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अथर्ववेद के काण्ड - 7 के सूक्त 115 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 115/ मन्त्र 4
    ऋषिः - अथर्वाङ्गिराः देवता - चन्द्रमाः छन्दः - परोष्णिक् सूक्तम् - ज्वरनाशन सूक्त
    146

    ए॒ता ए॑ना॒ व्याक॑रं खि॒ले गा विष्ठि॑ता इव। रम॑न्तां॒ पुण्या॑ ल॒क्ष्मीर्याः पा॒पीस्ता अ॑नीनशम् ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    ए॒ता: । ए॒ना॒: । वि॒ऽआक॑रम् । खि॒ले । गा: । विस्थि॑ता:ऽइव । रम॑न्ताम् । पुण्या॑: । ल॒क्ष्मी: । या: । पा॒पी: । ता: । अ॒नी॒न॒श॒म् ॥१२०.४॥


    स्वर रहित मन्त्र

    एता एना व्याकरं खिले गा विष्ठिता इव। रमन्तां पुण्या लक्ष्मीर्याः पापीस्ता अनीनशम् ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    एता: । एना: । विऽआकरम् । खिले । गा: । विस्थिता:ऽइव । रमन्ताम् । पुण्या: । लक्ष्मी: । या: । पापी: । ता: । अनीनशम् ॥१२०.४॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 7; सूक्त » 115; मन्त्र » 4
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    दुर्लक्षण के नाश का उपदेश।

    पदार्थ

    (एताः) इन [पुण्यलक्षणों] को और (एनाः) इन [पापलक्षणों] को (व्याकरम्) मैंने स्पष्ट कर दिया है (इव) जैसे (खिले) विना जुते स्थान [जंगल] में (विष्ठिताः) खड़ी हुई (गाः) गौओं को। (पुण्याः) पुण्य (लक्ष्मीः) लक्षण (रमन्ताम्) ठहरे रहें, और (याः) जो (पापीः) पापी [लक्षण] है, (ताः) उन्हें (अनीनशम्) मैंने नष्ट कर दिया है ॥४॥

    भावार्थ

    मनुष्य भले और बुरे कर्मों के लक्षण समझकर भलों का स्वीकार और बुरों का त्याग करें ॥४॥

    टिप्पणी

    ४−(एताः) पुण्याः (एनाः) पापीः (व्याकरम्) वि+आङ्+डुकृञ् करणे-लुङ्, कृमृदृरुहिभ्यश्छन्दसि। पा० ३।१।५९। इति च्लेरङ्। ऋदृशोऽङि गुणः। पा० ७।४।१६। इति गुणः। व्याख्यातवानस्मि (खिले) खिल कणश आदाने-क। अकृष्टदेशे (गाः) धेनूः (विष्ठिताः) विविधस्थिताः (इव) यथा (रमन्ताम्) तिष्ठन्तु (पुण्याः) कल्याण्यः (लक्ष्मीः) लक्ष्म्यः। लक्षणानि (याः) (पापीः)-म० १। पापकारिण्यः। दुर्लक्षणानि (अनीनशम्) अ० १।२३।४। नाशितवानस्मि ॥

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    विषय

    रमन्तां पुण्याः लक्ष्मीः

    पदार्थ

    १. (एता:) = ऊपर मन्त्र १ और २ में निर्दिष्ट (एना:) = मन्त्र तीन में अन्वादिष्ट लक्ष्मियों को (व्याकरम्) = स्पष्ट रूप से अलग-अलग करता हूँ। उसी प्रकार (इव) = जैसेकि (खिले) = व्रज में [व्रजे-सा०] अथवा अनुपजाऊ भूमि पर (विष्ठिताः गा:) = मिलकर एक देश में स्थित गौओं को गोपाल उस-उस कार्य के लिए विवेकपूर्वक पृथक् करते हैं। २. उनमें (पुण्याः लक्ष्मी:) = जो कल्याणी लक्ष्मियाँ हैं, वे (रमन्ताम्) = मुझमें सुख से रहें। (याः पापी:) = जो पापकारिणी दुर्लक्ष्मियाँ हैं, (ताः अनीनशम्) = उन्हें अपने से दूर करता हूँ।

    भावार्थ

    विवेकपूर्वक पापी लक्ष्मियों को हम अपने से दूर करें, शुभ लक्ष्मियों को ही अपने समीप रखनेवाले हों।

