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अथर्ववेद के काण्ड - 3 के सूक्त 18 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 18/ मन्त्र 6
    ऋषिः - अथर्वा देवता - वनस्पतिः छन्दः - उष्णिग्गर्भापथ्यापङ्क्तिः सूक्तम् - वनस्पति
    69

    अ॒भि ते॑ऽधां॒ सह॑माना॒मुप॑ तेऽधां॒ सही॑यसीम्। मामनु॒ प्र ते॒ मनो॑ व॒त्सं गौरि॑व धावतु प॒था वारि॑व धावतु ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    अ॒भि । ते॒ । अ॒धा॒म् । सह॑मानाम् । उप॑ । ते॒ । अ॒धा॒म् । सही॑यसीम् । माम् । अनु॑ । प्र । ते॒ । मन॑: । व॒त्सम् । गौ:ऽइ॑व । धा॒व॒तु॒ । प॒था । वा:ऽइ॑व । धा॒व॒तु॒ ॥१८.६॥


    स्वर रहित मन्त्र

    अभि तेऽधां सहमानामुप तेऽधां सहीयसीम्। मामनु प्र ते मनो वत्सं गौरिव धावतु पथा वारिव धावतु ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    अभि । ते । अधाम् । सहमानाम् । उप । ते । अधाम् । सहीयसीम् । माम् । अनु । प्र । ते । मन: । वत्सम् । गौ:ऽइव । धावतु । पथा । वा:ऽइव । धावतु ॥१८.६॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 3; सूक्त » 18; मन्त्र » 6
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    ब्रह्मविद्या की सपत्नी अविद्या के नाश का उपदेश।

    पदार्थ

    [हे जीव !] (ते) तेरे लिए (सहमानाम्) प्रबल [अविद्या] को (अभि=अभिभूय) हराकर (अधाम्) मैंने रक्खा है, और (ते) तेरे लिये (सहीयसीम्) अधिक प्रबल [ब्रह्मविद्या] को (उप) आदर से (अधाम्) मैंने रक्खा है, सो (ते मनः) तेरा मन (माम् अनु) मेरे पीछे-पीछे [योगी के स्वरूप में] (प्रधावतु) दौड़ता रहे और (धावतु) दौड़ता रहे, (गौः इव) जैसे गौ (वत्सम्) अपने बछड़े के पीछे, और (वाः इव) जैसे जल (पथा) अपने मार्ग से [दौड़ता है] ॥६॥

    भावार्थ

    योगवृत्तियों के निरोध से अविद्या को जीतकर स्वरूप अर्थात् अपनी और परमात्मा की शक्ति को जानकर परोपकार में आगे बढ़ता है, जैसे स्वभाव से गौ अपने छोटे बच्चे के पीछे दौड़ती फिरती है और पानी नीचे मार्ग से समुद्र को चला जाता है ॥६॥ भगवान् पतञ्जलि ने कहा है−योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः ॥ तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम् ॥ यो० द० १।२, ३ ॥ योग चित्त की वृत्तियों का रोकना है ॥१॥ तब देखनेवाले को अपने रूप में चित्त का ठहराव होता है ॥२॥

    टिप्पणी

    ६−(अभि) अभिभूय। जित्वा। (ते) तव हिताय। (अधाम्) डुधाञ् धारणपोषणयोः-लुङ्। अहम् अधार्षम्। (सहमानाम्) म० ५। प्रबलाम् अविद्याम्। (उप) पूजायाम्। (सहीयसीम्)। सोढृ-ईयसुन्। सोढृतराम्। बलवत्तरां ब्रह्मविद्याम्। (माम्) योगिनम्। (अनु) अनुसृत्य। (ते) तव। (मनः) चित्तम्। (वत्सम्)। गोशिशुम्। (गौः इव) धेनुर्यथा। (प्रधावतु) प्रकर्षेण शीघ्रं गच्छतु। (पथा) मार्गेण। (वार्) अ० ३।१३।३। जलम् ॥

