अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 13/ मन्त्र 7
ऋषिः - शन्तातिः
देवता - चन्द्रमाः, विश्वे देवाः
छन्दः - अनुष्टुप्
सूक्तम् - रोग निवारण सूक्त
68
हस्ता॑भ्यां॒ दश॑शाखाभ्यां जि॒ह्वा वा॒चः पु॑रोग॒वी। अ॑नामयि॒त्नुभ्यां॒ हस्ता॑भ्यां॒ ताभ्यां॑ त्वा॒भि मृ॑शामसि ॥
स्वर सहित पद पाठहस्ता॑भ्याम् । दश॑ऽशाखाभ्याम् । जि॒ह्वा । वा॒च: । पु॒र॒:ऽग॒वी । अ॒ना॒म॒यि॒त्नुऽभ्या॑म् । हस्ता॑भ्याम् । ताभ्या॑म् । त्वा॒ । अ॒भि । मृ॒शा॒म॒सि॒ ॥१३.७॥
स्वर रहित मन्त्र
हस्ताभ्यां दशशाखाभ्यां जिह्वा वाचः पुरोगवी। अनामयित्नुभ्यां हस्ताभ्यां ताभ्यां त्वाभि मृशामसि ॥
स्वर रहित पद पाठहस्ताभ्याम् । दशऽशाखाभ्याम् । जिह्वा । वाच: । पुर:ऽगवी । अनामयित्नुऽभ्याम् । हस्ताभ्याम् । ताभ्याम् । त्वा । अभि । मृशामसि ॥१३.७॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
स्वास्थ्यरक्षा का उपदेश।
पदार्थ
(दशशाखाभ्याम्) दश शाखावाले (हस्ताभ्याम्) दोनों हाथों के द्वारा (जिह्वा) जिह्वा (वाचः) वाणी की (पुरोगवी) आगे ले चलनेवाली है। (ताभ्याम्) उन (अनामयित्नुभ्याम्) आरोग्य देनेवाले (हस्ताभ्याम्) दोनों हाथों से (त्वा) तुझको (अभि मृशामसि) हम छूते हैं ॥७॥
भावार्थ
मनुष्य प्राण अपान और पञ्च भूत परीक्षा द्वारा दस अंगुलियों से दस इन्द्रियों और दस दिशाओं का ज्ञान प्राप्त करके दुःख की निवृत्ति और सुख की प्रवृत्ति करें ॥७॥
टिप्पणी
७−(हस्ताभ्याम्) कराभ्याम् (दशशाखाभ्याम्) दश अङ्गुलयः शाखाभूता ययोस्तादृशाभ्याम् (जिह्वा) रसना (वाचः) वाण्याः (पुरोगवी) गोरतद्धितलुकि। पा० ५।४।९२। इति पुरस्+गो समासे टच्, स्त्रियां ङीप्, अन्तर्गतण्यर्थः। पुरो अग्रे गौर्गमयित्री (अनामयित्नुभ्याम्) अनामय-इत्नुच्। अनामयशीलाभ्याम्। आरोग्यहेतुभ्याम् (त्वा) त्वां प्राणिनम् (अभि मृशामसि) इदन्तो मसिः। पा० ७।१।४६। इति मसः स्थाने मसि। अभितः स्पृशामः ॥
विषय
अनामयित्नु हाथ
पदार्थ
१. वैद्य जब रोगी की चिकित्सा करता है तब हाथों का प्रयोग तो करता ही है, परन्तु जिह्वा वाक् की पुरोगवी होती है, जिह्वा शब्दों के उच्चारण के लिए पहले व्याप्त होती है। हाथ से यदि वह उसे औषध देता है, तो वाणी से उसे उत्साह प्राप्त कराता है। (दशशाखाभ्यां हस्ताभ्याम्) = दश शाखाओंवाले हाथों के साथ (जिह्वा) = वागिन्द्रिय की अधिष्ठातृभूत रसना (वाच:) = शब्द को (पुरोगवी) = आगे ले-चलनेवाली होती है। शब्द के उच्चारण के लिए यह रसना व्यापृत होती है। २. वैद्य कहता है कि (अनामयित्नुभ्याम्) = आरोग्य के हेतुभूत (ताभ्यां हस्ताभ्याम्) = उन हाथों से (त्वा) = तुझे (अभिमशामसि) = अभितः संस्पृष्ट करते हैं। यह हाथों का स्पर्श तुझे नीरोग बना देगा।
भावार्थ
वैद्य हाथों से रोगी की चिकित्सा करता हुआ वाणी से उसे उत्साहित करनेवाला हो, उसे यही कहे कि मेरे हाथ तुझे अभी स्वस्थ किये देते हैं। ये हाथ अनामयित्नु हैं।
विशेष
नीरोग बनकर यह व्यक्ति तपस्वी बनता है-'भृग' [भ्रस्ज पाके]। भृगु बनकर ऊपर उठता हुआ यह ब्रह्म को प्राप्त करता है -
भाषार्थ
(दश शाखाभ्याम्) दस शाखाओंवाले (हस्ताभ्याम्) दो हाथों के साथ-साथ (वाचः जिह्वा) वाणी-सम्बन्धी जिह्वा (पुरोगवी) पहले गमन करती है। (अनामयित्नुभ्याम्१) रोगनिवारक (ताभ्याम्) उन दोनों (हस्ताभ्याम्) हाथों द्वारा हम (त्वा) तेरा (अभि मृशामसि) साक्षात् स्पर्श करते हैं।
टिप्पणी
