अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 17/ मन्त्र 9
घृ॒तेन॒ सीता॒ मधु॑ना॒ सम॑क्ता॒ विश्वै॑र्दे॒वैरनु॑मता म॒रुद्भिः॑। सा नः॑ सीते॒ पय॑सा॒भ्याव॑वृ॒त्स्वोर्ज॑स्वती घृ॒तव॒त्पिन्व॑माना ॥
स्वर सहित पद पाठघृतेन॑ । सीता॑ । मधु॑ना । सम्ऽअ॑क्ता । विश्वै॑: । दे॒वै: । अनु॑ऽमता । म॒रुत्ऽभि॑: । सा । न॒: । सी॒ते॒ । पय॑सा । अ॒भि॒ऽआव॑वृत्स्व । ऊर्ज॑स्वती । घृ॒तऽव॑त् । पिन्व॑माना ॥१७.९॥
स्वर रहित मन्त्र
घृतेन सीता मधुना समक्ता विश्वैर्देवैरनुमता मरुद्भिः। सा नः सीते पयसाभ्याववृत्स्वोर्जस्वती घृतवत्पिन्वमाना ॥
स्वर रहित पद पाठघृतेन । सीता । मधुना । सम्ऽअक्ता । विश्वै: । देवै: । अनुऽमता । मरुत्ऽभि: । सा । न: । सीते । पयसा । अभिऽआववृत्स्व । ऊर्जस्वती । घृतऽवत् । पिन्वमाना ॥१७.९॥
भाष्य भाग
हिन्दी (5)
विषय
खेती की विद्या का उपदेश।
पदार्थ
(घृतेन) घी से और (मधुना) मधु [शहद] से (समक्ता) यथाविधि सानी हुई (सीता) जुती धरती (विश्वैः) सब (देवैः) व्यवहारकुशल (मरुद्भिः) विद्वान् देवताओं करके (अनुमता) अङ्गीकृत है। (सीते) हे जुती धरती ! (सा) सो (ऊर्जस्वती) बलवती और (घृतवत्) घृतयुक्त [अन्न आदि] से (पिन्वमाना) सींचती हुई तू (पयसा) दूध के साथ (नः) हमारे (अभ्याववृत्स्व) सब ओर से सन्मुख वर्तमान हो ॥९॥
भावार्थ
चतुर किसान युक्ति से बीज में वा धरती में घी और मधु आदि मिलाकर धान्य आदि को पुष्ट और मधुर बनावें, जैसे क्रिया विशेष से, माली लोग आम, दाख, केसर, फूल आदि को उत्तम बनाते और मनुष्य उत्तम सन्तान उत्पन्न करते हैं ॥९॥ यह मन्त्र कुछ भेद से यजुर्वेद अ० १२ म० ७० में है ॥
टिप्पणी
९−(घृतेन) आज्येन। (सीता) म० ४। कृष्टा भूमिः। (मधुना) क्षौद्रेण। (समक्ता) अञ्जू व्यक्तिम्रक्षणकान्तिगतिषु-क्त। सम्यक् मिश्रिता। (विश्वैः) सर्वैः। (देवैः) दिवु व्यवहारे-अच्। व्यवहारकुशलैः। (अनुमता) अङ्गीकृता। (मरुद्भिः) अ० १।२०।१। देवैः। ऋत्विग्भिः, निघ० ३।१८। (सा) सा त्वम्। (नः) अस्मान् (पयसा) दुग्धेन। (अम्याववृत्स्व) बहुलं छन्दसि। पा० २।४।७६। इति वृतेः। शपः श्लुः। अभित आगत्य वर्तस्व। (ऊर्जस्वती) बलवती। (घृतवत्) यथा तथा घृतयुक्तेन अन्नेन। (पिन्वमाना) पिवि सेचने-शानच्। आत्मनेपदं छान्दसम्। सिञ्चन्ती। वर्धयन्ती ॥
विषय
सीता अथवा हल की फाली
व्याख्याः शृङ्गी ऋषि कृष्ण दत्त जी महाराज
सीता राजा जनक की कन्या थी। एक समय राजा जनक के राष्ट्र में अकाल पड़ गया, नाना ऋषियों को निमन्त्रण दिया गया, याज्ञवल्क्य, माता गार्गी, महर्षि लोमश आदि ओर भी अन्य ऋषि उनके आश्रम में आए। राजा जनक ने उनसे कहा कि मेरी प्रजा अन्न के अभाव से दुखित है कुछ ऐसा यत्न करो, कि जिससे अकाल समाप्त हो जाएं। उन्होंने देखा गणित के अनुकूल देखा और कहा कि भगवन्! आप दो गौ के बछड़े लीजिए, स्वर्ण का हल बनवाइए और अपनी वाटिका में जाकर हल चलाइये ऐसा उनका विश्वास था। राजा जनक ने ऐसा ही किया। कारण होना था, राजा जनक ने ज्यों ही हल चलाया, वृष्टि हुई और उधर राजा जनक के घर कन्या का जन्म हुआ।