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    विषय

    वत्सं गौ इव

    पदार्थ

    १. प्रभु जीव से कहते हैं कि मैं (ते) = तेरे लिए इस (सहमानाम्) = शत्रुओं का पराभव करनेवाली ब्रह्मविद्या [आत्मविद्या] को (अभि अधाम्) = धारण करता हूँ। इस (सहीयसीम्) = शत्रुओं का खूब ही पराभव करनेवाली ब्रह्मविद्या को (ते अप अधाम्) = तेरे समीप स्थापित करता हूँ। २. इस आत्मविद्या द्वारा शत्रुओं का पराभव होने पर (माम् अनु) = मेरे पीछे-मेरा लक्ष्य करके (ते मन:) = तेरा मन इसप्रकार (प्रधावतु) = दौड़े, (इव) = जैसेकि (वत्सं गौ:) = बछड़े का लक्ष्य करके गौ जाती है, अथवा (इव) = जैसे (पथा) - निम्नमार्ग से (वा:) = जल (धावत) = दौड़ता है। जल स्वभावत: निम्न मार्ग से जाता है, उसी प्रकार हमारा मन स्वभावतः प्रभु की ओर जानेवाला हो।

    भावार्थ

    आत्मविद्या प्राप्त करके हम शत्रुओं को कुचल डालें और हमारा मन प्रभु की ओर गतिवाला हो, उसी प्रकार प्रभु की ओर गतिवाला हो, जैसे गौ बछड़े की ओर गतिवाली होती है।

    विशेष

    आत्मविद्या द्वारा शत्रुओं को पराभूत करके यह व्यक्ति वशिष्ठ' बनता है, वशियों में श्रेष्ठ[वशिष्ठ] अथवा सर्वोतम निवासवाला [वस् निवासे]। यह प्रार्थना करता है कि -

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    भाषार्थ

    [हे भावी पति!] (ते अभि) तेरे अभिमुख अर्थात् संमुख (सहमानाम्) पराभव करनेवाली औषधि को (अधाम्) मैं भाविनी पत्नी ने रख दिया है, (सहीयसीम्) अतिशय से पराभव करनेवाली औषधि के (उप) तेरे समीप (अधाम्) मैंने रख दिया है; (माम् अनु) मेरी अनुकूलता में (ते) तेरा (मन:) मन (प्र धावतु) शीघ्रता से दौड़कर आए, (इव) जैसेकि (गौः) अर्थात् दुग्धवती गौ (वत्सम्) निज वत्स की ओर (धावतु) दौड़कर आती है, (इव) जैसेकि (वाः) वारि अर्थात् जल (पथा) निम्न मार्ग द्वारा (धावतु) दौड़कर प्रवाहित होता है।

    टिप्पणी

    ["अभि" अर्थात् संमुख रखना तथा "उप" अर्थात् समीप रखना, इन दो भावों में अन्तर है, भेद है। औषधि भावी-पति के मन को, भाविनी-पत्नी की ओर आकृष्ट करती है और भावी-पति का मन मानो दौड़कर भावना-पत्नी की ओर झुक जाता है।] तथा ओषधि है सात्त्विक चित्तवृत्ति। यह ओषधि है,"ओषद्धयन्तीति वा" (निरुक्त ९।३।२७), अर्थात् जो दग्ध करती हुई राजसवृत्ति का पान करती है, उसे विनष्ट करती है। यह चित्तभूमि में दबी पड़ी है। पवित्र जीवात्मा चित्तभूमि से इसे खोद निकालता है। प्रतिस्पर्धी ये दो चित्तवृत्तियाँ हैं; अथवा मन की शिवसंकल्परूपी और अशिवसंकल्परूपी दो वृत्तियाँ हैं, जिनमें आपस में प्रतिस्पर्धा होती रहती है। शिवसंकल्परूपी वृत्ति "उत्तरा" है, उत्कृष्टा है (मन्त्र ४) और अशिवसंकल्परूपी वृत्ति "अधरा" है, निकृष्टा है। पवित्र जीवात्मा मनोमयी "उत्तरा वृत्ति" को अपना लेता है और अधरा वृत्ति का परित्याग कर देता है। इसे अपनाकर जीवात्मा इस मनोमयी शिवसंकल्परूपी वृत्ति का पति बन जाता है (मन्त्र ३)। "उत्तरा चित्त वृत्ति" को "उत्तानपर्णा' कहा है (मन्त्र २)। यह ऊपर की ओर विस्तृत हुई पालन-पोषण करती है। ऊपर की ओर विस्तृत होने का अभिप्राय है मस्तिष्क तक फैल जाना; (उत्+ तन् विस्तारे+ पृ पालन-पूरणयोः, जुहोत्यादिः)। उत्तरा चित्तवृत्ति जब मस्तिष्क में फैल जाती है, तब यह 'मस्तिष्क द्वारा' समग्र शरीर को उत्कृष्ट कर देती है। सूक्त में व्यावहारिक विवाह के वर्णनपूर्वक अध्यात्म तत्त्वों का प्रदर्शन अभिप्रेत है।

