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अथर्ववेद के काण्ड - 7 के सूक्त 115 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 115/ मन्त्र 3
    ऋषिः - अथर्वाङ्गिराः देवता - सविता, जातवेदाः छन्दः - त्रिष्टुप् सूक्तम् - पापलक्षणनाशन सूक्त
    63

    एक॑शतं ल॒क्ष्म्यो॒ मर्त्य॑स्य सा॒कं त॒न्वा ज॒नुषोऽधि॑ जा॒ताः। तासां॒ पापि॑ष्ठा॒ निरि॒तः प्र हि॑ण्मः शि॒वा अ॒स्मभ्यं॑ जातवेदो॒ नि य॑च्छ ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    एक॑ऽशतम् । ल॒क्ष्म्य᳡: । मर्त्य॑स्य । सा॒कम् । त॒न्वा᳡ । ज॒नुष॑: । अधि॑ । जा॒ता: । तासा॑म् । पापि॑ष्ठा: । नि: । इ॒त: । प्र । हि॒ण्म॒: । शि॒वा: । अ॒स्मभ्य॑म् । जा॒त॒ऽवे॒द॒: । नि । य॒च्छ॒ ॥१२०.३॥


    स्वर रहित मन्त्र

    एकशतं लक्ष्म्यो मर्त्यस्य साकं तन्वा जनुषोऽधि जाताः। तासां पापिष्ठा निरितः प्र हिण्मः शिवा अस्मभ्यं जातवेदो नि यच्छ ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    एकऽशतम् । लक्ष्म्य: । मर्त्यस्य । साकम् । तन्वा । जनुष: । अधि । जाता: । तासाम् । पापिष्ठा: । नि: । इत: । प्र । हिण्म: । शिवा: । अस्मभ्यम् । जातऽवेद: । नि । यच्छ ॥१२०.३॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 7; सूक्त » 115; मन्त्र » 3
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    दुर्लक्षण के नाश का उपदेश।

    पदार्थ

    (एकशतम्) एक सौ एक [अपरिमित, पापिष्ठ और माङ्गलिक] (लक्ष्म्यः) लक्षण (मर्त्यस्य) मनुष्य के (तन्वा साकम्) शरीर के साथ (जनुषः) जन्म से (अधि) अधिकारपूर्वक (जाताः) उत्पन्न हुए हैं। (तासाम्) उन में से (पापिष्ठाः) पापिष्ठ [लक्षणों] को (इतः) यहाँ से (निः) निश्चय करके (प्र हिण्मः) हम निकाले देते हैं, (जातवेदः) हे उत्पन्न पदार्थों के जाननेवाले परमेश्वर ! (अस्मभ्यम्) हमें (शिवाः) माङ्गलिक [लक्षण] (नि) नियम से (यच्छ) दे ॥३॥

    भावार्थ

    मनुष्य अपने पूर्व जन्मों के कर्मफलों से शुभ और अशुभ लक्षणों सहित जन्मता है। जो मनुष्य परमेश्वर की आज्ञा में चलते हैं, वे क्लेशों को मिटाकर मोक्षसुख भोगते हैं ॥३॥

    टिप्पणी

    ३−(एकशतम्) एकाधिकशतसंख्याकाः। अपरिमिता इत्यर्थः (लक्ष्म्यः) म० १। लक्षणानि (मर्त्यस्य) मनुष्यस्य (साकम्) सह (तन्वा) शरीरेण (जनुषः) अ० ४।१।२। जन्मनः सकाशात् (अधि) अधिकारे (जाताः) उत्पन्नाः (तासाम्) लक्ष्मीणां मध्ये (पापिष्ठाः) अतिशयेन पापीः (निः) निश्चयेन (इतः) अस्मात्स्थानात् (प्र हिण्मः) हि गतौ वृद्धौ च। प्रेरयामः। अपसारयामः (शिवाः) मङ्गलकारिणीर्लक्ष्मीः (अस्मभ्यम्) धर्मात्मभ्यः (जातवेदः) उत्पन्नानां पदार्थानां वेदितः (नि) नियमेन (यच्छ) दाण् दाने। देहि ॥

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    विषय

    पापिष्ठा Vs शिवा [लक्ष्मी]

    पदार्थ

    १. (एकाशतं लक्ष्म्य:) = एकाधिकशत संख्याक [१०१] लक्ष्मियाँ (मर्त्यस्य) = मनुष्य के (तन्वा साकम्) = शरीर के साथ (जनुषः अधिजाता:) = जन्म से ही उत्पन्न हुई हैं। मनुष्य स्वभावतः ही सैकड़ों प्रकार से धनों के अर्जन की वृत्तिवाला होता है। २. (तासाम्) = उन लक्ष्मियों में से (पापिष्ठा:) = जो अतिशयेन पापी लक्ष्मियाँ हैं, उन्हें (इत:) = यहाँ से (निः प्रहिण्म:) = नि:शेषरूप से अपसारित करते हैं। हम अन्याय्य मार्ग से अर्जित धनों को नहीं चाहते। हे जातवेदः सर्वज्ञ प्रभो ! उनमें जो (शिवा:) = मंगलकारिणी लक्ष्मियाँ हैं, उन्हें (अस्मभ्यं नियच्छ) = हमारे लिए दीजिए।

