अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 8/ मन्त्र 2
ऋषिः - अथर्वा
देवता - धाता, सविता, इन्द्रः, त्वष्टा, अदितिः
छन्दः - जगती
सूक्तम् - राष्ट्रधारण सूक्त
62
धा॒ता रा॒तिः स॑वि॒तेदं जु॑षन्ता॒मिन्द्र॒स्त्वष्टा॒ प्रति॑ हर्यन्तु मे॒ वचः॑। हु॒वे दे॒वीमदि॑तिं॒ शूर॑पुत्रां सजा॒तानां॑ मध्यमे॒ष्ठा यथासा॑नि ॥
स्वर सहित पद पाठधा॒ता । रा॒ति: । स॒वि॒ता । इ॒दम् । जु॒ष॒न्ता॒म् । इन्द्र॑: । त्वष्टा॑ । प्रति॑ । ह॒र्य॒न्तु॒ । मे॒ । वच॑: । हु॒वे । दे॒वीम् । अदि॑तिम् । शूर॑ऽपुत्राम् । स॒ऽजा॒ताना॑म् । म॒ध्य॒मे॒ऽस्था: । यथा॑ । असा॑नि ॥८.२॥
स्वर रहित मन्त्र
धाता रातिः सवितेदं जुषन्तामिन्द्रस्त्वष्टा प्रति हर्यन्तु मे वचः। हुवे देवीमदितिं शूरपुत्रां सजातानां मध्यमेष्ठा यथासानि ॥
स्वर रहित पद पाठधाता । राति: । सविता । इदम् । जुषन्ताम् । इन्द्र: । त्वष्टा । प्रति । हर्यन्तु । मे । वच: । हुवे । देवीम् । अदितिम् । शूरऽपुत्राम् । सऽजातानाम् । मध्यमेऽस्था: । यथा । असानि ॥८.२॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
प्रीति उत्पन्न करने का उपदेश।
पदार्थ
(धाता) पोषणकर्ता, (रातिः) दानकर्ता, (सविता) सर्वप्रेरक, (इन्द्रः) बड़ा ऐश्वर्यवान् और (त्वष्टा) देवशिल्पी वा विश्वकर्मा [यह सब पुरुष] (मे) मेरे (इदम्) परम ऐश्वर्य के कारण (वचः) वचन को (जुषन्ताम्) विचारें और (प्रति) प्रत्यक्षरूप से (हर्यन्तु) स्वीकार करें। (देवीम्) दिव्य गुणवाली, (शूरपुत्राम्) शूर पुत्रोंवाली (अदितिम्) अदान वा अखण्ड व्रतवाली देवमाता [चतुर स्त्री वा विद्या] को (हुवे) मैं आवाहन करता हूँ, (यथा) जिससे मैं (सजातानाम्) अपने समान जन्मवाले भाई-बन्धुओं में (मध्यमेष्ठाः) प्रधान मध्यस्थ [mediator] होकर (असानि) रहूँ ॥२॥
भावार्थ
राजा बड़े-बड़े गुणवान् पुरुषों, बड़ी-बड़ी गुणवती स्त्रियों और विद्या की प्रतिष्ठा बढ़ावे, जिससे वह उनके सहाय से अपनी उन्नति करे ॥२॥
टिप्पणी
२−(धाता)। धारकः। पोषकः। (रातिः)। रा दाने-कर्तरि क्तिच्। दानशीलः। (सविता)। सर्वप्रेरकः। (इदम्)। इन्देः कमिन्नलोपश्च। उ० ४।१५७। इति इदि परमैश्वर्ये-कमिन्, न लोपः। परमैश्वर्यकारणम्। (जुषन्ताम्)। जुष तर्के, जुषी प्रीतिसेवनयोः। तर्कयन्तु। विचारयन्तु सेवन्ताम्। (इन्द्रः)। परमैश्वर्यवान्। (त्वष्टा)। अ० २।५।६। देवशिल्पी विश्वकर्मा। (प्रति)। प्रत्यक्षम्। (हर्यन्तु)। हर्य गतिकान्त्योः। कामयन्ताम् सादरं शृण्वन्तु। स्वीकुर्वन्तु। (मे)। मदीयम्। (वचः)। वच कथने, संदेशे च-असुन्। वचनम्। (हुवे)। ह्वेङ् आह्वाने। आह्वयामि। (देवीम्)। दानादिगुणयुक्ताम्। दिव्यगुणवतीम्। (अदितिम्)। अ० २।२८।५। अखण्डव्रताम्। अदीनां देवमातरम्। सुलक्षणां स्त्रियं विद्यां वा (शूरपुत्राम्)। शूरा विक्रान्ताः शौर्योपेताः पुत्रा यस्याः सा तथोक्ता ताम्। वीरुपुत्रवतीम्। (सजातानाम्)। समानजन्मनाम्। बन्धूनाम्। (मध्यमेष्ठाः)। अ० २।६।४। मध्यम+ष्ठा गतिनिवृत्तौ-विच्। सप्तम्या अलुक्। मध्यभवेषु प्रधानेषु स्थिताः। (यथा)। यस्मात् कारणात्। (असानि)। असेर्लोटि। अहं भवानि ॥
