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अथर्ववेद के काण्ड - 4 के सूक्त 14 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 14/ मन्त्र 1
    ऋषिः - भृगुः देवता - आज्यम्, अग्निः छन्दः - त्रिष्टुप् सूक्तम् - स्वर्ज्योति प्राप्ति सूक्त
    101

    अ॒जो ह्यग्नेरज॑निष्ट॒ शोका॒त्सो अ॑पश्यज्जनि॒तार॒मग्रे॑। तेन॑ दे॒वा दे॒वता॒मग्र॑ आय॒न्तेन॒ रोहा॑न्रुरुहु॒र्मेध्या॑सः ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    अ॒ज: । हि । अ॒ग्ने: । अज॑निष्ट । शोका॑त् । स: । अ॒प॒श्य॒त् । ज॒नि॒तार॑म् । अग्ने॑ । तेन॑ । दे॒वा: । दे॒वता॑म् । अग्रे॑ । आ॒य॒न् । तेन॑ । रोहा॑न् । रु॒रु॒हु॒: । मेध्या॑स: ॥१४.१॥


    स्वर रहित मन्त्र

    अजो ह्यग्नेरजनिष्ट शोकात्सो अपश्यज्जनितारमग्रे। तेन देवा देवतामग्र आयन्तेन रोहान्रुरुहुर्मेध्यासः ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    अज: । हि । अग्ने: । अजनिष्ट । शोकात् । स: । अपश्यत् । जनितारम् । अग्ने । तेन । देवा: । देवताम् । अग्रे । आयन् । तेन । रोहान् । रुरुहु: । मेध्यास: ॥१४.१॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 4; सूक्त » 14; मन्त्र » 1
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    हिन्दी (3)

    विषय

    ब्रह्म की प्राप्ति का उपदेश।

    पदार्थ

    (अजः) अजन्मा, वा गतिशील, अज अर्थात् जीवात्मा (शोकात्) दीप्यमान (अग्नेः) सर्वव्यापक अग्नि अर्थात् परमेश्वर से (हि) ही (अजनिष्ट) प्रकट हुआ। (सः) उस (जीवात्मा) ने (अग्रे) पहिले से वर्तमान (जनितारम्) अपने जनक [परमात्मा] को (अपश्यत्) देखा। (तेन) उस [ज्ञान] से (देवाः) देवताओं ने (अग्रे) पहिले काल में (देवताम्) देवतापन (आयन्) पाया, (तेन) उससे ही (मेध्यासः) मेधावी वा पवित्र−स्वभाव पुरुष (रोहान्) चढ़ने योग्य पदों पर (रुरुहुः) चढ़े ॥१॥

    भावार्थ

    मनुष्य आदि पिता जगदीश्वर से अपना शरीर और सामर्थ्य पाकर अपने जन्म और वंश का गौरव बढ़ाते हैं, जैसे पूर्वज महात्माओं ने परमात्मा की महिमा पहचानकर मोक्ष आदि उच्च पद पाये हैं ॥१॥ यह मन्त्र कुछ भेद से यजुर्वेद १३।५१। में है ॥

    टिप्पणी

    १−(अजः) न जायते यः। नञ्+जन-ड। यद्वा, अज गतिक्षेपणयोः, अच्। अजन्मा। गतिशीलः। जीवात्मा-इति शब्दस्तोममहानिधिः (हि) निश्चयेन (अग्नेः) अगि गतौ-नि। सर्वव्यापकात् परमेश्वरात् (अजनिष्ट) प्रादुरभूत् (शोकात्) शुच शौचे, शोके च-घञ्। दीप्यमानात्-इति महीधरः य० १३।५१। (सः) अजः। जीवात्मा (अपश्यत्) दृष्टवान् (जनितारम्) जनयितारं स्वोत्पादकं प्रजापतिम् अग्निम् (अग्रे) सृष्टेः प्राग् वर्तमानम् (तेन) जनयितृज्ञानेन (देवाः) विद्वांसः। महात्मानः (देवताम्) तस्य भावस्त्वतलौ-पा० ६।१।१५९। इति तल्। देवभावम्। दिव्यगुणताम् (अग्रे) अस्मत्पूर्वकाले वर्त्तमानाः (आयन्) इण् गतौ-लङ्। प्राप्नुवन् (रोहान्) रुह-घञ्। आ रोहणीयान् सुखलोकान् (रुरुहुः) आरूढवन्तः (मेध्यासः) उगवादिभ्यो यत्। पा० ५।१।२। इति मेधा-यत्। असुगागमः। मेधायै हिताः। मेध्याः। मेधाविनः। पवित्राः पुरुषाः ॥

