अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 123/ मन्त्र 5
ऋषिः - भृगु
देवता - विश्वे देवाः
छन्दः - त्रिष्टुप्
सूक्तम् - सौमनस्य सूक्त
77
नाके॑ राज॒न्प्रति॑ तिष्ठ॒ तत्रै॒तत्प्रति॑ तिष्ठतु। वि॒द्धि पू॒र्तस्य॑ नो राज॒न्त्स दे॑व सु॒मना॑ भव ॥
स्वर सहित पद पाठनाके॑ । रा॒ज॒न् । प्रति॑ । ति॒ष्ठ॒ । तत्र॑ । ए॒तत् । प्रति॑ । ति॒ष्ठ॒तु॒ । वि॒ध्दि । पू॒र्तस्य॑ । न॒: । रा॒ज॒न् । स: । दे॒व॒ । सु॒ऽमना॑: । भ॒व॒ ॥१२३.५॥
स्वर रहित मन्त्र
नाके राजन्प्रति तिष्ठ तत्रैतत्प्रति तिष्ठतु। विद्धि पूर्तस्य नो राजन्त्स देव सुमना भव ॥
स्वर रहित पद पाठनाके । राजन् । प्रति । तिष्ठ । तत्र । एतत् । प्रति । तिष्ठतु । विध्दि । पूर्तस्य । न: । राजन् । स: । देव । सुऽमना: । भव ॥१२३.५॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
विद्वानों से सत्सङ्ग का उपदेश।
पदार्थ
(राजन्) हे समर्थ मनुष्य ! (नाके) सुखस्वरूप परमात्मा में (प्रति तिष्ठ) प्रतिष्ठा पा, (तत्र) उसी [परमात्मा] में ही (एतत्) यह [तेरा पुण्य कर्म] (प्रति तिष्ठतु) प्रतिष्ठा पावे। (राजन्) हे विद्या से प्रकाशमान ! (नः) हमारे लिये (पूर्तस्य) अन्न दान आदि पुण्य कर्म का (विद्धि) ज्ञान कर, (सः) वह तू, (देव) हे गतिशील ! (सुमनाः) प्रसन्नचित्त (भव) हो ॥५॥
भावार्थ
मनुष्य अपने सब शुभ कर्मों को परमात्मा में समर्पण करके पुण्य कर्म करता हुआ सदा प्रसन्न रहे ॥५॥
टिप्पणी
५−(नाके) दुःखरहिते सुखस्वरूपे परमात्मनि (राजन्) हे समर्थ जीव (प्रति तिष्ठ) प्रतिष्ठया स्थितो भव (तत्र) तस्मिन् परमात्मनि (एतत्) पूर्तम्। पुण्यकर्म (प्रति तिष्ठतु) प्रतिष्ठया स्थितं भवतु (विद्धि) ज्ञानं कुरु (पूर्तस्य) अ० २।१२।४। अन्नप्रदानादिपुण्यकर्मणः (नः) अस्मभ्यम् (राजन्) (सः) स त्वम् (देव) उद्योगिन् (सुमनाः) प्रसन्नचित्तः (भव) ॥
विषय
नाके
पदार्थ
१.हे (राजन) = यज्ञादि उत्तम कर्मों से दीस जीवनवाले साधक! (नाके प्रतितिष्ठ) = तू सुखमय लोक में प्रतिष्ठित हो। (तत्र) = वहाँ-सुखमय लोक में (एतत्) = तेरा यह यज्ञरूप श्रेष्ठ कर्म भी (प्रतितिष्ठतु)= प्रतिष्ठित हो। २. प्रभु जीव से कहते हैं कि हे (राजन्) = दीप्त जीवनवाले साधक! (नः पूर्तस्य विद्धि) = हमसे वेद द्वारा उपदिष्ट प्रजा के पालन व पूरणात्मक कर्मों को तू जान-तू पूर्तकर्मों को करनेवाला बन । हे (देव) = दिव्य गुणयुक्त प्रकाशमय जीवनवाले साधक! (सः) = वह तू (सुमना भव) = प्रशस्त मनवाला हो।
भावार्थ
यज्ञादि उत्तम कर्मों से सुखमय जीवनवाले बनकर हम इन यज्ञादि कर्मों में और अधिक प्रवृत्त हों। प्रभु से उपदिष्ट इष्ट व पूर्त कर्मों को करनेवाले बनें। सदा प्रसन्न व प्रशस्त मनवाले बनें।
विशेष
इन यज्ञादि कर्मों में स्थिरता से चलनेवाला 'अथर्वा' अगले तीन सूक्तों का ऋषि -
भाषार्थ
