Loading...
अथर्ववेद के काण्ड - 7 के सूक्त 115 के मन्त्र
मन्त्र चुनें
  • अथर्ववेद का मुख्य पृष्ठ
  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 115/ मन्त्र 2
    ऋषिः - अथर्वाङ्गिराः देवता - सविता, जातवेदाः छन्दः - त्रिष्टुप् सूक्तम् - पापलक्षणनाशन सूक्त
    94

    या मा॑ ल॒क्ष्मीः प॑तया॒लूरजु॑ष्टाभिच॒स्कन्द॒ वन्द॑नेव वृ॒क्षम्। अ॒न्यत्रा॒स्मत्स॑वित॒स्तामि॒तो धा॒ हिर॑ण्यहस्तो॒ वसु॑ नो॒ ररा॑णः ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    या । मा॒ । ल॒क्ष्मी: । प॒त॒या॒लू: । अजु॑ष्टा: । अ॒भि॒ऽच॒स्कन्द॑ । वन्द॑नाऽइव । वृ॒क्षम् । अ॒न्यत्र॑ । अ॒स्मत् । स॒वि॒त॒: । ताम् । इ॒त: । धा॒: । हिर॑ण्यऽहस्त: । वसु॑ । न॒: । ररा॑ण: ॥१२०.२॥


    स्वर रहित मन्त्र

    या मा लक्ष्मीः पतयालूरजुष्टाभिचस्कन्द वन्दनेव वृक्षम्। अन्यत्रास्मत्सवितस्तामितो धा हिरण्यहस्तो वसु नो रराणः ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    या । मा । लक्ष्मी: । पतयालू: । अजुष्टा: । अभिऽचस्कन्द । वन्दनाऽइव । वृक्षम् । अन्यत्र । अस्मत् । सवित: । ताम् । इत: । धा: । हिरण्यऽहस्त: । वसु । न: । रराण: ॥१२०.२॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 7; सूक्त » 115; मन्त्र » 2
    Acknowledgment

    हिन्दी (5)

    विषय

    दुर्लक्षण के नाश का उपदेश।

    पदार्थ

    (या) जो (पतयालूः) गिरानेवाला (अजुष्टा) अप्रिय (लक्ष्मीः) लक्षण (मा) मुझ पर (अभिचस्कन्द) आ चढ़ा है, (इव) जैसे (वन्दना) बेल (वृक्षम्) वृक्ष पर। (सवितः) हे ऐश्वर्यवान् [परमेश्वर !] (हिरण्यहस्तः) तेज वा सुवर्ण हाथ में रखनेवाला, (नः) हमें (वसु) धन (रराणः) देता हुआ तू (इतः) यहाँ से, (अस्मत्) हमसे (अन्यत्र) दूसरे [दुष्टों में] (ताम्) उसको (धाः) धर ॥२॥

    भावार्थ

    मनुष्य परमात्मा के अनुग्रह से अधर्मरूप दुर्लक्षणों और दुष्टों से बचकर शुभ गुण प्राप्त करें ॥२॥

    टिप्पणी

    २−(या) (मा) माम् (लक्ष्मीः) म० १। लक्षणम् (पतयालूः) स्पृहिगृहिपतिदयि०। पा० ३।२।१५८। पत गतौ, चुरादिः, अदन्तः-आलुच्। ऊङुतः। पा० ४।१।६६। ऊङ् स्त्रियाम्। पातयित्री। दुर्गतिकारिणी (अजुष्टा) अप्रिया (अभिचस्कन्द) स्कन्दिर् गतिशोषणयोः-लिट्। अभितः प्राप (वन्दना) सू० ११३ म० १ लता (इव) यथा (वृक्षम्) (अन्यत्र) अन्येषु दुष्टेषु (अस्मत्) अस्मत्तः धार्मिकेभ्यः (सवितः) हे परमैश्वर्यवन् परमात्मन् (ताम्) लक्ष्मीम्। लक्षणम् (इतः) अस्मात् स्थानात् (धाः) दध्याः (हिरण्यहस्तः) हिरण्यं तेजः सुवर्णं वा हस्ते वशे यस्य सः (वसु) धनम् (नः) अस्मभ्यम् (रराणः) अ० ५।२७।११। ददानः ॥

