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अथर्ववेद के काण्ड - 6 के सूक्त 124 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 124/ मन्त्र 1
    ऋषिः - अथर्वा देवता - दिव्या आपः छन्दः - त्रिष्टुप् सूक्तम् - निर्ऋत्यपस्तरण सूक्त
    72

    दि॒वो नु मां बृ॑ह॒तो अ॒न्तरि॑क्षाद॒पां स्तो॒को अ॒भ्यपप्त॒द्रसे॑न। समि॑न्द्रि॒येण॒ पय॑सा॒हम॑ग्ने॒ छन्दो॑भिर्य॒ज्ञैः सु॒कृतां॑ कृ॒तेन॑ ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    दि॒व: । नु । माम् । बृ॒ह॒त: । अ॒न्तरि॑क्षात् । अ॒पाम् । स्तो॒क: । अ॒भि । अ॒प॒प्त॒त् । रसे॑न । सम् । इ॒न्द्रि॒येण॑ । पय॑सा । अ॒हम् । अ॒ग्ने॒ । छन्द॑:ऽभि: । य॒ज्ञै: । सु॒ऽकृता॑म् । कृ॒तेन॑ ॥१२४.१॥


    स्वर रहित मन्त्र

    दिवो नु मां बृहतो अन्तरिक्षादपां स्तोको अभ्यपप्तद्रसेन। समिन्द्रियेण पयसाहमग्ने छन्दोभिर्यज्ञैः सुकृतां कृतेन ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    दिव: । नु । माम् । बृहत: । अन्तरिक्षात् । अपाम् । स्तोक: । अभि । अपप्तत् । रसेन । सम् । इन्द्रियेण । पयसा । अहम् । अग्ने । छन्द:ऽभि: । यज्ञै: । सुऽकृताम् । कृतेन ॥१२४.१॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 6; सूक्त » 124; मन्त्र » 1
    Acknowledgment

    हिन्दी (3)

    विषय

    आत्मा की शुद्धि का उपदेश।

    पदार्थ

    (दिवः) प्रकाशमान सूर्य से, (नु) अथवा (बृहतः) [सूर्य से] बड़े (अन्तरिक्षात्) आकाश से (अपाम्) जल का (स्तोकः) बिन्दु (माम् अभि) मेर ऊपर (रसेन) रस के साथ (अपप्तत्) गिरा है। (सुकृताम्) सुकर्मियों के (कृतेन) कर्म से, (अग्ने) हे सर्वव्यापी परमेश्वर ! (इन्द्रियेण) इन्द्रपन अर्थात् सम्पूर्ण ऐश्वर्य के साथ, (पयसा) अन्न के साथ (छन्दोभिः) आनन्ददायक कर्मों के साथ (यज्ञैः) विद्या आदि दानों के साथ (अहम्) मैं (सम्=संगच्छेय) मिला रहूँ ॥१॥

    भावार्थ

    जैसे जल सूर्य द्वारा खिंच कर मेघमण्डल से बरस कर संसार को पुष्ट करता है, वैसे ही धर्म्मात्माओं से उत्तम गुण ग्रहण करके मनुष्य अपना ऐश्वर्य बढ़ावें ॥१॥

    टिप्पणी

    १−(दिवः) प्रकाशमानात् सूर्यात् (नु) अथवा (माम्) प्राणिनम् (अभि) अभिलक्ष्य (बृहतः) विशालात् (अन्तरिक्षात्) आकाशात् (अपाम्) जलानाम् (स्तोकः) अ० ४।३८।६। बिन्दुः (अपप्तत्) अ० ५।३०।९। पतितोऽभूत् (रसेन) सारेण (सम्) क्रियाग्रहणम्। संगच्छेय (इन्द्रियेण) इन्द्रियमिन्द्रलिङ्गमिन्द्रदृष्ट०। पा० ५।२।९३। इन्द्रस्य आत्मनो लिङ्गम्। ऐश्वर्यम्। धनम्−निघ० २।१०। (पयसा) अन्नेन−निघ० २।७। (अहम्) मनुष्यः (अग्ने) हे सर्वव्यापक परमेश्वर (छन्दोभिः) अ० ४।३४।१। आह्लादनैः (यज्ञैः) विद्यादिदानैः सह (सुकृताम्) पुण्यकर्मिणाम् (कृतेन) कर्मणा ॥

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    विषय

    अपां स्तोकः

    पदार्थ

    १. साधक अपनी अनुभूति व्यक्त करते हुए कहता है कि (नु) = अब (माम्) = मुझे (दिव:) = उस प्रकाशमय (बृहत:) = महान् (अन्तरिक्षात्) = [अन्तराक्षि] सबके अन्दर निवास करनेवाले अन्तर्यामी प्रभु से (अपां स्तोकः) = ज्ञान-जल का लव [थोड़ा-सा] रसेन आनन्द के साथ (अभ्यपसत्) = प्राप्त हुआ है। जब मनुष्य 'अथ अाइ अन्तर्दृष्टिवाला बनता है तब उसे प्रकाशमय प्रभु से ज्ञान का अंश व रस [आनन्द] प्राप्त होता है। २. हे (अग्ने) = प्रभो! (अहम्) = आपका प्रिय अथर्वा मैं आपकी कृपा से (इन्द्रियेण) = वीर्य से, (पयसा) = अङ्ग-प्रत्यङ्ग की शक्ति से-आप्यायन से (छन्दोभिः) = वेदवाणियों से (यज्ञैः) = यज्ञों से तथा (सुक्रतां कृतेन) = पुण्यशील लोगों के पुण्य कर्मों से (सम्) = सङ्गत हो।

