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अथर्ववेद के काण्ड - 6 के सूक्त 141 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 141/ मन्त्र 3
    ऋषिः - विश्वामित्र देवता - अश्विनौ छन्दः - अनुष्टुप् सूक्तम् - गोकर्णलक्ष्यकरण सूक्त
    33

    यथा॑ च॒क्रुर्दे॑वासु॒रा यथा॑ मनु॒ष्या उ॒त। ए॒वा स॑हस्रपो॒षाय॑ कृणु॒तं लक्ष्मा॑श्विना ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    यथा॑ । च॒क्रु॒: । दे॒व॒ऽअ॒सु॒रा: । यथा॑ । म॒नु॒ष्या᳡: । उ॒त । ए॒व । स॒ह॒स्र॒ऽपो॒षाय॑ । कृ॒णु॒तम् । लक्ष्म॑ । अ॒श्वि॒ना॒ ॥१४१.३॥


    स्वर रहित मन्त्र

    यथा चक्रुर्देवासुरा यथा मनुष्या उत। एवा सहस्रपोषाय कृणुतं लक्ष्माश्विना ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    यथा । चक्रु: । देवऽअसुरा: । यथा । मनुष्या: । उत । एव । सहस्रऽपोषाय । कृणुतम् । लक्ष्म । अश्विना ॥१४१.३॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 6; सूक्त » 141; मन्त्र » 3
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    वृद्धि करने का उपदेश।

    पदार्थ

    (यथा) जैसे (देवासुराः) व्यवहार जाननेवाले बुद्धिमानों ने (उत) और (यथा) जैसे (मनुष्याः) मननशील पुरुषों ने [शुभलक्षण को] (चक्रुः) किया है। (अश्विना) हे कर्तव्यों में व्यापक माता-पिता ! (एव) वैसे ही (सहस्रपोषाय) सहस्रों प्रकार के पोषण के लिये [हम में] (लक्ष्म) शुभलक्षण (कृणुतम्) तुम करो ॥३॥

    भावार्थ

    माता-पिता को योग्य है कि पूर्वज महात्माओं के समान अपने सन्तानों को शुभगुणी बनावे ॥३॥

    टिप्पणी

    ३−(यथा) येन प्रकारेण (चक्रुः) कृतवन्तः (देवासुराः) असुरत्वं प्रज्ञावत्त्वम्−निरु० १।३४। व्यवहारिणः प्रज्ञावन्तः (यथा) (मनुष्याः) अ० ३।४।६। मननशीलाः (उत) अपि च (एव) एवम् (सहस्रपोषाय) अपरिमितवृद्धये (कृणुतम्) कुरुतम् (लक्ष्म)−म० २। शुभलक्षणम् (अश्विना) कर्तव्यव्यापकौ मातापितरौ ॥

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    विषय

    देव-असुर-मनुष्य

    पदार्थ

    १. सामान्य मनुष्य यदि मनुष्य' शब्द वाच्य हैं, तो उत्तम मनुष्य 'देव' तथा अधम 'असुर' कहलाते हैं। ये क्रमश: राजस, सात्त्विक व तामस होते हुए भी गौओं को रखते हैं और अपने गोवत्सों के कानों पर स्त्री-पुंसात्मक चिह्नों को करते हैं। (यथा) = जैसे (देवासुरा:) = देव व असुर (चक्रुः) = करते हैं, (उत्) = और (यथा) = जैसे (मनुष्या:) = सामान्य मनुष्य भी करते हैं, (एव) = उसी प्रकार (अश्विना) = गृहस्थ दम्पती (लक्ष्म कृणुतम्) = गोवत्सों के कर्णों पर चिहों को करें, जिससे (सहस्त्रपोषाय) = सहस्रों की संख्या में उनका पोषण हो।

    भावार्थ

    हम 'सात्त्विक, राजस् व तामस्' इनमें से किसी भी श्रेणी में हों, गौओं को रक्खें। उनके वत्सों के कर्णों पर लक्ष्म [चिह्न] बनाएँ, जिससे उनका सहस्रशः पोषण होता रहे।

