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अथर्ववेद के काण्ड - 3 के सूक्त 16 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 16/ मन्त्र 7
    ऋषिः - अथर्वा देवता - उषाः छन्दः - त्रिष्टुप् सूक्तम् - कल्याणार्थप्रार्थना
    62

    अश्वा॑वती॒र्गोम॑तीर्न उ॒षासो॑ वी॒रव॑तीः॒ सद॑मुच्छन्तु भ॒द्राः। घृ॒तं दुहा॑ना वि॒श्वतः॒ प्रपी॑ता यू॒यं पा॑त स्व॒स्तिभिः॒ सदा॑ नः ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    अश्व॑ऽवती: । गोऽम॑ती: । न॒: । उ॒षस॑: । वी॒रऽव॑ती: । सद॑म् । उ॒च्छ॒न्तु॒ । भ॒द्रा: । घृ॒तम् । दुहा॑ना: । वि॒श्वत॑: । प्रऽपी॑ता: । यू॒यम् । पा॒त॒ । स्व॒स्तिऽभि॑: । सदा॑ । न॒: ॥१६.७॥


    स्वर रहित मन्त्र

    अश्वावतीर्गोमतीर्न उषासो वीरवतीः सदमुच्छन्तु भद्राः। घृतं दुहाना विश्वतः प्रपीता यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    अश्वऽवती: । गोऽमती: । न: । उषस: । वीरऽवती: । सदम् । उच्छन्तु । भद्रा: । घृतम् । दुहाना: । विश्वत: । प्रऽपीता: । यूयम् । पात । स्वस्तिऽभि: । सदा । न: ॥१६.७॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 3; सूक्त » 16; मन्त्र » 7
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    बुद्धि बढ़ाने के लिये प्रभात गीत।

    पदार्थ

    (अश्ववतीः=०-त्यः) उत्तम-उत्तम घोड़ोंवाली, (गोमतीः) उत्तम-उत्तम गौओंवाली, (वीरवतीः) बहुत वीर पुरुषोंवाली और (भद्राः) मङ्गल करनेवाली (उषासः=उषसः) उषायें (नः सदम्) हमारे समाज पर (उच्छन्तु) चमकती रहें। (घृतम्) घृत [सार पदार्थ] को (दुहानाः) दुहते हुए और (विश्वतः) सब प्रकार से (प्रपीताः) भरे हुए (यूयम्) तुम [वीर पुरुषो !] (स्वस्तिभिः) अनेक सुखों से (सदा) सदा (नः) हमारी (पात) रक्षा करो ॥७॥

    भावार्थ

    सब स्त्री पुरुष प्रयत्न करके अपने घरों को घोड़ों, गौओं और वीर पुरुषों से भरे रक्खें, और सब मिलकर तत्त्व ग्रहण करके सदा परस्पर रक्षा करें ॥७॥ ‘यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः’ यह पाद प्रायः ऋग्वेद मण्डल ७ के सब सूक्तों के अन्त में है ॥

    टिप्पणी

    ७−(अश्ववतीः) प्रशस्ताश्ववत्यः। (गोमतीः) प्रशस्तगोमत्यः। (नः) अस्माकम्। (उषासः) उषसः। प्रभाताः। (वीरवतीः) बहुवीरवत्यः। (सदम्) षद्लृ गतौ-अच्। कालाध्वनोरत्यत्यन्तसंयोगे। पा० २।३।५। इति द्वितीया। समाजं प्रति। (उच्छन्तु) उच्छी समाप्तौ, अकर्मकः। अत्र दीप्तौ। समाप्ता व्युष्टाः प्रदीप्ता भवन्तु। (भद्राः) मङ्गलकारिण्यः। (घृतम्) सारपदार्थम्। (दुहानाः)। दुह प्रपूरणे-शानच्। प्रपूरयन्तः। (विश्वतः) सर्वतः। (प्रपीताः) प्यायः पी। पा० ६।१।२८। इति ओप्यायी वृद्धौ-क्त, पी आदेशः। प्रवृद्धाः। (यूयम्) वीरपुरुषाः। (पात) रक्षत। (स्वस्तिभिः) अनेकसुखैः। (सदा) सर्वस्मिन् काले। (नः) अस्मान् ॥

