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अथर्ववेद के काण्ड - 3 के सूक्त 8 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 8/ मन्त्र 6
    ऋषिः - अथर्वा देवता - मनः छन्दः - जगती सूक्तम् - राष्ट्रधारण सूक्त
    63

    अ॒हं गृ॑भ्णामि॒ मन॑सा॒ मनां॑सि॒ मम॑ चि॒त्तमनु॑ चि॒त्तेभि॒रेत॑। मम॒ वशे॑षु॒ हृद॑यानि वः कृणोमि॒ मम॑ या॒तमनु॑वर्त्मान॒ एत॑ ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    अ॒हम् । गृ॒भ्णा॒मि॒ । मन॑सा । मनां॑सि । मम॑ । चि॒त्तम् । अनु॑ । चि॒त्तेभि॑: । आ । इ॒त॒। मम॑ । वशे॑षु । हृद॑यानि । व॒: । कृ॒णो॒मि॒ । मम॑ । या॒तम् । अनु॑ऽवर्त्मान: । आ । इ॒त॒ ॥८.६॥


    स्वर रहित मन्त्र

    अहं गृभ्णामि मनसा मनांसि मम चित्तमनु चित्तेभिरेत। मम वशेषु हृदयानि वः कृणोमि मम यातमनुवर्त्मान एत ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    अहम् । गृभ्णामि । मनसा । मनांसि । मम । चित्तम् । अनु । चित्तेभि: । आ । इत। मम । वशेषु । हृदयानि । व: । कृणोमि । मम । यातम् । अनुऽवर्त्मान: । आ । इत ॥८.६॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 3; सूक्त » 8; मन्त्र » 6
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    प्रीति उत्पन्न करने का उपदेश।

    पदार्थ

    (अहम्) मैं (मनसा) अपने मन से (मनांसि) तुम्हारे मनों को (गृभ्णामि= गृह्णामि) थामता हूँ, (मम) मेरे (चित्तम् अनु) चित्त के पीछे-पीछे (चित्तेभिः=चित्तैः) अपने चित्तों से (आ इत) आओ। (मम वशेषु) अपने वश में (वः हृदयानि) तुम्हारे हृदयों को (कृणोमि) मैं करता हूँ, (मम यातम्) मेरी चाल पर (अनुवर्त्मानः) मार्ग चलते हुए (आ इत) यहाँ आओ ॥६॥

    भावार्थ

    प्रधान पुरुष अपने शुभ विचार और साहस से सब सभासदों और प्रजागणों को धर्म पथ पर चलाकर परस्पर मेल के साथ साहसी और उत्साही बनावे ॥६॥

    टिप्पणी

    ६−(अहम्)। प्रधानपुरुषः। (गृभ्णामि)। भस्य हः। गृह्णामि। स्थिरीकरोमि। (मनसा)। मानसिकबलेन। (मनांसि)। मानसिकबलानि। (चित्तम्)। ज्ञानम्। (अनु)। अनुसृत्य। (चित्तेभिः)। चित्तैः। ज्ञानैः। (आ इत)। आगच्छत। (मम)। स्वकीयेषु। (वशेषु)। वश कान्तौ-अप्। आयत्तत्वेषु। प्रभुत्वेषु। (हृदयानि)। अन्तःकरणानि। (वः)। युष्माकम्। (कृणोमि)। करोमि। (यातम्)। या गतौ-क्त। गमनम्। (अनुवर्त्मानः)। अनु+वर्त्मन्। अनुसृतमार्गाः सन्तः ॥

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    विषय

    राजा व प्रजा की अनुकूलता

    पदार्थ

    १. राजा प्रजाओं से कहता है कि (अहम्) = मैं (मनसा) = अपने मन के द्वारा (मनांसि) = तुम्हारे मनों को गृभ्णामि ग्रहण करता हूँ-अपने वश में करता हूँ। तुम सब (मम) = मेरे (चित्तम् अनु)-चित्त के अनुकूल (चित्तेभिः) = चित्तों से (एत) = गतिवाले होओ। २. (मम वशेषु) = मुझसे चाहे गये अर्थों में (वः) = तुम्हारे (हृदयानि) = हदयों को (कृणोमि) = करता हूँ। (मम) = मेरे (यातम् अनु वनि:) = गमन के अनुकूल मार्गवाले (एत) = तुम गति करो-मेरे मार्ग के पीछे चलनेवाले होओ।

    भावार्थ

    राजा को प्रजा की पूर्ण अनुकूलता प्राप्त हो तभी राष्ट्र विजयी व उन्नत होता है।

     

    विशेष

    इस उत्तम राष्ट्र में ही 'वामदेव' सुन्दर दिव्य गुणोंवाले पुरुष का जन्म होता है। यही अगले सूक्त का ऋषि है

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    भाषार्थ

    [हे प्रजाजनो !] (मनांसि) तुम्हारे मनों को (मनसा) निज मन द्वारा (अहम्) मैं सम्राट् (गृभ्णामि) अपने अनुकूल करता हूं, (चित्तेभिः) निज चित्तों द्वारा (मम) मेरे (चित्तम्, अनु) चित्त के, अनुकूल हुए (एत) आया करो। [मुझे मिलने के लिए] (मम) मेरी (वशेषु) इच्छाओं में (वः) तुम्हारे (हृदयानि कृणोमि) हृदयों को मैं करता हूं, (मम) मेरे (यातम्) चलने के (अनुवत्मनि:) अनुवर्ती हुए (एत) आया करो।

    टिप्पणी

    [वशेषु=वश कान्तौ (अदादि), कान्ति=कामना, इच्छा।]

