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अथर्ववेद के काण्ड - 6 के सूक्त 56 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 56/ मन्त्र 3
    ऋषिः - शन्ताति देवता - रुद्रः छन्दः - निचृदनुष्टुप् सूक्तम् - सर्परक्षण सूक्त
    54

    सं ते॑ हन्मि द॒ता द॒तः समु॑ ते॒ हन्वा॒ हनू॑। सं ते॑ जि॒ह्वया॑ जि॒ह्वां सम्वा॒स्नाह॑ आ॒स्यम् ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    सम् । ते॒ । ह॒न्मि॒ । द॒ता । द॒त: । सम् । ऊं॒ इति॑ । ते॒ । हन्वा॑ । हनू॒ इति॑ । सम् । ते॒ । जि॒ह्वया॑ । जि॒ह्वाम् । सम् । ऊं॒ इति॑ । आ॒स्ना । अ॒हे॒ । आ॒स्य᳡म् ॥५६.३॥


    स्वर रहित मन्त्र

    सं ते हन्मि दता दतः समु ते हन्वा हनू। सं ते जिह्वया जिह्वां सम्वास्नाह आस्यम् ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    सम् । ते । हन्मि । दता । दत: । सम् । ऊं इति । ते । हन्वा । हनू इति । सम् । ते । जिह्वया । जिह्वाम् । सम् । ऊं इति । आस्ना । अहे । आस्यम् ॥५६.३॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 6; सूक्त » 56; मन्त्र » 3
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    दोष के नाश के लिये उपदेश।

    पदार्थ

    (अहे) हे सर्प ! (ते) तेरे (दता) दाँत से (दतः) दाँतों को (सम् हन्मि) मिला कर तोड़ता हूँ, (उ) और (ते) तेरे (हन्वा) जावड़े से (हनू) दोनों जाबड़ों को (सम्) म।सल कर, (ते) तेरी (जिह्वया) जीभ से (जिह्वाम्) जीभ को (सम्) मसलकर (उ) और (आस्ना) मुख से (आस्यम्) मुख को (सम्) मिला कर [तोड़ता हूँ] ॥३॥

    भावार्थ

    जैसे मनुष्य विषैले साँप को कुचल कर मार डालते हैं, उसी प्रकार से विद्वान् पुरुष अपने पापों का सर्वथा नाश करे ॥३॥

    टिप्पणी

    ३−(सम्) संयोज्य (ते) तव (हन्मि) नाशयामि (दता) पद्दन्नोमास्०। पा० ६।१।६३। इति दन्तस्य दत्। दन्तेन (दतः) हसिमृग्रिण्०। उ० ३।८६। इति दमु शमने−तन्। दन्तान् (सम्) (उ) समुच्चये (हन्वा) मुखावयवविशेषेण (हनू) हनुद्वयम् (सम्) (ते) (जिह्वया) रसनया (जिह्वाम्) रसनाम् (सम्) (उ) (आस्ना) पद्दन्नो०। इति आस्यस्य आसन्। आस्येन (अहे) म० १। हे आहननशील सर्प (आस्यम्) मुखम् ॥

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    विषय

    सर्पमुख-संहनन

    पदार्थ

    १.हे (अहे) = सर्प! (ते) = तेरे (दता) = उपरि पति दन्त से (दतः) = अध: पङ्क्ति में स्थित दौतों को (संहन्मि) = संहत-संश्लिष्ट करता हूँ (उ) = और (ते) = तेरे (हन्वा) = हनु से (हनू) = हनु को (सम्) = संहत कर देता हूँ-तेरे दोनों जबड़ों को परस्पर सटा देता हूँ। (ते) = तेरी (जिह्वया) = जिह्वा से (जिह्वाम्) = जिह्वा को (सम्) = संहत करता (हूँउ) = और (आस्ना) = तेरे मुख से (आस्यम्) = मुख को (सम्) = संहत करता हूँ-मुख के उत्तर और अधर भागों को संश्लिष्ट कर डालता हूँ।