विषय
'धाता, राति, सविता, इन्द्र, त्वष्टा' तथा 'शूरपुत्रा अदिति'
पदार्थ
१. (धाता) = धारण करनेवाला, (राति:) = दानशील, (सविता) = निर्माण करनेवाला में (इदं वचः) = मेरे इस वचन को (जुषन्ताम्) = प्रीतिपूर्वक सेवन करें। (इन्द्रः) = शत्रुओं का विद्रावण करनेवाला, (त्वष्टा) = क्रियाशील, सदा कार्यों में लगे रहनेवाला-ये सब देव मेरे वचन को (प्रतिहर्यन्तु) = चाहें। मेरे वचन उन्हें प्रिय हों। २. (देवीम्) = दिव्य गुणोंवाली (शूरपुत्राम्) = शूरों को जन्म देनेवाली (अदि तिम्) = अदीना देवमाता को (हुवे) = पुकारता हूँ। ये सब ऐसा प्रयत्न करें कि (यथा) = जिससे मैं (सजातानाम्) = समानजातिवाले लोगों में (मध्यमेष्ठा:) = मध्यस्थ (असानि) = होऊँ। ये सजात मुझे अपना मध्यस्थ जानें। इनमें श्रेष्ठ बनकर मैं इनके विवादों में मध्यस्थ बन पाऊँ। ३. यदि किसी राष्ट्र में लोग 'धाता, राति, सविता, इन्द्र व त्वष्टा' हों और राष्ट्र की माताएँ 'शूरपुत्रा व आदिति' हों तो राष्ट्र की इस उत्तम स्थिति के कारण राष्ट्रपति का सजात लोगों में आदर स्वाभाविक है। राजा चाहता है कि सब प्रजावर्ग धाता आदि के रूप में होता हुआ राष्ट्रपति के इस वचन का आदर करे कि 'मैं सजातों में श्रेष्ठ बन पाऊँ।'
भावार्थ
राजा चाहता है कि उसकी प्रजा के लोग 'धारणात्मक कर्मों में प्रवृत्त, दानशील, निर्माण में लगे हुए, काम-क्रोध आदि के शिकार न होते हुए सदा क्रियाशील हों। राष्ट्र की माताएँ देववृत्तिवाली व शुर सन्तानों को जन्म देनेवाली हों, जिससे राष्ट्र की ऐसी उत्तम स्थिति हो कि इस राष्ट्र का राष्ट्रपति सजात लोगों में श्रेष्ठ गिना जाए।'
भाषार्थ
(धाता) धारण-पोषण करनेवाला अधिकारी, (राति:) दानाधिकारी, (सविता) जन्मों तथा कोष का अधिकारी (इदम् मे बच:) इस मेरे कथन को (जुषन्ताम्) प्रीतिपूर्वक सेवित करें, सुनें, (इन्द्र:) सम्राट्, (त्वष्टा) तथा कारीगरी का अधिकारी [मेरे इस कथन को] (प्रतिहर्यन्तु) कागनापूर्वक सुनें। (शूरपुत्राम्) युद्धशूर, दानशूर, धर्मशूर आदि पुत्रोंवाली (अदितिम्) अदीना (देवीम्) मातृदेवी [सम्राट-पत्नी] का भी (हुवै) मैं [शासनकार्य में] आह्वान करता हूं, (यथा सजातानाम्) ताकि समानजाति के [राजाओं में] (मध्यमेष्ठाः) मध्यस्थ (असानि) मैं हो जाऊँ।
टिप्पणी
[सविता=षु प्रसवे तथा ऐश्वर्ये (भ्वादिः) सविता इन दो विभागों का अधिकारी है। त्वष्टा=त्वक्षतेर्वा स्यात् करोतिकर्मणः (निरुक्त ८।२।१४; त्वष्टा पद (११)। हर्यन्तु=हर्य गतिकान्त्योः (भ्वादिः)। असानि-=असेलोटि आडागमः (अष्टा० ३।४।९२)। मध्यमेष्ठा:=वरुण राजाओं में विवाद उपस्थित हो जाने पर मध्यस्थ होकर ताकि मैं निर्णय दे सकूं। शुरपुत्राम्=सम्राट् की पत्नी मातृवत् हुई, सम्राट् के सब शूरों की माता है। वह अदीना है, सम्राट् की पत्नी होने से, किसी के प्रति दैन्यभाव में नहीं।]
विषय
राजा के कर्तव्य ।
भावार्थ
