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अथर्ववेद के काण्ड - 3 के सूक्त 17 के मन्त्र

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  • अथर्ववेद - काण्ड 3/ सूक्त 17/ मन्त्र 1
    ऋषि: - विश्वामित्रः देवता - सीता छन्दः - आर्षी गायत्री सूक्तम् - कृषि
    37

    सीरा॑ युञ्जन्ति क॒वयो॑ यु॒गा वि त॑न्वते॒ पृथ॑क्। धीरा॑ दे॒वेषु॑ सुम्न॒यौ ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    सीरा॑ । यु॒ञ्ज॒न्ति॒ । क॒वय॑: । यु॒गा । वि । त॒न्व॒ते॒ । पृथ॑क् । धीरा॑: । दे॒वेषु॑ । सु॒म्न॒ऽयौ ॥१७.१॥


    स्वर रहित मन्त्र

    सीरा युञ्जन्ति कवयो युगा वि तन्वते पृथक्। धीरा देवेषु सुम्नयौ ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    सीरा । युञ्जन्ति । कवय: । युगा । वि । तन्वते । पृथक् । धीरा: । देवेषु । सुम्नऽयौ ॥१७.१॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 3; सूक्त » 17; मन्त्र » 1
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    पदार्थ -
    (धीराः) धीर (कवयः) बुद्धिमान् [किसान] लोग (देवेषु) व्यवहारी पुरुषों पर [सुम्नयौ] सुख पाने [की आशा] में (सीरा=सीराणि) हलों को (युञ्जन्ति) जोड़ते हैं, और (युगा=युगानि) जुओं को (पृथक्) अलग-अलग करके [दोनों ओर] (वि तन्वते) फैलाते हैं ॥१॥

    भावार्थ - जैसे किसान लोग खेती करके अन्य पुरुषों को सुख पहुँचाते और आप सुखी रहते हैं, इसी प्रकार सब मनुष्यों को परस्पर उपकारी होकर सुख भोगना चाहिये ॥१॥


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    Meaning -
    Men of vision and creativity use the plough and the yoke. Men of constancy among the brilliant and generous separately as well as together expand the beauty and graces of life devoutly thus for peace and well being.


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