राजा जनक को जब गृह से कन्या उत्पन्न होने का समाचार मिला, तो बड़े प्रसन्न हुए कि मेरा बड़ा सौभाग्य है, आज ऐसे आनन्द समय, मेरी पुत्री का जन्म हुआ। उन्होंने ऋषि मुनियों से कहा कि महाराजा! अब तो आप सब एकत्रित हो, मेरी कन्या का नामकरण संस्कार कीजिए। ऋषि मुनियों ने कहा कि भाई! इसका नामकरण संस्कार क्या, इसका नाम सीता नियुक्त कर दो। व्याकरण की रीति से उन्होंने कहा कि सी नाम वृष्टि का और ता नाम हल की फाली का! हल चलाने से वृष्टि हुई है और वृष्टि होने से जन्म हुआ है दोनों के मिलान से जन्म हुआ है ,इसलिए कन्या का नाम सीता नियुक्त कर दो, मुनिवरों! उस समय उसका नाम सीता नियुक्त कर दिया गया।
विषय
'घृतेन मधुना' सम्यक्त
पदार्थ
१. (सीता) = यह लागलपद्धति (घृतेन) = जल से तथा (मधुना) = शहद से (समक्ता) = सम्यक् सिक्त हुई है। यह (विश्वैः देवैः) = सूर्यादि सब देवों से तथा (मरुद्भिः) = वृष्टिवाहक वायुओं से (अनुमता) = अङ्गीकृत हुई है-वे सब इसके अनुकूल हैं। २. हे (सीते) = लाङ्गलपद्धते! (सा) = वह तू (पयसा) = उदक [जल] से सींची हुई (न: अभि आववृत्स्व) = हमारे अभिमुख-अनुकूल हो। तू (ऊर्जस्वती) = बल से युक्त हो तथा (घृतवत्) = घृतयुक्त अन्न को (पिन्वमाना) = हमारे लिए सिक्त करनेवाली हो।
भावार्थ
घृत व मधु से सिक्त हुई-हुई भूमि सूर्य-वायु आदि की अनुकूलता होने पर हमें बल व प्राणशक्ति प्राप्त कराए और घृतवत् अन्न देनेवाली हो।
विशेष
गत सूक्त के अनुसार वानस्पतिक पदार्थों का सेवन करनेवाला यह व्यक्ति भोगवृतिवाला न बनकर योगवृतिवाला बनता है-'अ-थर्वा' कहलाता है [न थर्वति चरति] डांवाडोल नहीं होता। यह अथर्वा जितेन्द्रिय है। इसकी पत्नी इन्द्राणी है। यदि अथर्वा भोगवृत्ति को अपनाये तो यह भोगवृत्ति इन्द्राणी की सपत्नी [सौत] हो जाती है। इन्द्राणी इस सपत्नी के दुःख को सहने को उद्यत नहीं। वह उसके विनाश के लिए आत्मविद्या-[योगविद्या]-रूप ओषधि को आचार्य से प्राप्त करने के लिए यत्नशील होती है। आत्मविद्या इन्द्राणी की सपत्नी का विनाश करती है।
भाषार्थ
(मधुना घृतेन) मधुर जल द्वारा (सम् अक्ता) सम्यक् अभिव्यक्त हुई (सीता) कृष्टभूमि, (विश्वैः देवैः) सब देवों द्वारा, (मरुद्भिः) और मानसून वायुओं द्वारा (अनुमता) अनुकूलरूप में स्वीकृत हुई (सा) वह (सीते) हे कृष्टभूमि ! (न: अभि) हमारे अभिमुख, (पयसा) दुग्ध के साथ (आववृत्स्व) तू आ, (ऊर्जस्वती) अन्नवाली तथा (घृतवत्) घृतवाले दुग्ध को (पिन्वमाना) सींचती हुई।
टिप्पणी