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    भाषार्थ

    (यथा) जिस प्रकार (देवासुराः) देव अर्थात् ब्राह्मण तथा असुर= क्षत्रिय और वैश्य (उत) तथा (मनुष्याः) शेष मनुष्य अर्थात् शुद्र (च) कर्णवेध करते रहे हैं (एवा= एवम्) इसी प्रकार (सहस्रपोषाय) कर्णवेध द्वारा हजारों प्रजाजनों की पुष्टि के लिये (अश्विना= अश्विनौ) हे देवों के दो भिषजौ !, दो चिकित्सकों! तुम (लक्ष्म) कर्णवेध चिह्न (कृणुतम्) करो [निज निरीक्षण में]।

    टिप्पणी

    [देव पद ब्राह्मणों को सूचित करता है। ब्राह्मणों को "भूदेवाः" तथा "भूसुराः" कहते हैं, अर्थात् पृथिवी के देव। असुराः के दो अर्थ हैं, (१) असु अर्थात् प्राण अर्थात् वल वाले क्षत्रिय तथा, (२) वसु अर्थात् धन वाले वैश्य। यथा "असुरिति प्राणनाम, अस्तः शरीरे भवति, तेन तद्वन्तः असुराः" (निरुक्त ३।२।८) क्षत्रिय। असुराः=वसुराः, धनवन्तः, वैश्याः। असुरत्वम्= वादिलुप्तम्; आादि "व" का लोप (निरुक्त १०।३।३४); "त्वष्टा" पद की व्याख्या में। जब वेदानुयायी चारों वर्ण कर्णवेध संस्कार करते हैं, और कर्णवेध द्वारा नानाविध रोगों के निवर्तन द्वारा शरीर पुष्टि सम्भव है, तब "सहस्रपोषाय" पद सार्थक ही है।]

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    विषय

    माता पिता का सन्तान के प्रति कर्तव्य। नामकरण और कर्णवेध का उपदेश।

    भावार्थ

    (यथा) जिस प्रकार (देवाः) विद्वान् ज्ञानी पुरुष और (यथा असुराः) जिस प्रकार बलवान् पुरुष और (उत मनुष्याः) जिस प्रकार मननशील पुरुष (चक्रुः) करते हैं, हे (अश्विनौ) माता पिताओ ! (सहस्रपोपाय) तुम भी सहस्रों प्रकार की पुष्टि के लिये सन्तति का (लक्ष्म) चिह्न उत्तम नाम (कृणुतम्) करो।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    विश्वामित्र ऋषिः। अश्विनौ देवते। अनुष्टुभः। तृचं सूक्तम्॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Growth and Development

    Meaning

    As lived and acted the Devas, men of divine nature, as lived and acted the Asuras, men of pure natural character, and as lived and acted men of intelligent human nature, so do you, O Ashvins, all men and women, mark and act for yourselves for growth a thousand ways.

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    Translation

    Such marks, as the enlightened ones and the life-savers have been making, and as the men also make, so, O twins divine, may you make the mark, so that these may multiply into thousands,

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    Translation

    Let father and mother give good name to their children for invigorating their thousands of activities just as the learned men, strong men and ordinary persons do.

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    Translation

    Just as learned, strong, thoughtful persons have worked for our development, so should ye, O parents imbue us with noble quality for multifarious progress!

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    ३−(यथा) येन प्रकारेण (चक्रुः) कृतवन्तः (देवासुराः) असुरत्वं प्रज्ञावत्त्वम्−निरु० १।३४। व्यवहारिणः प्रज्ञावन्तः (यथा) (मनुष्याः) अ० ३।४।६। मननशीलाः (उत) अपि च (एव) एवम् (सहस्रपोषाय) अपरिमितवृद्धये (कृणुतम्) कुरुतम् (लक्ष्म)−म० २। शुभलक्षणम् (अश्विना) कर्तव्यव्यापकौ मातापितरौ ॥

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