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अथर्ववेद के काण्ड - 5 के सूक्त 14 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 14/ मन्त्र 4
    ऋषिः - शुक्रः देवता - कृत्यापरिहरणम् छन्दः - अनुष्टुप् सूक्तम् - कृत्यापरिहरण सूक्त
    61

    पुनः॑ कृ॒त्यां कृ॑त्या॒कृते॑ हस्त॒गृह्य॒ परा॑ णय। स॑म॒क्षम॑स्मा॒ आ धे॑हि॒ यथा॑ कृत्या॒कृतं॒ हन॑त् ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    पुन॑: । कृ॒त्याम् । कृ॒त्या॒ऽकृते॑ । ह॒स्त॒ऽगृह्य॑ । परा॑ । न॒य॒ । स॒म्ऽअ॒क्षम् । अ॒स्मै॒ । आ । धे॒हि॒ । यथा॑ । कृ॒त्या॒ऽकृत॑म् । हन॑त् ॥१४.४॥


    स्वर रहित मन्त्र

    पुनः कृत्यां कृत्याकृते हस्तगृह्य परा णय। समक्षमस्मा आ धेहि यथा कृत्याकृतं हनत् ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    पुन: । कृत्याम् । कृत्याऽकृते । हस्तऽगृह्य । परा । नय । सम्ऽअक्षम् । अस्मै । आ । धेहि । यथा । कृत्याऽकृतम् । हनत् ॥१४.४॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 5; सूक्त » 14; मन्त्र » 4
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    शत्रु के विनाश का उपदेश।

    पदार्थ

    (कृत्याम्) हिंसा को (कृत्याकृते) हिंसाकारी के लिये (हस्तगृह्य) हाथ में लेकर (पुनः) अवश्य (परा नय) दूर लेजा। (अस्मै) इस पुरुष के लिये (समक्षम्) सामने (आ धेहि) रख दे, (यथा) जिससे [वह पुरुष] (कृत्याकृतम्) हिंसाकारी को (हनत्) मारे ॥४॥

    भावार्थ

    मनुष्य हिंसा आदि कर्मों को इस प्रकार त्याग दे, जैसे उपद्रवी को हाथ पकड़ कर निकाल देते हैं ॥४॥

    टिप्पणी

    ४−(पुनः) अवधारणे (कृत्याम्) हिंसाम् (कृत्याकृते) हिंसाकारिणे (हस्तगृह्य) नित्यं हस्ते पाणावुपयमने। पा० १।४।७७। इति हस्तस्य गतित्वे सति ल्यप्। हस्ते गृहीत्वा (परा) दूरे (नय) प्रेरय (समक्षम्) अव्ययीभावे शरत्प्रभृतिभ्यः। पा० ५।४।१०७। इति सम्+अक्षि−टच्। अक्ष्णोः समीपे। सन्मुखे (अस्मै) पुरुषाय (आ धेहि) स्थापय (यथा) यस्मात् (कृत्याकृतम्) हिंसाकारिणम् (हनत्) हन्यात् ॥

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    विषय

    कृत्याकृत् को उचित दण्ड

    पदार्थ

    १. (कृत्याम्) = कृत्या को-छेदन-भेदन के प्रयोग को (हस्तगृह्य) = हाथ में ग्रहण करके, अर्थात् कृत्या का प्रयोग करनेवाले को प्रयोग के समय ही पकड़कर [having caught him red-handed] (कृत्याकृते) = इस कृत्या को करनेवाले के लिए (पुनः परा नय) = फिर वापस करा। २. इस कृत्या को (अस्मै समक्षम् आधेहि) = इसके सामने स्थापित करनेवाला हो, (यथा) = जिससे यह कृत्या (कृत्याकृतं हनत) = उस कृत्या करनेवाले को ही विनष्ट करे। ऐसा किया जाए कि कृत्या के दुष्परिणामों को देखकर वह कृत्याकारी आगे से उस पाप को न करने का निश्चय करे।

    भावार्थ

    छेदन-भेदन करनेवाने को अपराध करते समय ही पकड़कर इसप्रकार व्यवहत किया जाए कि वे इन प्रयोगों के दुष्परिणामों को देखकर इन्हें फिर से न करने का निश्चय करे।

