषिः - मेध्यातिथिः देवता - इन्द्रः छन्दः - प्रगाथः सूक्तम् - सूक्त-९
    45

    येना॑ समु॒द्रमसृ॑जो म॒हीर॒पस्तदि॑न्द्र॒ वृष्णि॑ ते॒ शवः॑। स॒द्यः सो अ॑स्य महि॒मा न सं॒नशे॒ यं क्षो॒णीर॑नुचक्र॒दे ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    येन॑ । स॒मु॒द्रम् । असृ॑ज:। म॒ही: । अ॒प: । तत् । इ॒न्द्र॒ । वृष्णि॑ । ते॒ । शव॑: ॥ स॒द्य: । स: । अ॒स्य॒ । म॒हि॒मा । न । स॒म्ऽनशे॑ । यम् । क्षो॒णी: । अ॒नु॒ऽच॒क्र॒दे॥९.४॥


    स्वर रहित मन्त्र

    येना समुद्रमसृजो महीरपस्तदिन्द्र वृष्णि ते शवः। सद्यः सो अस्य महिमा न संनशे यं क्षोणीरनुचक्रदे ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    येन । समुद्रम् । असृज:। मही: । अप: । तत् । इन्द्र । वृष्णि । ते । शव: ॥ सद्य: । स: । अस्य । महिमा । न । सम्ऽनशे । यम् । क्षोणी: । अनुऽचक्रदे॥९.४॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 20; सूक्त » 9; मन्त्र » 4
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    ईश्वर की उपासना का उपदेश।

    पदार्थ

    (येन) जिस [बल] से (समुद्रम्) समुद्र में (महीः) शक्तिशाली (अपः) जलों को (असृजः) तूने उत्पन्न किया है, (इन्द्रः) हे इन्द्र ! [परम ऐश्वर्यवान् जगदीश्वर] (तत्) वह (ते) तेरा (वृष्णि) पराक्रमयुक्त (शवः) बल है। (सद्यः) अब भी (अस्य) उस [परमात्मा] की (सः) वह (महिमा) महिमा [हमसे] (न) नहीं (संनशे) पाने योग्य है, (यम्) जिस [परमात्मा] को (क्षोणीः) लोकों ने (अनुचक्रदे) निरन्तर पुकारा है ॥४॥

    भावार्थ

    जिस परमात्मा ने मेघमण्डल में और पृथिवी पर जल आदि पदार्थ और सब लोकों को उत्पन्न करके अपने वश में रक्खा है, उसकी महिमा की सीमा को सृष्टि में कोई भी नहीं पा सकता है ॥४॥

    टिप्पणी

    ४−(येन) शवसा। बलेन (समुद्रम्) जलौघम् (असृजः) त्वं सृष्टवान् (महीः) महतीः। शक्तिशालिनीः (अपः) जलानि (तत्) तादृक् (इन्द्र) हे परमैश्वर्यवन् जगदीश्वर (वृष्णि) पराक्रमयुक्तम् (ते) तव (शवः) बलम् (सद्यः) इदानीमपि (सः) (अस्य) इन्द्रस्य। परमेश्वरस्य (महिमा) महत्त्वम् (न) निषेधे (संनशे) नशत्, व्याप्तिकर्मा-निघ० २।१८। कृत्यार्थे तवैकेन्केन्यत्वनः। पा० ३।४।१४। नश व्याप्तौ-केन् प्रत्ययः। सम्यक् प्रापणीयः (यम्) इन्द्रम् (क्षोणीः) वीज्याज्वरिभ्यो निः। उ० ४।४८। टुक्षु शब्दे-नि, ङीप्। क्षोणी पृथिवीनाम-निघ० १।१। क्षोण्यः। पृथिव्यः। लोकाः (अनुचक्रदे) निरन्तरं क्रन्दन्ति स्म ॥

