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अथर्ववेद के काण्ड - 7 के सूक्त 76 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 76/ मन्त्र 6
    ऋषिः - अथर्वा देवता - जायान्यः, इन्द्रः छन्दः - त्रिष्टुप् सूक्तम् - गण्डमालाचिकित्सा सूक्त
    53

    धृ॒षत्पि॑ब क॒लशे॒ सोम॑मिन्द्र वृत्र॒हा शू॑र सम॒रे वसू॑नाम्। माध्य॑न्दिने॒ सव॑न॒ आ वृ॑षस्व रयि॒ष्ठानो॑ र॒यिम॒स्मासु॑ धेहि ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    धृ॒षत् । पि॒ब॒ । क॒लशे॑ । सोम॑म् । इ॒न्द्र॒ । वृ॒त्र॒ऽहा । शू॒र॒ । स॒म्ऽअ॒रे । वसू॑नाम् । माध्यं॑दिने । सव॑ने । आ । वृ॒ष॒स्व॒ । र॒यि॒ऽस्थान॑: । र॒यिम् । अ॒स्मासु॑ । धे॒हि॒ ॥८१.२॥


    स्वर रहित मन्त्र

    धृषत्पिब कलशे सोममिन्द्र वृत्रहा शूर समरे वसूनाम्। माध्यन्दिने सवन आ वृषस्व रयिष्ठानो रयिमस्मासु धेहि ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    धृषत् । पिब । कलशे । सोमम् । इन्द्र । वृत्रऽहा । शूर । सम्ऽअरे । वसूनाम् । माध्यंदिने । सवने । आ । वृषस्व । रयिऽस्थान: । रयिम् । अस्मासु । धेहि ॥८१.२॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 7; सूक्त » 76; मन्त्र » 6
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    ६ मनुष्य धर्म का उपदेश।

    पदार्थ

    (धृषत्) हे निर्भय ! (शूर) हे शूर ! (इन्द्र) हे परम ऐश्वर्यवान् मनुष्य ! (वसूनाम्) धनों के निमित्त (समरे) युद्ध में (वृत्रहा) शत्रुनाशक हो कर (कलशे) [संसाररूप] कलश में [वर्तमान] (सोमम्) अमृत रस को (पिब) पी। (माध्यन्दिने) मध्य दिन के (सवने) काल वा स्थान में (आ वृषस्व) सब प्रकार बली हो, (रयिस्थानः) धनों का स्थान तू (रयिम्) धन को (अस्मासु) हम लोगों में (धेहि) धारण कर ॥६॥

    भावार्थ

    मनुष्य ब्रह्मचर्य आदि पथ्य कर्मों से स्वस्थ, बलवान् और मध्याह्न सूर्य के समान तेजस्वी होकर विद्या धन और सुवर्ण आदि धनसंचय करके सबको सुखी रक्खें ॥६॥ यह मन्त्र कुछ भेद से ऋग्वेद में है−६।४७।६ ॥

    टिप्पणी

    ६−(धृषत्) ञिधृषा प्रागल्भ्ये-शतृ, छान्दसः शः। हे प्रगल्भ (पिब) (कलशे) अ० ३।१२।७। संसाररूपे घटे वर्तमानम् (सोमम्) अमृतरसम् (इन्द्र) हे परमैश्वर्यवन् जीव (वृत्रहा) शत्रुनाशकः (शूर) वीर (समरे) रणे (वसूनाम्) धनानां निमित्ते (माध्यन्दिने) अ० ७।७२।३। मध्याह्ने भवे (सवने) अ० ७।७२।३। काले स्थाने वा (आ) सर्वतः (वृषस्व) बली भव (रयिस्थानः) रायो धनानि तिष्ठन्ति यस्मिन्त्सः (रयिम्) धनम् (अस्मासु) (धेहि) धर ॥