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    भाषार्थ

    (पुनः) तदनन्तर (कृत्याम् ) काटे छाल-खण्ड१ को [हे दूत !] (हस्त-गृह्य) तू निज हाथ में लेकर (पराणय) परकीय राजा की ओर ले जा। और (अस्मै) इस राजा के लिए, इसके (समक्षम्) आँखों के सामने (आ धेहि) स्थापित कर दे, (यथा) ताकि यह छाल-खण्ड (कृत्याकृतम्) हिंस्र-सेना के संग्रह करनेवाले राजा को, उसके (हनत्) हनन की सुचना दे दे।

    टिप्पणी

    [मन्त्र ३ के अनुसार, शत्रु राजा को छाल-खण्डरूपी निष्क के पहनने का कथन हुआ है। परन्तु इस छालखण्ड को शत्रु राजा तक पहुँचाया कैसे जाए ? छालखण्ड दूत द्वारा ही पहुंचाया जा सकता है। वैदिक राजनीति के अनुसार दूत अवध्य है, अत: निरापद् है । छालखण्ड राजा का हनन नहीं करेगा, अपितु यह उसके भावी हनन का सूचकमात्र ही है।] [१. छालखण्ड है भावी युद्ध का सूचक, जिस कि कुत्या द्वारा निर्दिष्ट किया है ।]

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    विषय

    दुष्टों के विनाश के उपाय।

    भावार्थ

    (कृत्या-कृते) पर-प्राणघाती उपाय करने वाले की (कृत्यां) कृत्या, साजिश को (पुनः) बार बार (हस्त-गृह्य) हाथों से पकड़ २ कर अर्थात् उन साजिश करने वालों को अपराध करते पकड़ कर (परा नय) उनको समाज से (पृथक) बन्दी-घर या दूर स्थान पर रख और (अस्मै) उसके (समक्षम्) आंखों के आगे (आ-धेहि) यह साफ तौर पर ला दिखा कि (यथा) किस प्रकार से (कृत्या-कृतं) साजिश करने वाले पर प्राणद्वेषियों को (हनत्) मारा जाता है।

    टिप्पणी

    अपराधियों को (रेड् हैण्ड) सापराध पकड़े और अलग करके उनको वे भय दर्शाये जो साजिशकारियों को दिये जाते हैं।

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    शुक्र ऋषिः। वनस्पतिर्देवता। कृत्याप्रतिहरणं सूक्तम्। १, २, ४, ६, ७, ९ अनुष्टुभः। ३, ५, १२ भुरित्रः। ८ त्रिपदा विराट्। १० निचृद् बृहती। ११ त्रिपदा साम्नी त्रिष्टुप्। १३ स्वराट्। त्रयोदशर्चं सूक्तम्॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Krtyapratiharanam

    Meaning

    And also, having caught up the evil deed in hand, send it back in this way: Put it right in front of him so that he face it himself and it may, by itself, destroy him.

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    Translation

    Taking the fatal contrivance by hand, may you send it back to him, who had made it.May you put it just before him, so that it kills maker of the fatal contrivance.

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    Translation

    Let this plan certainly lead back the bad effect of the trouble caused by artifician means to the person doing such things in the manner as a man removes away something with his hand. Let it make as distinct as it lies before the man, so that he may kill him who is the planner of such violent act.

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    Translation

    O King, catch hold again and again red-handed, of a violent person, committing mischief and put him in solitary confinement. Tell him clearly in his face, how mischief-mongers, who take the life of others are liable to be given capital punishment!

    Footnote

    A king should strike terror in the heart of a miscreant by threatening him to be put to death, if he does not give up his violence.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    ४−(पुनः) अवधारणे (कृत्याम्) हिंसाम् (कृत्याकृते) हिंसाकारिणे (हस्तगृह्य) नित्यं हस्ते पाणावुपयमने। पा० १।४।७७। इति हस्तस्य गतित्वे सति ल्यप्। हस्ते गृहीत्वा (परा) दूरे (नय) प्रेरय (समक्षम्) अव्ययीभावे शरत्प्रभृतिभ्यः। पा० ५।४।१०७। इति सम्+अक्षि−टच्। अक्ष्णोः समीपे। सन्मुखे (अस्मै) पुरुषाय (आ धेहि) स्थापय (यथा) यस्मात् (कृत्याकृतम्) हिंसाकारिणम् (हनत्) हन्यात् ॥

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