(राजन्) हे परिवार के शासक ! (नाके) मोक्षसाधन में (प्रतितिष्ठ) तू दृढ़तापूर्वक स्थित हो जा, (तत्र) उस मोक्षसाधन में (एतत्) यह [मन्त्र ४ में कथित कर्मकलाप भी] (प्रतितिष्ठतु) स्थिर रहे। (राजन्) हे शासक ! (नः) हमारे (पूर्तस्य) पूर्तकर्म को भी (विद्धि) जानता रह, (देव) हे पितृदेव ! (सः) वह तू (सुमना:) प्रसन्नचित्त (भव) हो।
टिप्पणी
[मोक्षाभिलाषी अभी तक घर में ही है। उसे पारिवारिकजन आश्वासन दे रहे हैं, ताकि मोक्षसाधन में वह प्रसन्नचित्त रहे, और इसकी भी उसे सूचना मिलती रहे कि परिवार में पूर्तकम यथावत् हो रहा है। पूर्तस्य= कर्मणि षष्ठी। पूर्त= वापीकूपतटाकनिर्माणादि पूर्तम् (सायण)। ये कर्म सामाजिक सेवारूप हैं।]
विषय
मुक्ति की साधना
भावार्थ
हे राजन् ! हे परमेश्वर ! (नाके) हमारे दुःखों के नाश करने में (प्रति तिष्ठ) तू प्रतिष्ठा को प्राप्त हो, (तत्र) दुःखों के नाश करने के निमित्त यह हमारा किया सब कार्य (प्रति तिष्ठतु) प्रतिष्ठा को प्राप्त हो। हे राजन् ! परमात्मन् ! देव ! ईश्वर ! (नः) हमारे (पूर्तस्य) आत्मा को पूर्ण बनाने की साधना को (विद्धि) तू जान और (सः) वह तू हमारे प्रति (सुमनाः भव) शुभ संकल्पवान् हो।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
भृगुर्ऋषिः। विश्वेदेवा देवताः। १-२ त्रिष्टुभौ, ३ द्विपदा साम्नी अनुष्टुप्, ४ एकावसाना द्विपदा प्राजापत्या भुरिगनुष्टुप्। पञ्चर्चं सूक्तम्॥
इंग्लिश (4)
Subject
HeavenlyJoy
Meaning
O brilliant soul, abide in the heaven of joy. There may this yajna of yours too abide. O Lord self-refulgent, pray accept and acknowledge our acts of Dharmic duty. Enlighten us and be kind and gracious to us.
Translation
Stay in the sorrowless world, O king: may this (sacrifice also) stay there. May you know of the offerings we have given, O king. O Lord, as such may you be friendly towards us.
Translation
O man of intellectual effulgence! take you your stand in Divinity and make your place in Him. Give me the knowledge of doing pious action and O men of brilliant wisdom! let that you enjoy the tranquility of mind.
Translation
O strong soul reside in God, free from grief. Dedicate this noble act of thine to Him. O Glorious God, know Thou the means for the edification of our soul. Be Gracious unto us!
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
५−(नाके) दुःखरहिते सुखस्वरूपे परमात्मनि (राजन्) हे समर्थ जीव (प्रति तिष्ठ) प्रतिष्ठया स्थितो भव (तत्र) तस्मिन् परमात्मनि (एतत्) पूर्तम्। पुण्यकर्म (प्रति तिष्ठतु) प्रतिष्ठया स्थितं भवतु (विद्धि) ज्ञानं कुरु (पूर्तस्य) अ० २।१२।४। अन्नप्रदानादिपुण्यकर्मणः (नः) अस्मभ्यम् (राजन्) (सः) स त्वम् (देव) उद्योगिन् (सुमनाः) प्रसन्नचित्तः (भव) ॥
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