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अथर्ववेद के काण्ड - 7 के सूक्त 53 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 53/ मन्त्र 4
    ऋषिः - ब्रह्मा देवता - आयुः, बृहस्पतिः, अश्विनौ छन्दः - उष्णिग्गर्भार्षी पङ्क्तिः सूक्तम् - दीर्घायु सूक्त
    63

    मेमं प्रा॒णो हा॑सी॒न्मो अ॑पा॒नोव॒हाय॒ परा॑ गात्। स॑प्त॒र्षिभ्य॑ एनं॒ परि॑ ददामि॒ ते ए॑नं स्व॒स्ति ज॒रसे॑ वहन्तु ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    मा । इ॒मम् । प्रा॒ण: । हा॒सी॒त् । मो इति॑ । अ॒पा॒न: । अ॒व॒ऽहाय॑ । परा॑ । गा॒त् । स॒प्त॒र्षिऽभ्य॑: । ए॒न॒म् । परि॑ । द॒दा॒मि॒ । ते । ए॒न॒म् । स्व॒स्ति । ज॒रसे॑ । व॒ह॒न्तु॒ ॥५५.४॥


    स्वर रहित मन्त्र

    मेमं प्राणो हासीन्मो अपानोवहाय परा गात्। सप्तर्षिभ्य एनं परि ददामि ते एनं स्वस्ति जरसे वहन्तु ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    मा । इमम् । प्राण: । हासीत् । मो इति । अपान: । अवऽहाय । परा । गात् । सप्तर्षिऽभ्य: । एनम् । परि । ददामि । ते । एनम् । स्वस्ति । जरसे । वहन्तु ॥५५.४॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 7; सूक्त » 53; मन्त्र » 4
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    विद्वानों के कर्त्तव्य का उपदेश।

    पदार्थ

    (प्राणः) प्राण (इमम्) इस [प्राणी] को (मा हासीत्) न छोड़े, (मो) और न (अपानः) अपान वायु (अवहाय) छोड़ कर (परा गात्) चला जावे। (एनम्) इस पुरुष को (सप्तर्षिभ्यः) सात व्यापनशीलों वा दर्शनशीलों [अर्थात् त्वचा, नेत्र, कान, जिह्वा, नाक, मन और बुद्धि] को (परि ददामि) मैं समर्पण करता हूँ, (ते) वे (एनम्) इसको (स्वस्ति) आनन्द के साथ (जरसे) स्तुति के लिये (वहन्तु) ले चलें ॥४॥

    भावार्थ

    मनुष्य शारीरिक इन्द्रियों को प्राणायाम, व्यायाम आदि से स्वस्थ रख कर धर्म में प्रवृत्त रहें ॥४॥

    टिप्पणी

    ४−(इमम्) प्राणिनम् (प्राणः) श्वासः (मा हासीत्) ओहाक् त्यागे-लुङ्। मा त्यजतु (मो) नैव (अपानः) प्रश्वासः (अवहाय) ओहाक् त्यागे। प्रत्यज्य (परा गात्) दूरे गच्छेत् (सप्तर्षिभ्यः) अ० ४।११।९। सप्त ऋषयः प्रतिहिताः शरीरे-यजु० ३४।५५। त्वक्चक्षुःश्रवणरसनाघ्राणमनोबुद्धिभ्यः (एनम्) जीवम् (परि ददामि) समर्पयामि (ते) सप्तर्षयः (एनम्) (स्वस्ति) क्षेमेण (जरसे) अ० १।३०।२। जॄ स्तुतौ-असुन्। जरा स्तुतिर्जरतेः। स्तुतिकर्मणः-निरु० १०।८। स्तुतये (वहन्तु) नयन्तु ॥

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    विषय

    सप्तर्षियों के प्रति अर्पण

    पदार्थ

    १. (इमम्) = इस पुरुष को (प्राण: मा हासीत्) = प्राण मत छोड़ जाए और (मो) = मत ही (अपान:) = अपान (अवहाय) = छोड़कर (परागात्) = दूर चला जाए। इस पुरुष के शरीर में ये प्राणापान ठीक गति करते रहें। २. मैं (सप्तर्षिभ्यः) = सात शीर्षण्य प्राणों के लिए [दो कान, दो नासिका-छिद्र, दो आँखें व मुख] (एन परिददामि) = इसे दे डालता हूँ। इसकी रक्षा के लिए उन्हें सौंप देता हूँ। (ते) = वे (एनम्) = इस पुरुष को (स्वस्ति) = कल्याणपूर्वक जरसे पूर्ण जरावस्था (वहन्तु) = प्रास कराएँ। यह युवावस्था में ही शरीर न छोड़ जाए।

    भावार्थ

    हमारे शरीर में प्राणापान की क्रिया ठीक हो। 'कान, नाक, आँख, मुख' सब ठीक बने रहें । इसप्रकार हम पूर्ण दीर्घजीवन प्राप्त करें।