    भावार्थ

    सर्प के मुख को सम्यक् भींचकर उसे वशीभूत कर लेना चाहिए।

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    भाषार्थ

    (ते) तेरे (दता) ऊपर के दान्तों के साथ (दत:) नीचे के दान्तों को (सं हन्मि) मैं मिला देता हूं, संहित कर देता हूं (ते) तेरे (हन्वा) ऊपर के जवाड़े के साथ (हनुः) नीचे के जबाड़े को (सम् उ) संहित कर देता हूं, मिला देता हूं, (ते) तेरी (जिह्वया) जिह्वा के साथ (जिह्वाम्) दूसरी जिह्वा को (सम्) संहित कर देता हूं, मिला देता हूँ, (अहे) हे सांप (आस्ना) तेरे मुख के साथ (आस्यम) मुख को (सम् उ) संहित कर देता हूं, मिला१ देता हूं।

    टिप्पणी

    [जिह्वया जिह्वाम् सांप की दो जिह्वाए। द्विजिह्व:= Snake (आप्टे)। "आस्येन आस्थम्" का अभिप्राय अस्पष्ट है। मन्त्रोक्ति सम्भवत: 'देवजन' की है, जो कि सर्पविष चिकित्सक है। आस्य के उत्तर भाग को नीचे के भाग के साथ संश्लिष्ट करता हूँ (सायण)]। [१. वह सांप के सिर को दृढ़ता से पकड़ लेता है, जिस से सांप न मुख खोल सके, न काट सके।]

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    विषय

    सर्प का दमन और सर्पविष चिकित्सा।

    भावार्थ

    सांप को पकड़ने का उपाय बतलाते हैं। हे सर्प ! (ते दता दतः सं हन्मि) तेरे ऊपर के दांतों को नीचे के दांतों से सटा ढूं। और (ते हन्वा हनू सम्) तेरी ठोढ़ी को ठोढ़ी से सटा दूं। (जिह्वया ते जिह्वाम् सम्) तेरी जीभ से जीभ को सटा दूं, इस प्रकार की रीति से मैं (आस्ना) मुख भाग से (आस्यम्) सांप के मुख को (सम् हन्मि) अच्छी प्रकार भीचूं और इस प्रकार सर्प को वश कर लेता हूं।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    शन्तातिर्ऋषिः। १ विश्वेदेवाः, २, ३ रुद्रो देवता। १ उष्णिग्-गर्भा पथ्या पंक्तिः। २,३ अनुष्टुप्। तृचं सूक्तम्॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Caution and Care against the Evil

    Meaning

    I break your teeth with the tooth, O snake, your jaws with the jaw, your tongue with the tongue and your mouth with the mouth.

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    Translation

    1 beat your tooth with tooth together; ‘your jaw with jaw together; your toungue with tongue together, and your mouth, 0 snake, with mouth together.

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    Translation

    I close together and destroy the fangs of serpent with fang, and I close together its jaws with jaw, I close it together its mouth with mouth and its tongue with tongue.

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    Translation

    O serpent, I crush thy teeth, striking the upper against the lower ones I break thy jaws, making the one collide with the other. I injure thy tongues, making them both hit against each other. I break thy face, making it strike against the other, and thus bring thee under my control.

    Footnote

    I: Snake charmer.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    ३−(सम्) संयोज्य (ते) तव (हन्मि) नाशयामि (दता) पद्दन्नोमास्०। पा० ६।१।६३। इति दन्तस्य दत्। दन्तेन (दतः) हसिमृग्रिण्०। उ० ३।८६। इति दमु शमने−तन्। दन्तान् (सम्) (उ) समुच्चये (हन्वा) मुखावयवविशेषेण (हनू) हनुद्वयम् (सम्) (ते) (जिह्वया) रसनया (जिह्वाम्) रसनाम् (सम्) (उ) (आस्ना) पद्दन्नो०। इति आस्यस्य आसन्। आस्येन (अहे) म० १। हे आहननशील सर्प (आस्यम्) मुखम् ॥

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