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    विषय

    'अश्वावती:, गोमती: वीरवती:' उषासः

    पदार्थ

    १.हे प्रभो! (न:) = हमारे लिए (अश्वावती:) = प्रशस्त कर्मेन्द्रियोंवाली, (गोमती:) = प्रशस्त ज्ञानेन्द्रियों वाली तथा (वीरवती:) = प्रशस्त यज्ञानियोंवाली [बीर-the sacrificial fire] (उषास:) = उषाएँ (सदम्) = सदा (उच्छन्तु) = रात्रि के अन्धकार को दूर करनेवाली हों। ये उषाएँ (भद्रा:) = हमारे लिए कल्याणकर हों। २. (घृतम्) = ज्ञानदीप्ति को हमारे अन्दर (दुहाना:) = पूर्ण करती हुई तथा (विश्वत:) = सब प्रकार से वृद्धि को प्राप्त हुई-हुई ये उषाएँ हमारे लिए सचमुच कल्याण का कारण बनें। (यूयम्) = सब देवो!आप (स्वस्तिभि:) = कल्याण-मागों के द्वारा (सदा) = सदा (नः) = हमें (पात) = सुरक्षित करो।

    भावार्थ

    उषाकाल में प्रबुद्ध होकर हम उत्तम कर्मेन्द्रियों और ज्ञानेन्द्रियोंवाले बनें, यज्ञशील हों हमारा ज्ञान बढ़े और हम सब प्रकार से वृद्धि को प्राप्त हों।

    विशेष

    अब यह उपासक सबका मित्र बनता है, विश्वामित्र' नामवाला होता है । यह कृषि आदि उपकारी कार्यों में ही प्रवृत्त होता है -

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    भाषार्थ

    (अश्वावती:) अश्वोंवाली, (गोमतीः) गौओंवाली, (वीरवती:) वीरपुत्रोंवाली (भद्राः) कल्याणकारिणी तथा सुखदायिनी (उषस:) उषाएं (नः) हमारे लिए (सदम्) सदा (उच्छन्तु) चमकती रहें। (घृतम्) घृत मिश्रित दुग्ध को (दुहाना:) देती हुई (विश्वतः) सब ओर (प्रपीता:) प्रकर्षेण आप्यायित हुई (यूयम्) तुम हे उषाओं! (स्वस्तिभिः) उत्तम स्थितियों द्वारा (नः) हमारी (सदा पात) सदा रक्षा करो।

    टिप्पणी

    [अभिप्राय यह कि प्रति प्रातःकाल की उषाओं के चमकते समय हमारे अश्व आदि यथावस्थित रहें, जैसेकि उषा:काल के पूर्व वे विद्यमान थे। उषा:कालों में हम गोदोहन कर घृतमिश्रित दुग्ध को प्राप्त करें। उषाएं हमारे स्वास्थ्य की रक्षा करती हैं ]

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    विषय

    नित्य प्रातः ईश्वरस्तुति का उपदेश ।

    भावार्थ

    उषो देवता । हे (उषासः) पूर्व में प्रभात प्रकाश के समान ज्योतिष्मती या दहन करने हारी उषारूप प्रज्ञाओ ! आप (अश्ववतीः) अश्व=आत्मा के बल से सम्पन्न एवं (गोमतीः) इन्द्रियों या प्राणों के बल से सम्पन्न [ उषापक्ष में ] या अश्व = सूर्य से सम्पन्न और गो=किरणों से सम्पन्न (वीरवतीः) वीर = प्राणों से सम्पन्न (भद्राः) कल्याण, सुखकारिणी होकर (सदम्) मेरे हृदय-प्रदेश को (उच्छन्तु) प्रकाशित करो । (घृतं) प्रकाशमय रूप आत्मा, सत्यज्ञान या आनन्द, अमृतरस को (दुहानाः) परिपूर्ण करती हुई, प्रकट हुई (विश्वतः) सब प्रकार (प्रपीताः) परिपुष्ट होकर (यूयं) आप (नः) हमारी (सदा) निरन्तर सब कालों में (पात) रक्षा करो ।

    टिप्पणी

    (तृ०) ‘प्रपीना’ इति तै० ब्रा०। ‘प्रवीणाः’ इति पैप्प० सं०।

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    अथर्वा ऋषिः । बृहस्पत्यादयो नाना देवताः । १ आर्षी जगती । ४ भुरिक् पंक्तिः । २, ३, ५-७ त्रिष्टुभः । सप्तर्चं सूक्तम् ॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Morning Prayer

    Meaning

    The holy dawns replete with vapours, blest with sun beams, pregnant with energy and abundant and generous with bliss may, we pray, sanctify our home and, bringing showers of ghrta and water, may fill our life with all round prosperity. And may you all, brilliant powers of nature and humanity rising like the dawn, protect and promote us with good fortune for all time.

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    Translation

    May the auspicious mornings dawn on us ever,with wealth of vitality (ašvavatī), with the wealth of wisdom (gomati) and valiant prosperity (vīravatī). May she come streaming with all abundance and affection. May you along with the divine ‘forces ever cherish us with blessings.

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    Translation

    May the auspicious Mornings dawn ons us with the wealth of horses, kines and heroes, May they Preserve us ever with happiness flowing butter and fall being full of rich abundance.

