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अथर्ववेद के काण्ड - 6 के सूक्त 57 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 57/ मन्त्र 1
    ऋषिः - शन्ताति देवता - रुद्रः छन्दः - अनुष्टुप् सूक्तम् - जलचिकित्सा सूक्त
    92

    इ॒दमिद्वा उ॑ भेष॒जमि॒दं रु॒द्रस्य॑ भेष॒जम्। येनेषु॒मेक॑तेजनां श॒तश॑ल्यामप॒ब्रव॑त् ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    इ॒दम् । इत् । वै । ऊं॒ इति॑ । भे॒ष॒जम् । इ॒दम् । रु॒द्रस्य॑ । भे॒ष॒जम् । येन॑ । इषु॑म् । एक॑ऽतेजनाम् । श॒तऽश॑ल्याम् । अ॒प॒ऽब्रव॑त् ॥५७.१॥


    स्वर रहित मन्त्र

    इदमिद्वा उ भेषजमिदं रुद्रस्य भेषजम्। येनेषुमेकतेजनां शतशल्यामपब्रवत् ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    इदम् । इत् । वै । ऊं इति । भेषजम् । इदम् । रुद्रस्य । भेषजम् । येन । इषुम् । एकऽतेजनाम् । शतऽशल्याम् । अपऽब्रवत् ॥५७.१॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 6; सूक्त » 57; मन्त्र » 1
    Acknowledgment

    हिन्दी (3)

    विषय

    दोष के नाश के लिये उपदेश।

    पदार्थ

    (इदम्) यह [वेदज्ञान] (इत्) ही (वै) निश्चय करके (भेषजम्) भयनिवारक वस्तु है, (इदम्) यह (उ) ही (रुद्रस्य) दुःखनाशक परमेश्वर का (भेषजम्) औषध है। (येन) जिससे [मनुष्य] (एकतेजनाम्) देहरूप एक दण्डवाले और (शतशल्याम्) व्याधिरूप सैकड़ों अणीवाले (इषुम्) बाण को (अपब्रवत्) हटा कर बोले ॥१॥

    भावार्थ

    मनुष्य परमेश्वरदत्त वेदज्ञान से अपन पापों को नष्ट कर सुखी होवे, जैसे घाव से तीर निकलने पर सुख मिलता है ॥१॥

    टिप्पणी

    १−(इदम्) प्रत्यक्षं वेदज्ञानम् (इत्) एव (वै) निश्चयेन (उ) एव (भेषजम्) भयनाशकं वस्तु (इदम्) (रुद्रस्य) अ० २।२७।६। दुःखनाशकस्य परमेश्वरस्य (भेषजम्) औषधम् (येन) औषधेन (इषुम्) बाणम् (एकतेजनाम्) तिज निशाने पालने च−ल्यु। तेजनो वशः। एकस्तेजनः शरीररूपो वेणुकाण्डो यस्याः सा, तथाविधाम् (शतशल्याम्) व्याधिरूपाणि शतानि बहूनि शल्यानि अयोमुखानि प्रोतानि यस्यां, तादृशीम् (अपब्रवत्) अप वियोगे। वियुज्य ब्रूयात् ॥

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    विषय

    भावरोग की एकमात्र औषध

    पदार्थ

    १. (इदम् इत् वा) = यह ब्रह्मज्ञान ही (उ) = निश्चय से (भेषजम) = औषध है। (इदम) = यह (रुद्रस्य) = परमात्मा का उपदिष्ट वेदज्ञान इस भवरोग का (भेषजम्) = औषध है, (येन) = जिस ब्रह्मज्ञान [वेदज्ञान]-रूप औषध से (इषुम्) = इस जीवनरूप बाण को (अपब्रवत्) = अपने से दूर करनेवाला होता है। यह जीवनरूप बाण (एकतेजनाम्) = देहरूप एक काण्डवाला है और (शतशल्याम्) = सैकड़ों व्याधियाँ ही इसमें शल्यरूप हैं अथवा जीवन के सौ वर्ष ही इसमें शत शल्य हैं।

    भावार्थ

    प्रभु से उपदिष्ट वेदज्ञान को क्रिया में अनूदित करने पर हम मुक्त हो जाते हैं। भवरोग का औषध यह वेदज्ञान ही है।

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    भाषार्थ

    (इदम्, इत्, वै, उ) यह ही है निश्चय से (भेषजम्) औषध, (इदम्) यह है (रुद्रस्य) रुलाने वाले रोग की (भेषजम्) औषध, (येन) जिस द्वारा (एकतेजनाम्) एक-दण्ड वाले और (शतशल्याम्) सौ लोहनिर्मित दान्तों अग्रभागों वाले (इषुम् ) वाण को भी (अप ब्रवीत् ) वेद ने अपाकृत निवारित करने वाला कहा है। अर्थात् तद्वारा किये क्षत को निवारित करने वाला कहा है।

    टिप्पणी

    [औषध का कथन मन्त्र २ में हुआ है]।

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Water Treatment

    Meaning

    This is the sure cure, this is the medicine prescribed by Rudra, the physician, by which the arrow with a single shaft and the arrow with a hundred shafts is drawn out and the wound is cured.

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    Subject

    Rudrah

    Translation

    This (water) indeed is a remedy. This is the Rudra’s (terrible lord's) remedy, with which he calls off the one-shafted arrow with a hundred tips.

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    Translation

    [N.B. Here we find the description of pure water which is itself a kind of anodyne.] This is a medicine indeed, this is medicine prescribed by the physician who treats the fatal diseases, with this the arrow of one shaft and arrow of hundred shafts are drawn out.

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    Translation

    This Vedic knowledge alone is verily the dispeller of fear. This is a sovereign remedy prescribed by God. With its help a man can ward all the shaft of a hundred maladies in this single body.

    Footnote

    Men should remove their sins with the knowledge of the Vedas and become happy, as they feel comfortable by extricating the arrow from the wound.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    १−(इदम्) प्रत्यक्षं वेदज्ञानम् (इत्) एव (वै) निश्चयेन (उ) एव (भेषजम्) भयनाशकं वस्तु (इदम्) (रुद्रस्य) अ० २।२७।६। दुःखनाशकस्य परमेश्वरस्य (भेषजम्) औषधम् (येन) औषधेन (इषुम्) बाणम् (एकतेजनाम्) तिज निशाने पालने च−ल्यु। तेजनो वशः। एकस्तेजनः शरीररूपो वेणुकाण्डो यस्याः सा, तथाविधाम् (शतशल्याम्) व्याधिरूपाणि शतानि बहूनि शल्यानि अयोमुखानि प्रोतानि यस्यां, तादृशीम् (अपब्रवत्) अप वियोगे। वियुज्य ब्रूयात् ॥

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