[घृतम् उदकनाम (निघं० १।१२)। अक्ता=अञ्जू व्यक्तिम्रक्षणकान्तिगतिषु (रुधादिः), व्यक्ति=अभिव्यक्ति। विश्वैः देवैः=वायु, आदित्य आदि देव। मरुद्भिः= मानसून वायुएँ, जोकि जल से भरपूर होती हैं (अथर्व० ४।२७।४, ५)। घृतवत्= कृष्टभूमि से अन्न पैदा हुआ और उस अन्न के खिलाने से गौओं से घृतमिश्रित दुग्ध प्राप्त हुआ। (पिन्वमाना=पिवि सेवने, "सेचने चेत्येके"(भ्यादिः)]
विषय
कृषि और अध्यात्म योग का उपदेश ।
भावार्थ
(सीता) हल में लगी फाली (घृतेन) घृत और (मधुना) मधु से (समक्ता) चुपड़ी गई और (मरुद्भिः) विद्वान् वैश्यगण और (विश्वैः देवैः) सभी विद्वत् जनों से (अनुमता) उपयोगी रूप से स्वीकृत है। हे सीते ! (सा) वह तू (ऊर्जस्वती) पुष्टिकारक अन्न देनेहारी और (घृतवत्) घी दूध आदि पदार्थों से (पिन्वमाना) सब को तृप्त और पुष्ट करती हुई (पयसा) पुष्टिकारक अन्न और जल के सहित (नः अभि-आ-ववृत्स्व) हमारे पास विद्यमान रहे, हमारे क्षेत्र में सब तरफ फिरे, क्षेत्र को उत्पादक वनावे । अध्यात्म में—भास्वर शुक्ला ज्योतिष्मती सीता=सिता है। वह तेज और बल से युक्त होकर सब इन्द्रियों और प्राण गणों के द्वारा साक्षात् अभिव्यक्त हो। बलवती होकर हमें ज्ञानरूप से वार २ साक्षात् हो।
टिप्पणी
(प्र०) ‘समज्यताम्’, (तृ०) ‘अस्मान्’ इति यजु०। (च०) ‘ऊर्जो भागं मधुमत्पिन्वमाना’ इति मै० सं०।
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
विश्वामित्र ऋषिः सीता देवता । १ आर्षी गायत्री, २, ५, ९ त्रिष्टुभः । ३ पथ्या-पंक्तिः । ७ विराट् पुरोष्णिक् । ८, निचृत् । ३, ४, ६ अनुष्टुभः । नवर्चं सूक्तम् ॥
इंग्लिश (4)
Subject
Farming
Meaning
Let the furrow in the field made by the plough share and levelled and refined by the leveller, accepted and approved by all noble and generous people, and vitalised by wind and rain, be enriched with the wealth of food, energy, milk and ghrta and bring us plenty of delicious nourishment.
Translation
Let the furrow (sītā) be irrigated with sweet waters. May it be favoured by all the bounties of Nature (visvedevaih) and the cloud-bearing winds (marudbhih). As such O furrow, may you turn towards us full of milk, invigorating and swelling with ghee (clarified butter)
Translation
Let the furrow be bedwed with butter and honey and be made favorable for crops by all the physical forces and various kinds of airs. Full of grains and enriched with butter let this forrow make us happy with various cerials.
Translation
O mental faculty endowed with splendor and strength, manifest thyself through organs and breaths. May the mental faculty coupled with vigour and brilliance, come before us again and again full of knowledge.