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    भाषार्थ

    (इमम्) इसे (प्राणः) प्राण (मा हासीत्) न त्यागे, (अपानः) अपान (अवहाय) इसे त्याग कर (माउ)(परा गात्) परे चला जाय। (सप्तर्षिभ्यः) सप्तर्षियों के लिये (एनम्) इसे (परि ददामि) मैं सौंपता हूं (ते) वे (एनम्) इसे (स्वस्ति) कल्याणपूर्वक (जरसे) जरावस्था तक (वहन्तु) ले चलें।

    टिप्पणी

    [हासीत्= ओहाक् त्यागे, लुङ्। अवहाय = अव + हाक् त्यागे + ल्यप्। सप्तर्षयः= ५ इन्द्रियां, १ मन, १ विद्या अर्थात् बुद्धि (यजु० ३४।५५, तथा निरुक्त १२।४।३८), सप्त ऋषयः पद (२५)। ये सप्तऋषि सूक्ष्म शरीर के घटक हैं, जो कि जीवात्मा के साथ मृत्यु पर शरीर से उत्क्रान्त कर जाते हैं। जब तक ये शरीर में रहते हैं, तब तक इनकी सत्ता के कारण प्राण-अपान पुनः सशक्त होकर शरीर में प्रविष्ट किये जा सकते हैं]।

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    विषय

    दीर्घायु की प्रार्थना।

    भावार्थ

    (इमं) इस बालक के शरीर को (प्राणः) प्राण (मा हासीत्) न छोड़े, और (अपानः उ) अपान वायु भी इसको (अवहाय) छोड़कर (परा) दूर (मा गात्) न जाय। मैं पिता और आचार्य अपने बालक को (सप्तर्षिभ्यः) सात ऋषि, ज्ञानद्रष्टा प्राणों के अधीन (परि ददामि) सौंपता हूं। (ते) वे सातों प्राण (एनं) इस जीव को (जरसे) बुढ़ापे के काल तक (स्वस्ति) सुखपूर्वक (वहन्तु) पहुंचा दें।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    ब्रह्मा ऋषिः। आयुष्यकारिणो बृहस्पतिरश्विनौ यमश्च देवताः। १ त्रिष्टुप्। ३ भुरिक्। ४ उष्णिग्गर्भा आर्षी पंक्ति:। ५ अनुष्टुप्। सप्तर्चं सूक्तम्॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Good Health and Age

    Meaning

    Let not prana forsake this person. Let not apana leave him and go out. I entrust this person to the vitality and energies of Saptarshis, i.e., five senses, mind and intelligence, or, five main pranas, Dhananjaya prana and Sutratma, cosmic spiritual vitality, which may support, sustain and conduct him with peace and comfort unto full old age.

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    Translation

    May the out-breath not leave this man, nor the in-breath go away leaving him helpless. I hand him over to the seven seers (sapta-rsibhyah). May they conduct him safely unto old age.

    Comments / Notes

    MANTRA NO 7.55.4AS PER THE BOOK

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    Translation

    Let not the vital breath that he draws forsake this man let not his expiration part leaving him, I give him over to seven vital breaths and let them conduct him to normal old age in safety.

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    Translation

    Let not the vital breath he draws forsake him, let not his expiration part and leave him. I give him over to the Seven Rishis: let them conduct him to old age in safety.

    Footnote

    He refers to the child, ‘I’ refers to the father or teacher. Griffith mentions seven rishis to be, Bhardwaja, Kasyapa, Gotama, Atri, Vasishtha, Visvamitra anu Jamadagni. This explanation is unacceptable, as there is no history in the Vedas. Seven Rishis refer to. Touch, Sight, Hearing, Taste, Smell, Mind and Intellect as mentioned in Yajur, 34-55.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    ४−(इमम्) प्राणिनम् (प्राणः) श्वासः (मा हासीत्) ओहाक् त्यागे-लुङ्। मा त्यजतु (मो) नैव (अपानः) प्रश्वासः (अवहाय) ओहाक् त्यागे। प्रत्यज्य (परा गात्) दूरे गच्छेत् (सप्तर्षिभ्यः) अ० ४।११।९। सप्त ऋषयः प्रतिहिताः शरीरे-यजु० ३४।५५। त्वक्चक्षुःश्रवणरसनाघ्राणमनोबुद्धिभ्यः (एनम्) जीवम् (परि ददामि) समर्पयामि (ते) सप्तर्षयः (एनम्) (स्वस्ति) क्षेमेण (जरसे) अ० १।३०।२। जॄ स्तुतौ-असुन्। जरा स्तुतिर्जरतेः। स्तुतिकर्मणः-निरु० १०।८। स्तुतये (वहन्तु) नयन्तु ॥

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