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अथर्ववेद के काण्ड - 4 के सूक्त 13 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 13/ मन्त्र 5
    ऋषिः - शन्तातिः देवता - चन्द्रमाः, विश्वे देवाः छन्दः - अनुष्टुप् सूक्तम् - रोग निवारण सूक्त
    113

    आ त्वा॑गमं॒ शंता॑तिभि॒रथो॑ अरि॒ष्टता॑तिभिः। दक्षं॑ त उ॒ग्रमाभा॑रिषं॒ परा॒ यक्ष्मं॑ सुवामि ते ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    आ । त्वा॒ । अ॒ग॒म॒म् । शंता॑तिऽभि: । अथो॒ इति॑ । अ॒रि॒ष्टता॑तिऽभि: । दक्ष॑म् । ते॒ । उ॒ग्रम् । आ । अ॒भा॒रि॒ष॒म् । परा॑ । यक्ष्म॑म् । सु॒वा॒मि॒ । ते॒ ॥१३.५॥


    स्वर रहित मन्त्र

    आ त्वागमं शंतातिभिरथो अरिष्टतातिभिः। दक्षं त उग्रमाभारिषं परा यक्ष्मं सुवामि ते ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    आ । त्वा । अगमम् । शंतातिऽभि: । अथो इति । अरिष्टतातिऽभि: । दक्षम् । ते । उग्रम् । आ । अभारिषम् । परा । यक्ष्मम् । सुवामि । ते ॥१३.५॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 4; सूक्त » 13; मन्त्र » 5
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    स्वास्थ्यरक्षा का उपदेश।

    पदार्थ

    [हे प्राणी !] (त्वा) तुझको (शन्तातिभिः) शान्तिदायक कर्मों से (अथो) और भी (अरिष्टतातिभिः) अहिंसाकारक कर्मों से (आगमम्) मैं प्राप्त हुआ हूँ। (ते) तेरे लिये (उग्रम्) उग्र (दक्षम्) वृद्धिकारक बल (आ अभारिषम्) मैं लाया हूँ, [उससे] (ते) तेरे (यक्ष्मम्) महारोग को (परा सुवामि) दूर हटाता हूँ ॥५॥

    भावार्थ

    मनुष्य श्वास-प्रश्वास और पञ्च भूतों की यथावत् समता और ब्रह्मचर्य आदि शुभ कर्मों द्वारा दुष्कर्मों से बच कर बलवान् धनवान् और नीरोग होवे ॥५॥

    टिप्पणी

    ५−(त्वा) त्वां प्राणिनम् (आगमम्) गमेर्लुङि रूपम्। आगतवान् प्राप्तवानस्मि (शंतातिभिः) शिवशमरिष्टस्य करे। पा० ४।४।१४३। इति करणेऽर्थे तातिल् प्रत्ययः। लिति। पा० ६।१।१९३। इति प्रत्ययपूर्व उदात्तः। शंकरैः सुखकरैः कर्मभिः (अथो) अपि च (अरिष्टतातिभिः) पूर्ववत् तातिल्, उदात्तत्वं च। अरिष्टम् अहिंसा। तत्करैः श्रेयोहेतुभिः कर्मभिः (दक्षम्) वृद्धिकरं बलम् (ते) तुभ्यम् (उग्रम्) उद्गूर्णम्। तीव्रम् (आ अभारिषम्) हस्य भकारः। आहार्षम्। आहृतवानस्मि। आनैषम् (यक्ष्मम्) महारोगम् (परा सुवामि) षू प्रेरणे, तौदादिकः। पराङ्मुखं प्रेरयामि (ते) तव ॥

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    विषय

    'शन्ताति: अरिष्टताति' भेषज

    पदार्थ

    १. वैद्य रोगी से कहता है कि मैं (त्वा) = तेरे समीप (शन्तातिभिः) = शान्ति का विस्तार करनेवाली [शं-कर] (अथो) = और (अरिष्टतातिभि:) = हिंसा न करनेवाली ओषधियों के साथ (आ अगमम्) = प्राप्त हुआ हूँ। २. मैं (ते) = तेरे लिए इनके ठीक विनियोग से (उग्रम्) = उद्गूर्ण-प्रबल (दक्षम्) = समृद्धिकर बल को (आभारिषम्) = लाया हूँ। बस, मैं शीघ्र ही (यक्ष्मम्) = रोग को (ते) = तुझसे (परा सुवामि) = दूर करता हूँ।