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    विषय

    ब्रह्म-विद्या की विरोधिनी अविद्या के नाश का उपदेश ।

    भावार्थ

    हे अविद्ये ! (ते) तुझे दूर करने के लिये (सहमानां) तुझ अविद्या को विनाश करने वाली इस ब्रह्म-विद्या को (अभि अधाम्) सब प्रकार से धारण करूं । और (ते) तुझे (सहीयसीम्) पराजित करने हारी इस कर्म-विद्या को भी (उप अधाम्) गुरुओं के समीप जाकर अभ्यास करूं। हे शिष्य ! (ते मनः) तेरा मन अब अविचल भाव से (वत्सः गौः इव) गाय जिस प्रकार अपने बच्छड़े के पास आ जाती है और (पथा वाः इव) जिस प्रकार खोद कर बनाई गई नहर के मार्ग से जल धारा दौड़ती है उसी प्रकार (ते मनः) तेरा मन (माम् अनु) मुझ ब्रह्मवित् पुरुष के अधीन होकर (धावतु) खिंचा आवे।

    टिप्पणी

    (प्र०) ‘उप तेधां’, (द्वि०) ‘उपत्वाधां सहीयसा’ इति ऋ०।

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    अथर्वा ऋषिः । वनस्पतिर्देवता । १-३, ५ अनुष्टुभः । ४ चतुष्पदा अनुष्टुप्-गर्भा उष्णिग् । १ उष्णिग् गर्भा पथ्यापंक्तिः। षडृचं सूक्तम्॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Vanaspati

    Meaning

    O Soma spirit of the herb, I love you at heart and hold on to you in faith, patient and victorious as you are. I hold on to you with a determined mind. May your spirit radiate and come to me like the mother cow hastening to her calf, and water rushing straight to the lake.

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    Translation

    I have girt you, the conquering plant all around. I have put - you, even more conquering, near me. May your mind speed towards me, as a cow runs after her calf, as the water runs along its channel. (Cf.Rv. X.145.6) (sahamānā, sāsahi, sahasvatīand sahīyasī).

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    Translation

    O husband; I administer you the medicine which is victorious over your tendency, I Possess for you this most effective one, Let your mind follow me like the calf which runs after cow and like the water which hastens to On its Way.

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    Translation

    O ignorance, for thy removal, may I acquire the knowledge of God, and learn from preceptors the knowledge of action, (Karma Vidya) that subdues thee. O pupil, let thy mind run after me, as a cow hastens to her calf, or water flows down on its way.