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    विषय

    प्रभु की अनन्त महिमा

    पदार्थ

    १. हे (इन्द्र) = सर्वशक्तिमन् प्रभो ! (येन) = जिस अपने महान् सामर्थ्य से आप (समुद्रम् असृज:) = समुद्र का सर्जन करते हैं, जिस सामर्थ्य से आप इन (मही: अपः) = अनन्त-से विस्तारवाले जलों का निर्माण करते हैं अथवा पृथिवियों व जलों का निर्माण करते हैं। (ते) = आपका (तत् शव:) = वह बल (वृष्णि) = हमपर सुखों का सेचन व वर्षण करनेवाला है। २. (अस्य) = इस प्रभु की (स:) = वह महिमा महिमा व सामर्थ्य सद्य:-शीघ्र न संनशे-औरों से व्याप्त नहीं की जा सकती। वह महिमा, यम्-जिसको क्षोणी:पृथिवीस्थ प्राणिसमूह अनुचक्रदे-उद्घोषित करता है।

    भावार्थ

    समुद्रों में व महान् जलों में प्रभु की महिमा का प्रकाश होता है। प्रभु की महिमा का कोई भी व्यापन नहीं कर सकता। सब प्राणी प्रभु की महिमा का उद्घोष करते हैं।

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    भाषार्थ

    (येन) जिस सामर्थ्य से आपने (समुद्रम्) समुद्र का, और उसमें (महीः अपः) महाराशिरूप में जलोें का (असृजः) सर्जन किया है, (इन्द्र) हे परमेश्वर! (तत्) वह (वृष्णि) वर्षाकारी (शवः) सामर्थ्य (ते) आपका ही है। (अस्य) इस परमेश्वर की (सः) वह (महिमा) महिमा (सद्यः) शीघ्र (संनशे न) नहीं समझी जा सकती, (यम्) जिस महिमा को (क्षोणीः) अन्तरिक्ष वर्षाकाल में (अनु चक्रदे) बार-बार गुंजाता रहता है।

    टिप्पणी

    [अभिप्राय यह है कि परमेश्वर में वर्षाकारी सामर्थ्य है। उसी के द्वारा समुद्रों का सर्जन हुआ है, और अन्तरिक्ष में मेघों की गर्जनाएं होती हैं।]

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    विषय

    परमेश्वर और राजा।

    भावार्थ

    हे परमेश्वर ! (येन) जिस महान् सामर्थ्य से तू (समुद्रम् असृजः) समुद्र को उत्पन्न करता है और (महीः अपः) उसमें महान् अनन्त जलों को पैदा करता है। हे (इन्द्र) ऐश्वर्यवान् प्रभो (ते) तेरा तो (तत्) वह (वृष्णि) सकल सुखों का वर्षक, सबसे अधिक (शवः) बल है। हे पुरुषो ! (अस्य) उस प्रभु की (सः महिमा) वह महिमा जो (न संनशे) कभी पार नहीं की जा सकती। (यं) जिसको (क्षोणीः) जगत् के समस्त प्राणी (अनु चक्रदे) बराबर कहा करते हैं।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    १, २ नोधाः, ३, ४ मेधातिथिऋषिः। १, २ त्रिष्टुभौ, ३, ४ प्रगाथे। चतुर्ऋचं सूक्तम।

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Indr a Devata

    Meaning

    Indra, lord omnipotent of creation, I pray for the knowledge and experience of that overwhelming power and potential of yours by which you create the mighty waters and the oceans to roll and flow. That mighty power of this lord is not easily to be realised, the heaven and earth obey it, and when they move they celebrate it in the roaring and resounding music of stars and spheres.

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    Translation

    O Alimighty God, that is the most powerful strength of yours through which make the vast space and produce mighty waters therein. Even now and for ever is unattainable that great power of which the whole world speaks aloud.

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    Translation

    O Almighty God, that is the most powerful strength of yours — through which make the vast space and produce mighty waters therein. Even now and forever is unattainable that great power of which the whole world speaks aloud.