राजा पूर्वोक्त प्रकार की प्रजा की प्रार्थना सुन कर निम्नलिखित प्रकार से अधिकारी गण नियुक्त करें । (इदं) इस राष्ट्र को (धाता) सन्निधाता नामक अधिकारी (रातिः) दानशील दानाध्यक्ष, (सविता) समाहर्त्ता ये तीनों अधिकारी राष्ट्र को (जुषन्तां) बसावें और सम्पन्न करें। और (इन्द्रः) सेनापति (त्वष्टा) सब कारीगरों का मुख्य शिल्पाध्यक्ष ये सब (मे) मेरे (वचः) वाणी, आज्ञा के (प्रति हर्यन्तु) अनुकूल रह कर कार्य करें। और (शूरपुत्रां) शूरवीर, पुत्रों को उत्पन्न करने हारी (देवीम्) दिव्यगुण युक्त, (अदितिं) अदीन,स्वतः सब से मुख्य, आदरणीय पृथिवी, मातृशक्ति को (हुवे) मैं संबोधित करता हूं कि वह वीर पुत्रों को मेरे संग करे कि मैं (सजातानां) समान बल वाले अन्य राजाओं के बीच में (यथा) जिस प्रकार (मध्यमेष्ठाः) मध्यस्थ, सब के बलों को समान रूप से तुलित रखने वाला (असानि) रहूं। राष्ट्र को इतना प्रबल बना कर रहना चाहिये कि शत्रुपक्ष और मित्रपक्ष दोनों को तुलित रख सके । धाता = सन्निधाता, दानाध्यक्ष, समाहर्त्ता आदि अधिकारी गणों का विवरण देखिये अर्थवेद उपवेद (अर्थशास्त्र कौटिल्य का ‘अध्यक्ष-प्रचार’ नामक अधिकरण)
टिप्पणी
रातिर्दानशीलोर्य्यमा इति सायणः। (द्वि०) ‘प्रतिगृह्णन्तु’ इति पैप्प० सं० । (च०) ‘यथा स्याम्’, ‘आसम्’ इति वा ह्विटनिकामितः पाठः ।
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
अथर्वा ऋषिः। मित्रो विश्वेदेवा वा देवता । २, ६ जगत्यौ । ४ चतुष्पदा विराड् बृहतीगर्भा । त्रिष्टुप् । ५ अनुष्टुप् । १, ३ त्रिष्टुभौ । षडृचं सूक्तम् ॥
इंग्लिश (4)
Subject
Rashtra Unity
Meaning
May Dhata, supreme controller and sustainer of the world order, Rati, powers that produce and give, Savita, creative energisers and inspirers, Tvashta, makers of new things and forms of life, listen favourably to my words and wishes. I pray to divine Mother Nature, earth mother of the brave, so that I may abide at the centre of equals over the earth, indivisibe, inviolable as she is.
Translation
May the creator (Dhatr) Lord, the bounteous (Ratih) Lord,and the inspirer (Savitr) Lord hear this call of mine. May the resplendent (Indra) Lord and supreme architect (Tvastr) listen to my words favourable inclined. I pray to the earth divine, the mother of brave sons, that I may occupy the central-most position among my kinsfolk.
Translation
May the creator of the universe, Prosperity and the rising Sun be favorable to me in the term as I describe them to be. I Praise the earth which gives birth to brave children of the nation. In this way may, I be the centre of my kinsmen.
Translation
May nourishing, charitable, and goading noblemen, the Commander-in chief and The Chief Engineer hear with favor this word of mine and accept it. I invoke divine intellect, the mother of heroes, that I may be uppermost amongst my kinsmen.
Footnote
Intellect is the source of producing heroes in a nation. ‘Mine’ refers to the king.