    Footnote

    Me: A yogi teacher.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    ६−(अभि) अभिभूय। जित्वा। (ते) तव हिताय। (अधाम्) डुधाञ् धारणपोषणयोः-लुङ्। अहम् अधार्षम्। (सहमानाम्) म० ५। प्रबलाम् अविद्याम्। (उप) पूजायाम्। (सहीयसीम्)। सोढृ-ईयसुन्। सोढृतराम्। बलवत्तरां ब्रह्मविद्याम्। (माम्) योगिनम्। (अनु) अनुसृत्य। (ते) तव। (मनः) चित्तम्। (वत्सम्)। गोशिशुम्। (गौः इव) धेनुर्यथा। (प्रधावतु) प्रकर्षेण शीघ्रं गच्छतु। (पथा) मार्गेण। (वार्) अ० ३।१३।३। जलम् ॥

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    बंगाली (2)

    भाषार्थ

    [হে হবু পতি !] (তে অভি) তোমার অভিমুখে অর্থাৎ সম্মুখে, (সহমানাম্) পরাজিতকারিনী ঔষধিকে (অধাম্) আমি হবু পত্নী রেখে দিয়েছি, (সহীয়সীম্) অতিশয় পরাজিতকারিনী ঔষধিকে (উপ) তোমার কাছে (অধাম্) আমি রেখে দিয়েছি; (মাম্ অনু) আমার অনুকূলতায় (তে) তোমার (মনঃ) মন (প্র ধাবতু) শীঘ্র দৌড়ে আসুক/ধাবিত হোক, (ইব) যেমন (গৌঃ) অর্থাৎ দুগ্ধবতী গাভী (বৎস) নিজের বাছুরের দিকে (ধাবতু) দৌড়ে আসে/ধাবিত হয়, (ইব) যেমন (বাঃ) বারি অর্থাৎ জল (পথা) নিম্ন পথ দ্বারা (ধাবতু) দৌড়ে প্রবাহিত হয়।

    टिप्पणी

    ["অভি" অর্থাৎ সম্মুখে রাখা এবং “উপ" অর্থাৎ নিকটে রাখা, এই দুই ভাবের মধ্যে অন্তর আছে, পার্থক্য আছে। ঔষধি হবু-পতির মনকে, হবু পত্নীর দিকে আকৃষ্ট করে এবং হবু-পতির মন যেন দৌড়ে হবু-পত্নীর দিকে নত হয়।]

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    मन्त्र विषय

    উপনিষৎসপত্নীবাধনোপদেশঃ

    भाषार्थ

    [হে জীব !] (তে) তোমার জন্য (সহমানাম্) প্রবল [অবিদ্যা] কে (অভি=অভিভূয়) পরাজিত করে (অধাম্) আমি রেখেছি, এবং (তে) তোমার জন্য (সহীয়সীম্) অধিক প্রবল [ব্রহ্মবিদ্যা] কে (উপ) আদরপূর্বক (অধাম্) আমি রেখেছি, সুতরাং (তে মনঃ) তোমার মন (মাম্ অনু) আমার পেছনে-পেছনে [যোগীর স্বরূপে] (প্রধাবতু) দৌড়তে থাকুক/ধাবমান হোক এবং (ধাবতু) দৌড়তে থাকুক/ধাবমান হোক, (গৌঃ ইব) যেমন গাভী (বৎসম্) নিজের বাছুরের পেছনে, এবং (বাঃ ইব) যেভাবে জল (পথা) নিজের মার্গে [দৌড়ে] ॥৬॥

    भावार्थ

    যোগী বৃত্তিসমূহের নিরোধ দ্বারা অবিদ্যাকে জয় করে স্বরূপ অর্থাৎ নিজের এবং পরমাত্মার শক্তিকে জেনে/জ্ঞাত হয়ে পরোপকারের জন্য অগ্ৰগামী হয়, যেমন স্বভাবতঃ গাভী নিজের ছোটো বাচ্চার/বাছুরের পেছনে দৌড়তে থাকে এবং জল নীচু পথ দিয়ে সমুদ্রে চলে যায়॥৬॥ ভগবান্ পতঞ্জলি বলেছেন- যোগশ্চিত্তবৃত্তিনিরোধঃ ॥ তদা দ্রষ্টুঃ স্বরূপেঽবস্থানম্ ॥ যো০ দ০ ১।২, ৩ ॥ চিত্ত বৃত্তির নিরোধকে যোগ বলা হয়॥১॥ তখন দ্রষ্টার নিজের রূপে চিত্তের স্থিরতা হয় ॥২॥

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