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
९−(घृतेन) आज्येन। (सीता) म० ४। कृष्टा भूमिः। (मधुना) क्षौद्रेण। (समक्ता) अञ्जू व्यक्तिम्रक्षणकान्तिगतिषु-क्त। सम्यक् मिश्रिता। (विश्वैः) सर्वैः। (देवैः) दिवु व्यवहारे-अच्। व्यवहारकुशलैः। (अनुमता) अङ्गीकृता। (मरुद्भिः) अ० १।२०।१। देवैः। ऋत्विग्भिः, निघ० ३।१८। (सा) सा त्वम्। (नः) अस्मान् (पयसा) दुग्धेन। (अम्याववृत्स्व) बहुलं छन्दसि। पा० २।४।७६। इति वृतेः। शपः श्लुः। अभित आगत्य वर्तस्व। (ऊर्जस्वती) बलवती। (घृतवत्) यथा तथा घृतयुक्तेन अन्नेन। (पिन्वमाना) पिवि सेचने-शानच्। आत्मनेपदं छान्दसम्। सिञ्चन्ती। वर्धयन्ती ॥
बंगाली (2)
भाषार्थ
(মধুনা ঘৃতেন) মধুর জল দ্বারা (সম্ অক্তা) সম্যক্ অভিব্যক্ত (সীতা) কৃষ্টভূমি, (বিশ্বৈঃ দেবৈঃ) সকল দেবতাদের দ্বারা, (মরুদ্ভিঃ) এবং মৌসুমী বায়ুর দ্বারা (অনুমতা) অনুকূলরূপে স্বীকৃত (সা) সেই (সীতে) হে কৃষ্টভূমি ! (নঃ অভী) আমাদের অভিমুখে, (পয়সা) দুগ্ধের সাথে/দুগ্ধসহিত (আববৃৎস্ব) তুমি এসো, (ঊর্জস্বতী) অন্নবতী এবং (ঘৃতবৎ) ঘৃতসম্পন্ন দুগ্ধকে (পিন্বমানা) সেচন করে।
टिप्पणी
[ঘৃতম্ উদকনাম (নিঘং০ ১।১২)। অক্তা= অঞ্জূ ব্যক্তিম্রক্ষণ কান্তিগতিষু (রুধাদিঃ), ব্যক্তি= অভিব্যক্তি। বিশ্বৈঃ দেবৈঃ= বায়ু, আদিত্য আদি দেবতা। মরুদ্ভিঃ= মৌসুমী বায়ু, যা জলে পরিপূর্ণ হয় (অথর্ব০ ৪।২৭।৪,৫)। ঘৃতবৎ=কৃষ্টভূমি থেকে অন্ন উৎপন্ন হয়েছে এবং সেই অন্ন গ্রহণের মাধ্যমে গাভীদের থেকে ঘৃতমিশ্রিত দুগ্ধ প্রাপ্তি হয়েছে। (পিন্বমানা= পিবি সেবনে, "সেচনে চেত্যেকে" (ভ্বাদিঃ)।]
मन्त्र विषय
কৃষিবিদ্যোপদেশঃ
भाषार्थ
(ঘৃতেন) ঘৃত দ্বারা এবং (মধুনা) মধু দ্বারা (সমক্তা) যথাবিধি মিশ্রিত (সীতা) কর্ষিত জমি (বিশ্বৈঃ) সমস্ত (দেবৈঃ) ব্যবহার কুশল (মরুদ্ভিঃ) বিদ্বান্ দেবতাদের দ্বারা (অনুমতা) অঙ্গীকৃত। (সীতে) হে কর্ষিত জমি ! (সা) সেই (ঊর্জস্বতী) বলবতী ও (ঘৃতবৎ) ঘৃতযুক্ত [অন্ন আদি] দ্বারা (পিন্বমানা) সীঞ্চন করে তুমি (পয়সা) দুধের সাথে (নঃ) আমাদের (অভ্যাববৃৎস্ব) সব দিক থেকে সন্মুখে বর্তমান হও ॥৯॥
भावार्थ
চতুর কৃষক বিচারপূর্বক বীজে বা জমিতে ঘী এবং মধু আদি মিশিয়ে ধান্য আদিকে পুষ্ট ও মধুর করুক, যেমন ক্রিয়া বিশেষে, মালীরা আম, আঙুর, কেসর, ফুল আদিকে উত্তম করে এবং মনুষ্য উত্তম সন্তান উৎপন্ন করে॥৯॥ এই মন্ত্র কিছু ভেদে যজুর্বেদ অ০ ১২ ম০ ৭০ এ রয়েছে ॥
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