    इस भाष्य को एडिट करें

    विषय

    शोषण की कारणभूत पतयालू लक्ष्मी

    पदार्थ

    १. (या) = जो (पतयालू:) = नीचे गिरानेवाली, दुर्गति की कारणभूत (अजुष्टा) = अप्रिय, निन्द्य (लक्ष्मी:) = लक्ष्मी (मा अभिचस्कन्द) = मुझे अभितः व्याप्त करती है। जो मुझे इसप्रकार व्यास कर लेती है, (इव) = जैसेकि (वन्दना वृक्षम्) = एक लताविशेष वृक्ष को घेर लेती है। अथवा यह पतयालू अजुष्टा लक्ष्मी मेरा इसप्रकार शोषण कर देती है [स्कन्दिर गतिशोषणयोः] जैसेकि अमरबेल वृक्ष का। प्ररूढ़ वन्दन-तरु की शुष्कता प्रसिद्ध ही है। यह लक्ष्मी भी वृक्षरूप मेरे लिए वन्दना लता ही बन जाती है। २. हे (सवितः) = सबके प्रेरक प्रभो! (ताम्) = उस पतयालू लक्ष्मी को (अस्मत्) = हमसे (इत: अन्यत्र) = यहाँ से अन्य देश में (धाः) = स्थापित कीजिए। (हिरण्यहस्त:) = सुवर्णमय हाथोंवाले आप, सुवर्ण को हाथों में लिये हुए आप (न:) = हमारे लिए (वसु) = धन (रराण:) = देनेवाले हो। आप हमें निवास के लिए आवश्यक धन प्राप्त कराइए।

    भावार्थ

    अन्याय्य धन हमारे शोषण का कारण बनता है। प्रभु उसे हमसे दूर करते हुए, हमारे निवास के लिए आवश्यक पवित्र धनों को प्राप्त कराएँ।

    इस भाष्य को एडिट करें

    व्याख्याः शृङ्गी ऋषि कृष्ण दत्त जी महाराज

    व्याख्याः शृङ्गी ऋषि कृष्ण दत्त जी महाराज-लक्ष्मी का स्थान विष्णु के चरणों में

    मेरे प्यारे! देखो, तो बेटा! मानो देखो, शेषनाग की शैय्या पर कौन विद्यमान है वह ब्रह्माः ब्रहे वह विष्णु है वह आत्मा है। मेरे प्यारे! देखो, शेषनाग से भी जब वह विर्धो अश्वात होता है तो बेटा! देखो, लक्ष्मी चरणों में ओत प्रोत प्राप्त हो जाती है। जब मुनिवरों! देखो, वह शेषनाग को अपने नीचे दबा लेता है जो लक्ष्मी संसार को लुभाने वाली है। बेटा! देखो, यही लक्ष्मी हमें प्राप्त हो जाती है। ये चरणों की वन्दना करने लगती है। ये चरणों में ओत प्रोत हो जाती है। मेरे प्यारे! जहाँ लक्ष्मी रहती है धर्म होता है और जहाँ धर्म नहीं होता वहाँ से लक्ष्मी अपना उत्थान कर जाती है।

    तो मेरे प्यारे! मैंने बहुत पुरातन काल में एक लोकोक्ति प्रकट करते हुए तुम्हें कहा था कि एक राजा थे। मानो देखो, राजा अपने यहाँ आनन्दवत में रहते थे। मेरे प्यारे! देखो, एक समय भगवान विष्णु और लक्ष्मी दोनों का विवाद हो गया। जब दोनों का भयंकर विवाद हुआ तो विष्णु बोले कि हे लक्ष्मी! जो मेरे प्रिय भक्त होते हैं वे मानो तुम्हें नहीं जान पाते। मेरे प्यारे! लक्ष्मी बोली कि जो तुम्हारे भी प्रिय भक्त होते हैं। वहाँ मेरा वास हो जाता है। वहाँ विष्णु का कोई महत्व नहीं रह पाता।

    मेरे प्यारे! दोनों में विवाद हुआ तो लक्ष्मी बोली कि महाराज! परीक्षा हो जाएं। तो मेरे प्यारे! देखो, भगवान विष्णु भ्रमण करते हुए राजा के समीप पहुँचे। राजा ने उनका स्वागत किया। राजा ने कहा प्रभु! हमें तो आवश्यकता थी कि एक सन्यासी, महापुरुष मानो हमारे आश्रम में रहे। तो उन्होंने कहा भगवन! आप यहाँ वास कीजिए। विष्णु बोले कि मेरे लिए एक स्थान का निर्माण होना चाहिए। मेरे पुत्रो! देखो, राजा को क्या देरी थी। देखो, राजा ने एक स्थान का निर्माण किया उस आसन पर मानो देखो, भगवान विष्णु साधु महात्मा के रूप में बेटा! वहाँ विद्यमान हो गए। जब विद्यमान हो गए तो राजा पत्नी के सहित मानो नित्य प्रति बेटा! उनके यहाँ सत्संग होता, विचार होता, वेद का विचार होता, मन्त्रों के ऊपर अध्ययन होता रहा।