    भावार्थ

    हम अथर्वा बनकर अन्तर्दृष्टि बनें, जिससे प्रभु के ज्ञान-जल के लव व रस को प्राप्त कर सकें। हम बीर्य, शक्ति के आप्यायन, वेदज्ञान, यज्ञ व पुण्य कर्मों से सङ्गत हों।

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    भाषार्थ

    (दिव:) द्युलोक से, (बृहतः अन्तरिक्षात्) बड़े अन्तरिक्ष से (अपाम्) जल का (स्तोकः) स्वल्पांश भी (नु) शीघ्र (माम् अभि) मेरे प्रति (रसेन) रस के साथ (अपप्तत्) यदि वर्षारूप में गिरा है, तो (अहम्) मैं (इन्द्रियेण) धन से, (पयसा) दूध से, (छन्दोभिः) वैदिक छन्दों से, (यज्ञैः) यज्ञों से (सुकृताम्, कृतेन) सुकर्मियों के कर्म से अथवा उत्तम कर्मों के करने से (अग्ने) हे परमेश्वर ! (सम्) सम्बद्ध हो जाऊं।

    टिप्पणी

    [सुक्त १२३ के मन्त्र ५ से, "राजन्" का सम्बन्ध, सूक्त १२४ में समझना चाहिये। राष्ट्र में वर्षा न होने के कारण प्रजा दुःखी है। इसलिये राजा वर्षा जल के स्वल्पांश का भी अभिलाषी है। वर्षा जल द्वारा वृक्षों वनस्पतियों में नानाविध रसों का संचार होता है, और धनसम्पत्ति बढ़ती खाद्य-पेय प्राप्त होते, वेदाध्ययन तथा यज्ञादि सुकर्मों का सम्पादन होता है। यजुर्वेदानुसार "राजा" अपने शरीर तथा शरीराङ्गों के सदृश राष्ट्र और प्रजा को जानकर शासन करता है। यथा "पृष्ठीर्मे राष्ट्रमुदरम् सौ ग्रीवाश्च श्रोणी। उरुऽअरत्नी जानुनी विशो मेऽङ्गानि सर्वतः” (२०।८)। इसलिये राजा मन्त्र में राष्ट्र और प्रजा का निर्देश "मे" करता है। इन्द्रियेण= इन्द्रियम् धननाम (निघं० २।१०)। दिवः अन्तरिक्ष तू= द्युलोकस्थ सूर्य के ताप द्वारा भौमजल वाष्पीभूत होकर अन्तरिक्ष में जाता, और अन्तरिक्ष से वर्षारूप में भूमि पर आकर नानाविध रसों अदि के रूप में प्रकट होता और सुकर्मों के कराने में हेतु होता है। नु= क्षिप्रम् (निरुक्त ११।४,५०, रोदसी पद (३६)]

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Divine Rain

    Meaning

    From the heaven of light and boundless skies, an oceanic drop of rain has fallen, over flowing with divine ecstasy. O Agni, lord of light, with my honour and excellence, nectar sweet of taste and prosperity, with songs of joy, yajna and best of holy actions I celebrate the shower on me.

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    Subject

    Divyah Apah

    Translation

    From the vast sky, or from the midspace; a drop of water with pleasure fall upon me. O adorable Lord, may I be united with power of my sense-organs, with milk, with praises, with sacrifices and with the fruit of pious deeds.

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    Translation

    This drop of waters with dew falls on me from the heavenly region or the spacious firmament. O Self-refulgent God, may I unite myself with the power of soul, with action, with meters of Vedic speeches, with performances of yajnas and with the deed of the men of good action and wisdom.

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    Translation

    Just as from the high firmament, Yea, out of heaven, a water drop with dew falls on the earth, and lends life, vigor and joy to mankind, so does the drop of knowledge and action full of joy fall on me from the Refulgent, Almighty God, Thereby, I, am emancipated soul, O God, am equipped with soul-force, knowledge, Vedic verses, noble deeds, and the fruit of virtuous deeds!

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    १−(दिवः) प्रकाशमानात् सूर्यात् (नु) अथवा (माम्) प्राणिनम् (अभि) अभिलक्ष्य (बृहतः) विशालात् (अन्तरिक्षात्) आकाशात् (अपाम्) जलानाम् (स्तोकः) अ० ४।३८।६। बिन्दुः (अपप्तत्) अ० ५।३०।९। पतितोऽभूत् (रसेन) सारेण (सम्) क्रियाग्रहणम्। संगच्छेय (इन्द्रियेण) इन्द्रियमिन्द्रलिङ्गमिन्द्रदृष्ट०। पा० ५।२।९३। इन्द्रस्य आत्मनो लिङ्गम्। ऐश्वर्यम्। धनम्−निघ० २।१०। (पयसा) अन्नेन−निघ० २।७। (अहम्) मनुष्यः (अग्ने) हे सर्वव्यापक परमेश्वर (छन्दोभिः) अ० ४।३४।१। आह्लादनैः (यज्ञैः) विद्यादिदानैः सह (सुकृताम्) पुण्यकर्मिणाम् (कृतेन) कर्मणा ॥

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