    भावार्थ

    मनुष्य स्वभावत: सैकड़ों सरणियों से धन का अर्जन करने में प्रवृत्त होता है। हम पापिष्ठ लक्ष्मियों को अपने से दूर करें और प्रभु के अनुग्रह से न्याय्य मार्ग से ही मंगलकारिणी लक्ष्मी का अर्जन करें।

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    भाषार्थ

    (मर्त्यस्य) मरणधर्मा मनुष्य सम्बन्धी (लक्ष्म्यः) लक्ष्मियां (एकशतम्) १०१ हैं, जोकि (तन्वा साकम्) शरीर के साथ (जनुषः अधि) जन्म से (जाताः) पैदा हुई हैं। (तासाम्) उनमें से (पापिष्ठाः) अत्यन्त पापी लक्ष्मियों को (इतः) इस जीवन से (निः) निःशेषरूप में (प्रहिण्मः) हम प्रगत करते हैं, अपसारित करते हैं, (जातवेदः) हे जातप्रज्ञ, प्रज्ञानी परमेश्वर ! (शिवाः) कल्याणकारिणी लक्ष्मियां (अस्मभ्यम्) हमारे लिये (नियच्छ) नियत कर, या प्रदान कर।

    टिप्पणी

    [नि यच्छ= नि + यम ("इषुगमियमां छः" अष्टा० ७।३।७७) द्वारा "छः"। अथवा नियच्छ= नि + दा (दाने), (“पाघ्रा" अष्टा० ७।३।७८) द्वारा "दा" को "यच्छ" आदेश। मनुष्य एक वर्ष लगभग माता के पेट में वास करता है, ओर "शतायुष" होने से १०० वर्ष और, उसका जीवन वेद कथित है। १०१ वर्षों की दृष्टि से उसकी लक्ष्मियां १०१ कही है। लक्ष्मियां दो प्रकार की हैं पापिष्ठाः और शिवाः। मन्त्र (४) में इन्हें पापीः और पुण्याः कहा है]।

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    विषय

    पापी लक्ष्मी को दूर करना।

    भावार्थ

    (एक-शतं) १०१ एकसौ एक (लक्ष्म्यः) मनुष्य के स्वरूप को दर्शाने वाली मानस वृत्तियां (मर्त्यस्य) इस मरणधर्मा प्राणी के (तन्वा) शरीर के (साकं) साथ (जनुषः अघि) जन्म से ही (जाताः) उत्पन्न होती हैं। (तासां) उनमें से (पापिष्ठाः) पाप से युक्त प्रवृत्तियों को (इतः) इस मनुष्य से (निः प्र हिणमः) सर्वथा हम प्रयत्नपूर्वक दूर करें और हे (जात-वेदः) विज्ञान सम्पन गुरो ! और आदिगुरो परमात्मन् ! या गृहपते ! (शिवाः) कल्याणकारिणी लक्ष्मियों, शुभ मानसवृत्तियों को (अस्मभ्यम्) हमें (नि यच्छ) प्रदान कर, हमें उनकी शिक्षा कर।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    अथर्वाङ्गिरा ऋषि। सविता, जातवेदा देवताः। १,४ अनुष्टुप, २,३, त्रिष्टुप। चतुर्ऋचं सूक्तम्।

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Negative Plenty

    Meaning

    Hundreds are the genetic plenties and potentialities born along with the body of mortal man. Of these, the negative and sinful ones we throw out from life here. O Jataveda, lord all-knowing light of life, give us the positive, the auspicious, the gracious.

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    Translation

    A hundred and one wealths are born along with the body of a mortal at his birth, Out of those, we drive the most vicious ones away from here. O knower of all, may you grant us liberally the auspicious ones.

    Comments / Notes

    MANTRA NO 7.120.3AS PER THE BOOK

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    Translation

    One hundred one evil tendencies are born altogether with the body of a mortal at his birth. Most unfortunate ones of these we send away from here and keep fortunate ones for us, O jatvadas (God).

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    Translation

    One hundred and one characteristics all together are at his birth born with a mortal’s body. Of these we send away the most unlucky; Keep lucky ones for us, O God, the knower of all created objects.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    ३−(एकशतम्) एकाधिकशतसंख्याकाः। अपरिमिता इत्यर्थः (लक्ष्म्यः) म० १। लक्षणानि (मर्त्यस्य) मनुष्यस्य (साकम्) सह (तन्वा) शरीरेण (जनुषः) अ० ४।१।२। जन्मनः सकाशात् (अधि) अधिकारे (जाताः) उत्पन्नाः (तासाम्) लक्ष्मीणां मध्ये (पापिष्ठाः) अतिशयेन पापीः (निः) निश्चयेन (इतः) अस्मात्स्थानात् (प्र हिण्मः) हि गतौ वृद्धौ च। प्रेरयामः। अपसारयामः (शिवाः) मङ्गलकारिणीर्लक्ष्मीः (अस्मभ्यम्) धर्मात्मभ्यः (जातवेदः) उत्पन्नानां पदार्थानां वेदितः (नि) नियमेन (यच्छ) दाण् दाने। देहि ॥

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