    तो मेरे प्यारे! देखो, राजा मोहित हो गया। राजलक्ष्मी अति प्रसन्नता में परणित हो गई। मेरे प्यारे! राज्य में हर प्रकार की शान्ति की स्थापना हो गई। तो मेरे प्यारे! देखो, कुछ समय के पश्चात लक्ष्मी राजा के यहाँ भिक्षु का रूप बनाकर के राजा से बोली हे राजन! भिक्षां देहि, मेरे प्यारे! राजा ने कहा माता है, मानो क्षुधा से पीड़ित है। वे मुनिवरों! देखो, नाना प्रकार के पदार्थों को लेकर के देवी के समीप आये, उन्होंने , माता ने अपनी झोली से देखो, पाँच पात्र स्वर्ण के निकासे निकाल कर दिए और कहा राजन! इनमें , स्वर्ण पात्र में भोजन र दीजिए उन्होंने विचारा ये कैसी भिखारन है। मानो देखो, ये कैसी भिक्षुक है? जिसके द्वारा मानो स्वर्ण रहता हो, स्वर्ण के पात्रों में भोजन करने वाली हो। उन्होंने कहा प्रभु ब्रह्मे वाचप्प्रही लोकाम हे माता! भोजनं मम। ब्रहे उन्होंने भोजन किया और वह बोली कि ये जो पात्र है। इसको मेरे से पृथक कर दीजिए। मैं पात्र को नहीं चाहती। पात्र में एक समय भोजन कर लेती, द्वितीय नहीं कर पाती। तो मेरे प्यारे! राजा ने विचारा यह भिक्षुक माता तो बड़ी आश्चर्यजनक है। राजा ने विचारा कि यह कुछ समय तक रह जाए, तो मैं स्वर्णपति बन जाऊँगा।

    तो बेटा! उन स्वर्ण के पात्रों को गृह में प्रवेश कर दिए। मुनिवरों! देखो, वह नित्यप्रति भोजन करती और पाँच पात्र स्वर्ण के निकास कर दे देती। तो मेरे प्यारे! जब लक्ष्मी ने विचार लिया कि ये धर्म से विमुख हो गया है। मानो विष्णु से विमुख हो गया है। तो उस समय राजा से कहा हे राजन! अब मैं यहाँ से प्रस्थान कर रही हूँ उन्होंने कहा माता! तुम कहाँ जाती हो? मेरे यहाँ वास करो। उन्होंने कहा मेरी कुछ प्रतिज्ञाएँ है। उन्होंने कहा माता! क्या प्रतिज्ञा है? कि मैं उस काल में रह सकूँगी जब ये जो तुम्हारी वाटिका में महात्मा रहते है इसका यहाँ से प्रस्थान हो जाए। मानो यहाँ से इसका गमन हो जाए।

    तो मेरे पुत्रो! देखो, उन्होंने कहा माता! वे तो मेरे पूज्य गुरु है, मुझे शिक्षा देते हैं मैं ऐसा नहीं कर सकता। उन्होंने कहा तो मेरा यहाँ वास नहीं हो सकता मैं यहाँ वास नहीं कर सकती। उन्होंने कहा माता! तुम युक्ति उच्चारण करो। उन्होंने कहा तुम इनके सम्मुख न जाओ, न भोजन पहुँचाओ। कुछ समय पश्चात ये क्षुधा में पीड़ित होकर स्वतः प्रस्थान कर जाएँगें।

    मेरे प्यारे! देखो, राजा ने लक्ष्मी के इस वाक को स्वीकार कर लिया। देखो, दोनों ने वहाँ जाना समाप्त कर दिया। कुछ समय के पश्चात बेटा! महात्मा विष्णु ने वहाँ से गमन किया। लक्ष्मी स्वर्ण पात्र देती रही।