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    Translation

    O wise judgements, brilliant like the Dawn, equipped with the soul-force, the force of organs, and the force of breaths, affording joy, enlighten my heart, strengthening the soul, streaming with abundance, do you preserve us evermore with blessings!

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    ७−(अश्ववतीः) प्रशस्ताश्ववत्यः। (गोमतीः) प्रशस्तगोमत्यः। (नः) अस्माकम्। (उषासः) उषसः। प्रभाताः। (वीरवतीः) बहुवीरवत्यः। (सदम्) षद्लृ गतौ-अच्। कालाध्वनोरत्यत्यन्तसंयोगे। पा० २।३।५। इति द्वितीया। समाजं प्रति। (उच्छन्तु) उच्छी समाप्तौ, अकर्मकः। अत्र दीप्तौ। समाप्ता व्युष्टाः प्रदीप्ता भवन्तु। (भद्राः) मङ्गलकारिण्यः। (घृतम्) सारपदार्थम्। (दुहानाः)। दुह प्रपूरणे-शानच्। प्रपूरयन्तः। (विश्वतः) सर्वतः। (प्रपीताः) प्यायः पी। पा० ६।१।२८। इति ओप्यायी वृद्धौ-क्त, पी आदेशः। प्रवृद्धाः। (यूयम्) वीरपुरुषाः। (पात) रक्षत। (स्वस्तिभिः) अनेकसुखैः। (सदा) सर्वस्मिन् काले। (नः) अस्मान् ॥

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    बंगाली (2)

    भाषार्थ

    (অশ্বাবতীঃ) অশ্বসম্পন্ন, (গোমতীঃ) গাভীসম্পন্ন, (বীরবতীঃ) বীরপুত্রসম্পন্ন (ভদ্রাঃ) কল্যাণকারিণী ও সুখদায়িনী (উষসঃ) ঊষা-সমূহ (নঃ) আমাদের জন্য (সদম্) সদা (উচ্ছন্তু) উজ্জ্বল থাকুক। (ঘৃতম্) ঘৃত মিশ্রিত দুগ্ধকে (দুহানাঃ) দোহন করে (বিশ্বতঃ) সব দিকে (প্রপীতাঃ) প্রকর্ষেণ/প্রকৃষ্টরূপে আপ্যায়িত (যূয়ম্) তোমরা হে ঊষা-সমূহ! (স্বস্তিভিঃ) উত্তম স্থিতি দ্বারা (নঃ) আমাদের (সদা পাত) সদা রক্ষা করো।

    टिप्पणी

    [অভিপ্রায় এই যে, প্রতি প্রাতঃকালের ঊষা উজ্জ্বল/প্রদীপ্ত হওয়ার সময় আমাদের অশ্ব আদি যথাবস্থিত থাকুক, যেমন তারা উষঃকালের পূর্বে বিদ্যমান ছিল। উষঃকালে আমরা গোদোহন করে ঘৃতমিশ্রিত দুগ্ধ প্রাপ্ত করি। ঊষা আমাদের স্বাস্থ্যের রক্ষা করে।]

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    मन्त्र विषय

    বুদ্ধিবর্ধনায় প্রভাতগীতিঃ

    भाषार्थ

    (অশ্ববতীঃ=০-ত্যঃ) উত্তম-উত্তম ঘোড়াযুক্ত, (গোমতীঃ) উত্তম-উত্তম গাভীযুক্ত, (বীরবতীঃ) অনেক বীর পুরুষযুক্ত এবং (ভদ্রাঃ) মঙ্গলকারী (উষাসঃ=উষসঃ) ঊষা (নঃ সদম্) আমাদের সমাজে (উচ্ছন্তু) প্রদীপ্ত হতে থাকুক। (ঘৃতম্) ঘৃত [সার পদার্থ]কে (দুহানাঃ) দোহন করে এবং (বিশ্বতঃ) সমস্ত প্রকারে (প্রপীতাঃ) পূর্ণ হয়ে (যূয়ম্) তোমরা [বীর পুরুষগণ!] (স্বস্তিভিঃ) অনেক সুখসহিত (সদা) সদা (নঃ) আমাদের (পাত) রক্ষা করো ॥৭॥

    भावार्थ

    সকল স্ত্রী পুরুষ প্রচেষ্টা করে নিজেদের ঘরকে ঘোড়া, গাভী ও বীর পুরুষ দিয়ে পূর্ণ রাখুক, এবং সকলে মিলিতভাবে তত্ত্ব গ্রহণ করে সদা পরস্পর রক্ষা করুক ॥৭॥ ‘যূয়ং পাত স্বস্তিভিঃ সদা নঃ’ এই পাদ প্রায়ঃ ঋগ্বেদ মণ্ডল ৭ এর সকল সূক্তের অন্তে শেষে রয়েছে ॥

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