    भावार्थ

    वैद्य रोगी को रोगों को शान्त करनेवाली तथा हानिरहित औषधों का सेवन कराके सबल व नीरोग बनाता है।

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    भाषार्थ

    हे रोगी ! (त्वा) तेरे प्रति (आ अगमम्) मैं आ गया हूँ, (शतांतिभिः) रोगशामक साधनों के विस्तार के साथ, (अथो) तथा (अरिष्टतातिभिः) अहिंसा-विस्तारक साधनों के विस्तार के साथ। (ते) तेरे लिए (उग्रम्, दक्षम्) उग्र वृद्धिकारक बलों को (आ भारिषम्) मैं लाया हूँ। (ते) तेरे (यक्ष्मम्) यक्ष्मा को (परा सुवामि) मैं पराङ्मुख प्रेरित करता हूँ, हटा देता हूँ।

    टिप्पणी

    [तातिभिः=तनु विस्तारे, अथवा "तातिल्" प्रत्यय: "शिवशमरिष्टस्य करे" (अष्टा० ४।४।१४३) । साधनों का वर्णन मन्त्र ६, ७ में हुआ है।]

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    विषय

    पतितोद्धार, शुद्धि और रोगनाशन।

    भावार्थ

    मैं आचार्य और वैद्य, विद्वान् व्यक्ति (शन्तातिभिः) कल्याण और शान्ति के देने वाले, (अथो) और (अरिष्टतातिभिः) आरोग्यकारी ज्ञान और कर्म और उपायों से, (त्वा) तेरे समीप (आ गमम्) आता हूँ। (ते) तेरे शरीर में (उग्रं) उग्र, अधिक बल युक्त (दक्षं) बल और अन्न को (आभारिषं) लाता हूं। और उससे (ते) तेरे (यक्ष्मं) रोगजनक कारण को (परा सुवामि) दूर करता हूं।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    शंताति र्ऋषिः। चन्द्रमा उत विश्वे देवा देवताः। १-७ अनुष्टुभः। सप्तर्चं सूक्तम् ॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Save the Life

    Meaning

    O man, I come to you with the means and message of peace and good health and freedom from violence and disease. I bear and bring for you the lustre of good health, passion for life and expertise to live and work. I inspire and energise you and throw out consumptive and cancerous negativities from your health system.

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    Translation

    I have come to you with (tranquilizers) remedies giving rest and peace, and which prevent grave injury. I have brought formidable strength for you. I hereby drive away your wasting disease. (Cf. Rg. X.137.4)

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    Translation

    O man! I, the physician come to save you with the measures of peace and the measures of cure. I restore to you vigorous strength and remove away the cause of diseases from you.

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    Translation

    I am come nigh to thee with balms to give thee rest and keep- thee safe, bring thee mighty strength, I drive thy pulmonary consumption away.

    Footnote

    I: A physician. Thee: A patient.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    ५−(त्वा) त्वां प्राणिनम् (आगमम्) गमेर्लुङि रूपम्। आगतवान् प्राप्तवानस्मि (शंतातिभिः) शिवशमरिष्टस्य करे। पा० ४।४।१४३। इति करणेऽर्थे तातिल् प्रत्ययः। लिति। पा० ६।१।१९३। इति प्रत्ययपूर्व उदात्तः। शंकरैः सुखकरैः कर्मभिः (अथो) अपि च (अरिष्टतातिभिः) पूर्ववत् तातिल्, उदात्तत्वं च। अरिष्टम् अहिंसा। तत्करैः श्रेयोहेतुभिः कर्मभिः (दक्षम्) वृद्धिकरं बलम् (ते) तुभ्यम् (उग्रम्) उद्गूर्णम्। तीव्रम् (आ अभारिषम्) हस्य भकारः। आहार्षम्। आहृतवानस्मि। आनैषम् (यक्ष्मम्) महारोगम् (परा सुवामि) षू प्रेरणे, तौदादिकः। पराङ्मुखं प्रेरयामि (ते) तव ॥

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