    बेटा! कुछ समय के पश्चात लक्ष्मी ने कहा राजन! अब मुझे आज्ञा दीजिए। मैं यहाँ से अब प्रस्थान कर रही हूँ, राजा बोला मातेश्वरी! तुम कहाँ जाती हो? मैंने तो महात्मा को भी दूरी कर दिया। अब तुम मानो देखो, मुझे त्याग करके जा रही हो। ये तो मेरे लिए श्राप हो जाएगा। उन्होंने कहा नहीं, राजन! अब मैं नहीं रह सकूँगी। जहाँ मेरे पति विष्णु रहते थे विष्णु जब तुमने मेरे पति को ठुकरा दिया तो जहाँ पति रहता है वहाँ पत्नी रहती है। तो हे राजन! मानो देखो, तुमने मेरे स्वामी को भोजन नहीं दिया। मानो देखो, वह धर्म है वे महान विष्णु है। वे मेरे पति है। तो मेरे प्यारे! देखो, ये जो पतिं ब्रह्माः ये जो लक्ष्मी है ये धर्म की पत्नी कहलाती है इसका यथार्थ उपयोग होना चाहिए।

    तो मेरे प्यारे! देखो, लक्ष्मी ने वहाँ से गमन किया। देखो, वे जो स्वर्ण पात्र थे वह देखो, पार्थिव तत्त्वों के बन गए। मानो वे स्वर्ण के न रहे। मेरे प्यारे! देखो, राजा ने कहा ओह, मैंने कितना बड़ा पाप किया है। मैंने महात्मा को अपने से दूरी कर दिया मानो मेरा राष्ट्र तो नष्ट भ्रष्ट हो गया है।

    तो मेरे प्यारे! विचार विनिमय में क्या? ये जो है लक्ष्मी मानो देखो, जो आत्मवेत्ता होता है मानो देखो, लक्ष्मी उनके चरणों में ओत प्रोत हो जाती है। लक्ष्मीं ब्रह्मः वाचोः और यदि लक्ष्मीं ब्रह्मे व्रताः मेरे प्यारे! जो लक्ष्मी का पूजन नहीं करता। पूजन का अभिप्राय ये है कि लक्ष्मी का सदुपयोग होना चाहिए। जो लक्ष्मी का देखो, सदुपयोग करता है उसके गृह में देवी वास करती है मानो देखो, सदुपयोग क्या है? देवताओं का याग करना, मानो देखो, अपने को शुभ क्रियाकलापों में लगाना। इसका दुरूपयोग जब करता है प्राणी, तो मानो देखो, उसका विनाश हो जाता है। धर्म जब नहीं रहता। तो तभी यह मानो देखो, लक्ष्मी का दुरूपयोग प्रारम्भ करता है।

    तो मुनिवरों! देखो, जो अक्षय क्षीर सागर में काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह इत्यादियों को नीचे दबाकर रखता है योगाभ्यास के द्वारा प्राण सूत्र के द्वारा तो बेटा! ये लक्ष्मी मानो देखो, उसके चरणों में ओत प्रोत हो जाती है। मेरे प्यारे! ये सम्पदा बनकर के जीवन की धारा बनकर के ये मानवीयता को ऊँचा बना देती है।

    इस भाष्य को एडिट करें

    भाषार्थ

    (या) जो (पतयालूः) पतन कराने वाली, (अजुष्टा) इस लिये अप्रिया और असेविता (लक्ष्मीः) लक्ष्मी (मा, अभिचस्कन्द) मुझ पर आरूढ़ हुई है, (इव) जैसे कि (वन्दना) लता (वृक्षम्) वृक्ष पर; (सवितः) हे उत्पादक तथा ऐश्वर्यवाले परमेश्वर ! (ताम्) उसे (इतः अस्मत् अन्यत्र) यहां से अर्थात् हम से अन्यत्र (धाः) स्थापित कर, और (हिरण्यहस्तः) मानों हाथों में हिरण्य लेकर (नः) हमें (वसुरराणः) धन देने वाला हो।

    टिप्पणी

    [अजुष्टा= अ + जुष्टा। जुषो प्रीतिसेवनयोः (तुदादिः)। सवितः= षु प्रसवैश्वर्ययोः (भ्वादिः अदादिः)। रराणः= रा दाने (अदादिः) + कानच्। "मा अस्मत्" मुझ और हमसे। वैदिक वर्णनों में यह प्रायः देखा जाता है कि व्यक्ति जो अपने लिये चाहता है वह अपने लिये चाहता हुआ अन्यों के लिये भी चाहता है। यह उसकी प्रबल सामाजिक भावना का द्योतक है]।