[दस शाखाएँ हैं, दोनों हाथों की खुली हुई १० अंगुलियाँ। इन अंगुलियों के अग्रभागों द्वारा शक्ति का संचार किया गया है। शक्ति संचार करने से पूर्व जिह्वा द्वारा उच्चारणपूर्वक रोगी को विश्वास दिला कर उसे शक्तिग्रहण के लिए स्वाभिमुख किया गया है। चिकित्सक नाना हैं, तभी 'मृशामसि' में बहुवचन का प्रयोग हुआ है। सभी मनोबलपूर्वक निज हस्तशाखाओं के अग्रभागों द्वारा शक्ति-संचार करते हैं। इस विधि से अधिक मात्रा में शक्ति-संचार किया जाता है।] [१. अनामयित्नुभ्याम् = चीन में ऐसी आरोग्य-संस्थाएँ हैं जिनमें प्राकृतिक ओषधियों के विना रोगचिकित्सा की जाती है। इन संस्थाओं को Oigong कहते हैं। 'Oi' का अर्थ है शक्ति, Power। इन संस्थाओं में हाथ की अंगुलियों के अग्रभागों द्वारा रोगी में शक्ति का संचार किया जाता है, और इस द्वारा नाना रोगों की चिकित्सा की जाती है, यथा "हृदय रोग, समृद्ध रक्त-दबाव [High Blood Pressure], जिगर [liver] की सूजन, दृष्टिशक्ति की कमजोरी अर्थात् निर्बलता, उदरविकृति तथा दीर्घायुष्य की प्राप्ति भी।" चिकित्सा के समय मन की शान्ति, ध्यान को रोगी पर स्थिर करना, तथा दीर्घश्वास लेना,-इन तीन सिद्धान्तों पर रोगी में शक्तिसंचार किया जाता है। यह उद्धरण हिन्दुस्तानटाइम्स, शनिवार, नवम्बर १५,१९८६ से लिया गया है। लेख आंग्ल भाषा में है, जिसका हिन्दी अनुवाद किया है।]
विषय
पतितोद्धार, शुद्धि और रोगनाशन।
भावार्थ
मानस और स्पर्श-चिकित्सा का उपदेश करते हैं। (दश-शाखाभ्यां) दश अंगुली रूप शाखाओं से युक्त इन (हस्ताभ्या) दो हाथों के साथ (जिह्वा) यह जीभ (वाचः) वाणी को (पुरोगवी) प्रथम उच्चारण करने हारी होती है। (अनामयित्नुभ्यां) आमय अर्थात् रोग से रहित इन (हस्ताभ्यां) हाथों से (त्वा) तुझे, तेरे शरीर को हम वैद्य लोग और बालक के आचार्य लोग (अभि मृशामसि) स्पर्श करते हैं। नीरोग, रोगजन्तुनों से रहित स्वच्छ हाथों से वैद्य रोगी के शरीर का स्पर्श करे और मानस बल द्वारा चिकित्सा करने के लिये हाथों की अंगुलियों को फैला कर वाणी के शब्दोच्चारण सहित उसकी चिकित्सा कर दिया करे।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
शंताति र्ऋषिः। चन्द्रमा उत विश्वे देवा देवताः। १-७ अनुष्टुभः। सप्तर्चं सूक्तम् ॥
इंग्लिश (4)
Subject
Save the Life
Meaning
With both hands of tenfold soft caress of fingers, with the tongue that brings forth words of love and intention inspiring you to rise and move forward, with hands that emanate freedom from ailment and disease, with these we give you the healing touch of health and well being.
Translation
For two hands, having ten -branches, the tongue becomes forerunner of speech. With such hands, that cure all ills, we touch you over all your body. (Cf. Rg.X.137.7)
Translation
O man! I, the physician stroke you with a soft caress, with my hands which are the healers of disease. My hands have ten fingers and the tongue leading the voice precedes their activities. [N.B. The tongue leads the voice. It precedes the activities. It is a general rule that idea of doing something is formed first and the action is started afterwards. Tongue pronounce the idea which is formed in mind. All the voluntary actions are governed by this law.]
Translation
With our tenfold fingered hands, with our tongue that leads and precedes the voice, with these two healers of disease, we stroke thee with a gentlefondling touch.
Footnote
We may refer to physicians or teachers. Thee may refer to the patient or pupil. A physician heals a patient by his encouraging words and soft touch of his hands. A teacher encourages a pupil by his elevating words of advice and loving touch.
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
७−(हस्ताभ्याम्) कराभ्याम् (दशशाखाभ्याम्) दश अङ्गुलयः शाखाभूता ययोस्तादृशाभ्याम् (जिह्वा) रसना (वाचः) वाण्याः (पुरोगवी) गोरतद्धितलुकि। पा० ५।४।९२। इति पुरस्+गो समासे टच्, स्त्रियां ङीप्, अन्तर्गतण्यर्थः। पुरो अग्रे गौर्गमयित्री (अनामयित्नुभ्याम्) अनामय-इत्नुच्। अनामयशीलाभ्याम्। आरोग्यहेतुभ्याम् (त्वा) त्वां प्राणिनम् (अभि मृशामसि) इदन्तो मसिः। पा० ७।१।४६। इति मसः स्थाने मसि। अभितः स्पृशामः ॥
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