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    विषय

    राजा के कर्तव्य ।

    भावार्थ

    (अहं) मैं राजा, शासक (मनांसि) अपनी प्रजा के मनों को (मनसा) अपने मन से (गृभ्णामि) ग्रहण करता हूं, वश करता हूं । हे प्रजाजनो ! एवं मेरे अधीन शासकवर्गो ! (चित्तेभिः) अपने चित्तों से (मम चित्तम् अनु) मेरे चित्त के अनुकुल ही (एत) होकर रहो । (वः) तुम्हारे (हृदयानि) हृदयों को मैं (मम) अपने (वशेषु) अधीन के कार्यों में (कृणोमि) नियुक्त करता हूं। आप लोग (अनुवर्त्मानः) मेरे अनुकुल मार्ग पर चलने हारे होकर (मम यातम्) मेरे चले रास्ते पर ही (एत) गमन करो अर्थात् मेरे विधान किये मार्ग से विपरीत, विरुद्ध मार्ग पर पैर मत रक्खो । इसी सूक्त से आचार्य माणवक के हृदय और नाभिदेश को स्पर्श करके उसको अपने अनुकूल बनाने का उपदेश करता है । राजा का प्रजा से, पिता का पुत्रों से, पति का अपने परिवार से एवं गुरु का शिष्य से जो सम्बन्ध है वह एक प्रकार का शास्य-शासक का सा ही है । उनकी भी अपनी २ सरकार सी है, फलतः उपरोक्त अर्थों की इन पक्षों में भी योजना कर लेनी चाहिये ।

    टिप्पणी

    (प्र०) ‘गृह्णामि’ इति सायणाभिमतः ।

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    अथर्वा ऋषिः। मित्रो विश्वेदेवा वा देवता । २, ६ जगत्यौ । ४ चतुष्पदा विराड् बृहतीगर्भा । त्रिष्टुप् । ५ अनुष्टुप् । १, ३ त्रिष्टुभौ । षडृचं सूक्तम् ॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Rashtra Unity

    Meaning

    I hold your minds together with mine. Come with your thoughts, ideas and values together with my thoughts, ideas and values. I win your hearts together bound in love with me. Moving thus together, join me, and move on together on the common path for a common goal.

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    Translation

    With my mind, I take hold of your minds. Follow my thought with your thinking. I take your hearts under my control. Tread the path on which I lead you.

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    Translation

    I, the ruler of the dominion seize your mind with my mind, you make your mind and intention concordant with my mind and intention, I make your hearts the thralls of mine and adhering to me strictly, O' ye men tread the path I adopt.

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    Translation

    I with my spirit hold and seize your spirits. Follow with thought and wish any thoughts and wishes. I make your hearts the thralls of my dominion;on me attendant come the way I guide you.

    Footnote

    I refers to the King. 'Your' refers to the subjects.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    ६−(अहम्)। प्रधानपुरुषः। (गृभ्णामि)। भस्य हः। गृह्णामि। स्थिरीकरोमि। (मनसा)। मानसिकबलेन। (मनांसि)। मानसिकबलानि। (चित्तम्)। ज्ञानम्। (अनु)। अनुसृत्य। (चित्तेभिः)। चित्तैः। ज्ञानैः। (आ इत)। आगच्छत। (मम)। स्वकीयेषु। (वशेषु)। वश कान्तौ-अप्। आयत्तत्वेषु। प्रभुत्वेषु। (हृदयानि)। अन्तःकरणानि। (वः)। युष्माकम्। (कृणोमि)। करोमि। (यातम्)। या गतौ-क्त। गमनम्। (अनुवर्त्मानः)। अनु+वर्त्मन्। अनुसृतमार्गाः सन्तः ॥

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    बंगाली (2)

    भाषार्थ

    [হে প্রজাগণ !] (মনাংসি) তোমাদের মনকে (মনসা) নিজ মন দ্বারা (অহম্) আমি সম্রাট্ (গৃভ্ণামি) নিজের অনুকূল করি, (চিত্তেভিঃ) নিজ চিত্ত দ্বারা/সহিত (মম) আমার (চিত্তম্, অনু) চিত্তের, অনুকূল হয়ে (এত) এসো আমার সঙ্গে সাক্ষাৎকারের জন্য]। (মম) আমার (বশেষু) ইচ্ছায় (বঃ) তোমাদের (হৃদয়ানি কৃণোমি) হৃদয়কে আমি করি, (মম) আমার (যাতম্) মতো করে চলার (অনুবর্ত্মান) অনুবর্তী হয়ে (এত) এসো।

    टिप्पणी

    [বশেষু = বশ কান্তৌ (অদাদিঃ), কান্তি= কামনা, ইচ্ছা।]

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    मन्त्र विषय

    প্রীতিজননায়োপদেশঃ

    भाषार्थ

    (অহম্) আমি (মনসা) নিজের মন দ্বারা (মনাংসি) তোমার মনকে (গৃভ্ণামি= গৃহ্ণামি) স্থির করি, (মম) আমার (চিত্তম্ অনু) চিত্তের সাথে-সাথে (চিত্তেভিঃ=চিত্তৈঃ) নিজের চিত্তের সহিত (আ ইত) এসো। (মম বশেষু) নিজের বশে (বঃ হৃদয়ানি) তোমাদের হৃদয়কে (কৃণোমি) আমি করি, (মম যাতম্) আমার গমনানুসারে (অনুবর্ত্মানঃ) মার্গে চলে/গমন করে/অনুসৃত হয়ে (আ ইত) এখানে এসো ॥৬॥

    भावार्थ

    প্রধান পুরুষ নিজের শুভ বিচার এবং সাহসের দ্বারা সমস্ত সভাসদ এবং প্রজাগণদের ধর্ম পথে চালনা করে পরস্পর একতাপূর্বক সাহসী এবং উৎসাহী করুক ॥৬॥

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