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
२−(धाता)। धारकः। पोषकः। (रातिः)। रा दाने-कर्तरि क्तिच्। दानशीलः। (सविता)। सर्वप्रेरकः। (इदम्)। इन्देः कमिन्नलोपश्च। उ० ४।१५७। इति इदि परमैश्वर्ये-कमिन्, न लोपः। परमैश्वर्यकारणम्। (जुषन्ताम्)। जुष तर्के, जुषी प्रीतिसेवनयोः। तर्कयन्तु। विचारयन्तु सेवन्ताम्। (इन्द्रः)। परमैश्वर्यवान्। (त्वष्टा)। अ० २।५।६। देवशिल्पी विश्वकर्मा। (प्रति)। प्रत्यक्षम्। (हर्यन्तु)। हर्य गतिकान्त्योः। कामयन्ताम् सादरं शृण्वन्तु। स्वीकुर्वन्तु। (मे)। मदीयम्। (वचः)। वच कथने, संदेशे च-असुन्। वचनम्। (हुवे)। ह्वेङ् आह्वाने। आह्वयामि। (देवीम्)। दानादिगुणयुक्ताम्। दिव्यगुणवतीम्। (अदितिम्)। अ० २।२८।५। अखण्डव्रताम्। अदीनां देवमातरम्। सुलक्षणां स्त्रियं विद्यां वा (शूरपुत्राम्)। शूरा विक्रान्ताः शौर्योपेताः पुत्रा यस्याः सा तथोक्ता ताम्। वीरुपुत्रवतीम्। (सजातानाम्)। समानजन्मनाम्। बन्धूनाम्। (मध्यमेष्ठाः)। अ० २।६।४। मध्यम+ष्ठा गतिनिवृत्तौ-विच्। सप्तम्या अलुक्। मध्यभवेषु प्रधानेषु स्थिताः। (यथा)। यस्मात् कारणात्। (असानि)। असेर्लोटि। अहं भवानि ॥
बंगाली (2)
भाषार्थ
(ধাতা) ধারণ-পোষণ করার অধিকারী, (রাতিঃ) দানাধিকারী, (সবিতা) জন্ম এবং কোষের অধিকারী (ইদম্ মে বচঃ) আমার এই কথন (জুষন্তাম্) প্রীতিপূর্বক সেবিত/গ্রহণ করুক, শ্রবণ করুক, (ইন্দ্রঃ) সম্রাট্, (ত্বষ্টা) এবং কারিগরীর অধিকারী [আমার এই কথনকে] (প্রতিহর্যন্তু) কামনাপূর্বক শ্রবণ করুক। (শূরপুত্রাম্) যুদ্ধবীর, দানবীর, ধর্মবীর আদি পুত্রাধিকারী/পুত্রসম্পন্ন (অদিতিম্) অদীনা (দেবীম্) মাতৃদেবী [সম্রাট-পত্নী] এরও (হুবে) আমি [শাসনকার্যে] আহ্বান করি, (যথা সজাতানাম্) যাতে সমানজাতির [রাজাদের মধ্যে] (মধ্যমেষ্ঠাঃ) মধ্যস্থ (অসানি) আমি হয়ে যাই।
टिप्पणी
[সবিতা= ষু প্রসবে তথা ঐশ্বর্যে (ভ্বাদিঃ)। সবিতা এই দুই বিভাগের অধিকারী। ত্বষ্টা= ত্বক্ষতের্বা স্যাৎ করোতিকর্মণঃ (নিরুক্ত এর ৮।২।১৪; ত্বষ্টা পদ (১১)। হর্যন্তু= হর্য গতিকান্ত্যোঃ (ভ্বাদিঃ)। অসানি= অসের্লোটি আডাগমঃ (অষ্টা০ ৩।৪।৯২)। মধ্যমেষ্ঠাঃ= বরুণ-রাজাদের মধ্যে বিবাদ উপস্থিত হলে মধ্যস্থ হয়ে যাতে আমি নির্ণয় দিতে পারি। শূরপুত্রাম্ = সম্রাটের পত্নী মাতৃবৎ, সম্রাটের সমস্ত বীরের মাতা। সে অদীনা, সম্রাটের পত্নী হওয়ায়, কারোর প্রতি দৈন্যভাব রাখে না।]
मन्त्र विषय
প্রীতিজননায়োপদেশঃ
भाषार्थ
(ধাতা) পোষণকর্তা, (রাতিঃ) দানকর্তা, (সবিতা) সর্বপ্রেরক, (ইন্দ্রঃ) পরম ঐশ্বর্যবান্ এবং (ত্বষ্টা) দেবশিল্পী বা বিশ্বকর্মা [এই সকল পুরুষ] (মে) আমার (ইদম্) পরম ঐশ্বর্যের কারণ (বচঃ) বচন (জুষন্তাম্) বিচার করুক এবং (প্রতি) প্রত্যক্ষরূপে (হর্যন্তু) স্বীকার করুক। (দেবীম্) দিব্য গুণান্বিত, (শূরপুত্রাম্) বীর পুত্রসমন্বিত (অদিতিম্) অদান বা অখণ্ড ব্রতী দেবমাতা [চতুর স্ত্রী বা বিদ্যা]কে (হুবে) আমি আহ্বান করি, (যথা) যাতে আমার (সজাতানাম্) নিজের সজাতীয়/সমান জন্মবিশিষ্ট ভাই-বন্ধুদের মধ্যে (মধ্যমেষ্ঠাঃ) প্রধান মধ্যস্থ [mediator] হয়ে (অসানি) থাকি ॥২॥
भावार्थ
রাজা মহান গুণবান্ পুরুষ, অনেক গুণবতী নারী এবং বিদ্যার প্রতিষ্ঠা বৃদ্ধি করুক, যাতে সে তাঁদের সহায়তায় নিজের উন্নতি করে ॥২॥
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