    इस भाष्य को एडिट करें

    विषय

    पापी लक्ष्मी को दूर करना।

    भावार्थ

    (या) जो (लक्ष्मीः) लक्ष्मी, घर की लक्ष्मी होकर भी (पतयालूः) नीचे दुराचार में गिरने वाली (अजुष्टा) प्रेम से रहित होकर, (मा) मुझे (अभि-चस्कन्द) ऐसे चिपटी हुई है जैसे (वृक्षम्) वृक्ष को (वन्दन* इव) वन्दन नामक विष वेल चिपट जाती है और उस पर छाकर वृक्षको सुखा डालती है और उसको बढ़ने नहीं देती। हे (सवितः) सबके प्रेरक राजन् ! न्यायकारिन् ! (ताम्) उस ऐसी नागिन के समान लक्ष्मी को भी (इतः अन्यत्र) यहां से दूसरे स्थान पर (अस्मत्) हमसे पृथक् (धाः) रख। और (हिरण्य-हस्तः) सुवर्णादि धनों से सम्पन्न तू (नः) हमें (वसु) उत्तम धन (रराणः) प्रदान कर।

    टिप्पणी

    ‘वन्दनःऽइव’ इति पदपाठोऽपि बहुश उपलभ्यते, प्रातिशाख्यानुसारी च सायणस्तु ‘वन्दनादव’ इति पदच्छेदं चकारं तथैव च शंकर

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    अथर्वाङ्गिरा ऋषि। सविता, जातवेदा देवताः। १,४ अनुष्टुप, २,३, त्रिष्टुप। चतुर्ऋचं सूक्तम्।

    इस भाष्य को एडिट करें

    इंग्लिश (4)

    Subject

    Negative Plenty

    Meaning

    The plenty of negative character that has flown and fallen on me smothers me like a parasite creeper on a tree, I pray, O Savita, lord of life and generous of golden hands, take it away from us and dump it elsewhere, giving us, instead, plenty of peaceable settlement with positive wealth, honour and excellence.

    इस भाष्य को एडिट करें

    Translation

    What wealth, degrading and abominable, has dried me, like a (parasite) creeper a tree, O impeller Lord, may you place that somewhere else away from us. May you, with your hands full of gold (hiranya - hasta), granting liberally, bestow on us (rehabilitating) riches.

    Comments / Notes

    MANTRA NO 7.120.2AS PER THE BOOK

    इस भाष्य को एडिट करें

    Translation

    O man of constructive genius § you are having gold at your hand. Giving us wealth send elsewhere from us and this place those evil tendencies or evil fortunes which are fleeting abominable and has assailed me as a creeper climbs on a tree.

    इस भाष्य को एडिट करें

    Translation

    Granting us riches, O God, the Creator, and Lord of wealth!, send thou away from us to other regions, the degrading and abominable Fortune which hath assailed me and is exhausting my vigor, as a creeper climbs a tree and dries it up.

    इस भाष्य को एडिट करें

    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    २−(या) (मा) माम् (लक्ष्मीः) म० १। लक्षणम् (पतयालूः) स्पृहिगृहिपतिदयि०। पा० ३।२।१५८। पत गतौ, चुरादिः, अदन्तः-आलुच्। ऊङुतः। पा० ४।१।६६। ऊङ् स्त्रियाम्। पातयित्री। दुर्गतिकारिणी (अजुष्टा) अप्रिया (अभिचस्कन्द) स्कन्दिर् गतिशोषणयोः-लिट्। अभितः प्राप (वन्दना) सू० ११३ म० १ लता (इव) यथा (वृक्षम्) (अन्यत्र) अन्येषु दुष्टेषु (अस्मत्) अस्मत्तः धार्मिकेभ्यः (सवितः) हे परमैश्वर्यवन् परमात्मन् (ताम्) लक्ष्मीम्। लक्षणम् (इतः) अस्मात् स्थानात् (धाः) दध्याः (हिरण्यहस्तः) हिरण्यं तेजः सुवर्णं वा हस्ते वशे यस्य सः (वसु) धनम् (नः) अस्मभ्यम् (रराणः) अ० ५।२७।११। ददानः ॥

    इस भाष्य को एडिट करें
    Top