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    विषय

    - जनित-दर्शन

    पदार्थ

    १. (अग्ने:) = उस अग्रणी प्रभु के (शोकात्) = दीपन से [शुच to illuminate], प्रकाश से (हि) = ही (अजः अजनिष्टः) = जीवात्मा गति के द्वारा सब बुराइयों को परे फेंकनेवाला बनता है [अज गतिक्षेपणयोः] । (स:) = यह बुराइयों को परे फेंकनेवाला जीव (जानितारम्) = उस उत्पादक प्रभु को (अग्ने) = सामने (अपश्यत्) = देखता है। २. यह परमात्मा को इस रूप में देखता है कि (तेन) = उस प्रभु से ही (देवा:) = सब देव (अग्ने)= सर्वप्रथम (देवताम्) = देवत्व को (आयन्) = प्राप्त होते हैं। सूर्यादि देवों को प्रभु ही दीसि प्राप्त कराते हैं। इसीप्रकार (मेध्यासः) = पवित्र जीवनवाले पुरुष (तेन) = उस प्रभु के द्वारा ही (रोहान् रुरुहु:) = उन्नति-शिखरों पर आरोहण करते है। बुद्धिमान पुरुष प्रभ से ही बुद्धि प्रास करते हैं, बलवानों को वे प्रभु ही बल देते हैं।

    भावार्थ

    प्रभु के दीपन से जीव सब बुराइयों को दूर कर पाता है। अब यह प्रभु-दर्शन करता है और देखता है कि प्रभु से ही सूर्यादि सब देव देवत्व को प्रास होते हैं तथा सब पवित्र जीव प्रभु से ही उन्नति-शिखरों पर आरोहण कर पाते हैं।

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    भाषार्थ

    (अजः) जन्म से रहित (है) निश्चय से, [जीवात्मा], (अग्नेः) अग्निनामक परमेश्वर के (शोकात्) प्रकाश से (अजनिष्ट) उत्पन्न हुआ, उसने शरीर धारण किया, (सः) उसने (अग्रे) पहले (जनितारम्) जन्मदाता अग्निनामक परमेश्वर को (अपश्यत्) देखा, उसका साक्षात्कार किया। (तेन) उस द्वारा या उस साक्षात्कार द्वारा (देवाः) अन्य दिव्यगुणी भी (अग्रे) पहले (देवताम्) देवत्व को (आयन्) प्राप्त हुए, (तेन) उस द्वारा (मेध्यास:) पवित्र हुए (रोहान्) ऊँचाइयों पर (रुरुहुः) चढ़े।

    टिप्पणी

    [जीवात्मा अज है, स्वरूप से अनुत्पन्न है, नित्य है। वह शरीर धारण कर परमेश्वर के प्रकाश को देखता है और पवित्र होकर ऊँचाइयों पर चढ़ जाता है [मन्त्र ३]। इसी प्रकार अन्य दिव्यगुणी देवत्व को प्राप्त कर, पवित्र होकर, ऊँचाइयों पर आरोहण करते हैं। शोकात्=शोक, शुचिः, प्रकाश। अग्नेः= "तदेवाग्निस्तदादित्यः" आदि (यजु० ३२।१)।]

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Light Spiritual

    Meaning

    Aja, the unborn human soul, rose into the state of being by the will and passion of Agni, light eternal beyond the state of Being and Becoming. As it arose, it first saw the Janita, light eternal, the generator that brought it into being. By the same divine presence and will the divinities of nature and sagely nobilities of humanity first attained to their divine character. Men of pure mind and spirit too rise to their heights of possibility by the same light of divinity.

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    Subject

    Agnih - Ayyam

    Translation

    The unborn was born out of the glow of the adorable Lord. He saw his begetter in the very beginning. In the beginning the enlightened ones attain enlightenment with his help; with his help the wise ones ascend to the heights

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    Translation

    The eternal soul assumes body from the effulgent heat of self-refulgent God. He sees and realizes first his creator. Through that realization the enlightened persons attain the divine power and verily through that the men of mature understanding mount the state of height.

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    Translation

    Verily, the unborn soul, receives knowledge from the light of God. It beholds the Primordial God. Through His grace the learned at first attain to spirituality. Through His grace the pure souls attain to exalted positions.

    Footnote

    See Yajur, 13-51,अज means the soul that is unborn and not the goat as translated by Griffith.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    १−(अजः) न जायते यः। नञ्+जन-ड। यद्वा, अज गतिक्षेपणयोः, अच्। अजन्मा। गतिशीलः। जीवात्मा-इति शब्दस्तोममहानिधिः (हि) निश्चयेन (अग्नेः) अगि गतौ-नि। सर्वव्यापकात् परमेश्वरात् (अजनिष्ट) प्रादुरभूत् (शोकात्) शुच शौचे, शोके च-घञ्। दीप्यमानात्-इति महीधरः य० १३।५१। (सः) अजः। जीवात्मा (अपश्यत्) दृष्टवान् (जनितारम्) जनयितारं स्वोत्पादकं प्रजापतिम् अग्निम् (अग्रे) सृष्टेः प्राग् वर्तमानम् (तेन) जनयितृज्ञानेन (देवाः) विद्वांसः। महात्मानः (देवताम्) तस्य भावस्त्वतलौ-पा० ६।१।१५९। इति तल्। देवभावम्। दिव्यगुणताम् (अग्रे) अस्मत्पूर्वकाले वर्त्तमानाः (आयन्) इण् गतौ-लङ्। प्राप्नुवन् (रोहान्) रुह-घञ्। आ रोहणीयान् सुखलोकान् (रुरुहुः) आरूढवन्तः (मेध्यासः) उगवादिभ्यो यत्। पा० ५।१।२। इति मेधा-यत्। असुगागमः। मेधायै हिताः। मेध्याः। मेधाविनः। पवित्राः पुरुषाः ॥

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