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    भाषार्थ

    (एताः) इन [पापिष्ठाः], (एनाः) और इन (शिवा) लक्ष्मियों को (व्याकरम्) मैंने अलग-अलग कर दिया है, दर्शा दिया है [मन्त्र ३ में], (इव) जैसे कि (खिले१) खलियान में (विष्ठिताः) विशेषतया स्थित (गाः) गौओं को [सायंकाल के समय] ग्वाला अलग-अलग कर देता है। (पुण्याः लक्ष्मीः) पुण्य लक्ष्मियां (रमन्ताम्) मुझमें रमण करें, (याः) जो (पापीः) पापमार्ग से उपार्जित होती हैं (ताः) उन्हें (अनीनशम्) मैंने नष्ट कर दिया है, उनका उपार्जन परित्यक्त कर दिया है।

    टिप्पणी

    [१. खिल= खलिहान, जहां धान्य को भूसे से अलग किया जाता है। वहां भूसे के बिखरे रहने से गौएं एकत्रित हो जाती हैं। सायंकाल में ग्वाला उन्हें, घेर कर वापिस लाता है, और इन की व्याकृति कर देता है, इन्हें अलग-अलग कर देता है। खिले का अर्थ अनूपजाऊ भूमि करने पर अर्थ प्रासंगिक नहीं होता। खिले= गोष्ठे (सायण)।]

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    विषय

    पापी लक्ष्मी को दूर करना।

    भावार्थ

    (खिले) बाड़े में (वि-ष्ठिताः) एकत्र बैठी हुई (गाः) गौनों को (इव) जिस प्रकार गवाला अलग अलग पहचानता है उसी प्रकार मैं भी (एताः) अपने भीतर बैठी हुई इन इन (एना) नाना प्रकार की मानस वृत्तियों को (वि-आकरम्) पृथक् पृथक् कार्य-कारण रूप से विवेक पूर्वक जाचूँ। (याः) जो (पुण्याः) पुण्य पवित्र (लक्ष्मी) लक्ष्मियां या मेरे स्वभाव को दर्शाने वाली उत्तम प्रवृत्तियां हैं वे मेरे जीवन में (रमन्ताम्) बार बार प्रकट हों और (याः) जो (पापीः) पापजनक, बुरी प्रवृत्तियां हैं (ताः) उनको अपने में से (अनीनशम्) निकाल कर दूर कर दूं।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    अथर्वाङ्गिरा ऋषि। सविता, जातवेदा देवताः। १,४ अनुष्टुप, २,३, त्रिष्टुप। चतुर्ऋचं सूक्तम्।

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Negative Plenty

    Meaning

    These auspicious ones, and these other inauspicious ones of the plenties of life, I have distinguished and separated like cows sitting on the meadow. May the auspicious traits and potentialities grow joyous and prosperous, and those that are negative and sinful I have eliminated.

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    Translation

    These and those I have separated like cows straying on a common pasture. What propitious wealths (punyah laksmih) are there, may they stay here; and which are evil (papih) ones, them I drive away.

    Comments / Notes

    MANTRA NO 7.120.4AS PER THE BOOK

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    Translation

    I disport these and those evil tendencies like cows who stay on common land, let auspicious tendencies stay here and hence I exterminates them which are inauspicious and bad.

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    Translation

    I have separated the good and bad characteristics, as a cowherd distinguishes cows who stray on common lands. Here let auspicious characteristics stay, hence have I banished evil ones.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    ४−(एताः) पुण्याः (एनाः) पापीः (व्याकरम्) वि+आङ्+डुकृञ् करणे-लुङ्, कृमृदृरुहिभ्यश्छन्दसि। पा० ३।१।५९। इति च्लेरङ्। ऋदृशोऽङि गुणः। पा० ७।४।१६। इति गुणः। व्याख्यातवानस्मि (खिले) खिल कणश आदाने-क। अकृष्टदेशे (गाः) धेनूः (विष्ठिताः) विविधस्थिताः (इव) यथा (रमन्ताम्) तिष्ठन्तु (पुण्याः) कल्याण्यः (लक्ष्मीः) लक्ष्म्यः। लक्षणानि (याः) (पापीः)-म० १। पापकारिण्यः। दुर्लक्षणानि (अनीनशम्) अ० १।२३।४। नाशितवानस्मि ॥

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