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    Translation

    O the Almighty, that is Thy peace-showering mighty by which Thou createst the sea and the mighty waters thereof. O people, that: Grandeur of His cannot be surpassed at once. All the creatures of the world constantly speak of it.

    Footnote

    cf. Rig, 8 3.10. Pt. Jai Dev Vidyalankar has referred it to the king also. Griffith’s talking of special Rishis by Bhrigu, Kanva and Praskanva is due to ignorance of the etymology of the Vedic words.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    ४−(येन) शवसा। बलेन (समुद्रम्) जलौघम् (असृजः) त्वं सृष्टवान् (महीः) महतीः। शक्तिशालिनीः (अपः) जलानि (तत्) तादृक् (इन्द्र) हे परमैश्वर्यवन् जगदीश्वर (वृष्णि) पराक्रमयुक्तम् (ते) तव (शवः) बलम् (सद्यः) इदानीमपि (सः) (अस्य) इन्द्रस्य। परमेश्वरस्य (महिमा) महत्त्वम् (न) निषेधे (संनशे) नशत्, व्याप्तिकर्मा-निघ० २।१८। कृत्यार्थे तवैकेन्केन्यत्वनः। पा० ३।४।१४। नश व्याप्तौ-केन् प्रत्ययः। सम्यक् प्रापणीयः (यम्) इन्द्रम् (क्षोणीः) वीज्याज्वरिभ्यो निः। उ० ४।४८। टुक्षु शब्दे-नि, ङीप्। क्षोणी पृथिवीनाम-निघ० १।१। क्षोण्यः। पृथिव्यः। लोकाः (अनुचक्रदे) निरन्तरं क्रन्दन्ति स्म ॥

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    बंगाली (2)

    मन्त्र विषय

    ঈশ্বরোপাসনোপদেশঃ

    भाषार्थ

    (যেন) যে [বল] দ্বারা (সমুদ্রম্) সমুদ্রের মধ্যে (মহীঃ) শক্তিশালী (অপঃ) জল (অসৃজঃ) তুমি উৎপন্ন করেছো, (ইন্দ্রঃ) হে ইন্দ্র ! [পরম ঐশ্বর্যবান্ জগদীশ্বর] (তৎ) তা (তে) তোমার (বৃষ্ণি) পরাক্রমযুক্ত (শবঃ) বল । (সদ্যঃ) এখনও (অস্য) সেই [পরমাত্মা] এর (সঃ) সেই (মহিমা) মহিমা [আমার/আমাদের দ্বারা] (ন) না (সংনশে) প্রাপ্তি যোগ্য, (যম্) যে [পরমাত্মাকে] (ক্ষোণীঃ) লোক-সমূহ (অনুচক্রদে) নিরন্তর আহবান করে ॥৪॥

    भावार्थ

    যে পরমাত্মা মেঘমণ্ডলে এবং পৃথিবীতে জল আদি পদার্থ এবং সব লোক-সমূহ উৎপন্ন করে নিজের বশে রেখেছেন, উনার মহিমার সীমাকে সৃষ্টিতে কেউই প্রাপ্ত করতে পারে না ॥৪॥

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    भाषार्थ

    (যেন) যে সামর্থ্য দ্বারা আপনি (সমুদ্রম্) সমুদ্রের, এবং উহার মধ্যে (মহীঃ অপঃ) মহারাশিরূপ জলের (অসৃজঃ) সৃষ্টি করেছেন, (ইন্দ্র) হে পরমেশ্বর! (তৎ) সেই (বৃষ্ণি) বর্ষাকারী (শবঃ) সামর্থ্য (তে) আপনারই আছে। (অস্য) এই পরমেশ্বরের (সঃ) সেই (মহিমা) মহিমা (সদ্যঃ) শীঘ্র (সংনশে ন) বোঝা যায় না, (যম্) যে মহিমাকে (ক্ষোণীঃ) অন্তরিক্ষ বর্ষাকালে (অনু চক্রদে) বার-বার গুঞ্জরিত করতে থাকে।

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