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    विषय

    सोम-पान द्वारा रयिष्ठान' बनना

    पदार्थ

    १. हे (इन्द्र) = इन्द्रियों के अधिष्ठाता जीव! (धृषत्) = शत्रुओं का धर्षक होता हुआ तू (कलशे) = सोलह कलाओं के आधारभूत इस शरीर में (सोमं पिब) = सोम का पान कर। है शूर-शत्रुओं को शीर्ण करनेवाले इन्द्र! (वृत्रहा) = वृत्र को मारनेवाला तू (वसूनाम्) = वसुओं के, धनों के (समरे) = [सम् ऋ] सम्यक् प्राप्ति के निमित्त सोम का पान कर। शरीर में सोम का पान होने पर ही सब वसुओं की प्राप्ति होती है। २. (माध्यन्दिने सवने) = जीवन के माध्यन्दिन सवन, अर्थात् गृहस्थकाल में भी (आवृषस्व) = तू सर्वथा शरीर में इस शक्ति का सेचन करनेवाला हो। (रयिष्ठान:) = इसप्रकार ऐश्वर्य का अधिष्ठान होता हुआ तू (अस्मासु) = हममें भी (रयिं धेहि) = रयि का धारण करनेवाला बन । तेरे आदर्श से हम भी वीर्यरक्षण करते हुए रयि को प्राप्त करनेवाले बनें।

    भावार्थ

    हम 'काम' आदि शत्रुओं का धर्षण करते हुए शरीर में सोम का रक्षण करनेवाले बनें। यही वसुओं की प्राप्ति का मार्ग है। गृहास्थाश्रम में भी वीर्यरक्षण का ध्यान करते हुए सब ऐश्वयों के अधिष्ठान बनें। हमारा जीवन औरों को भी उचित प्ररेणा दे।

    सोमरक्षण द्वारा अंग-प्रत्यंग में रसवाला यह उपासक 'अंगिरा:' बनता है। यही अगले सूक्त का ऋषि है -

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    भाषार्थ

    (इन्द्र) हे जीवात्मन् ! (धृषत्) कामादि वासनाओं का धर्षण करता हुआ, (कलशे) शरीररूपी कलश में स्थित (सोमम्) वीर्य का (पिब) तू पान कर, (वृत्रहा) तू ने वृत्र भावनाओं का हनन कर दिया है, (शूर) हे शूर! हे पराक्रमशील ! (वसूनाम्) श्रेष्ठगुणों की प्राप्ति के (समरे) देवासुर संग्राम के निमित्त [तू पराक्रम कर]। (माध्यन्दिने) मध्याह्न काल के (सवने) सवन में (आ वृषस्व) शरीर में सोम सींच, (रयिष्ठानः) और सद्गुणरूपी सम्पत्तियों का तू अधिष्ठान बन, और (अस्मासु) हम में (रयिम्) सद्गुण सम्पत्ति (धेहि) धारण करा।

    टिप्पणी

    ["पुरुष निश्चय से यज्ञरूप है। २४ वर्षों की आयु तक उस का प्रातः सवन है। ४४ वर्षों की आयु तक उसका माध्यन्दिन सवन है; और ४८ वर्षों की आयु तक उसका तृतीय सवन है। इन आयुकालों में यदि उसे कामवासना आदि दुर्भावनाए प्रतप्त करें, सताए तो वह सद्गुणों का संकल्प करता हुआ, इस यज्ञमय जीवन का विलोप न करे" (यह संक्षिप्त भाव प्रदर्शित किया है, छान्दोग्य उपनिषद् के सन्दर्भ का; छान्दोग्य ३।१६)। व्याख्येय मन्त्र में "माध्यन्दिन सवन" का कथन हुआ है। जीवनयज्ञ में "माध्यन्दिनकाल" है ४४ वर्षों की आयु का काल, जब कि कामादि दुर्व्यसन व्यक्ति को संतप्त कर सकते हैं, और "देवासुर-समर" में देव विजयी होते हैं या असुर यह संशयास्पद हो जाता है। जायान्य रोगाक्रान्त व्यक्ति के जायान्य-दुष्परिणामों का हनन मन्त्र ४, ५ द्वारा हो गया है। तदनन्तर मन्त्र में रोगरहित हुए व्यक्ति की आत्मशक्ति को उद्-बोधित कर, अवशिष्ट जीवन में, उसे देवासुर संग्राम के लिये संनद्ध किया है। मन्त्र में सोम है वीर्य। उसका पान है "उर्ध्वरेतस्" होना। सोम है वीर्य-- इसकी लिये देखो। ग्रन्थकार का अथर्ववेदभाष्य (१४।१।१-५)। सोमाः = सोमन् ("मन्" प्रत्ययान्त +"सु”) जिस का अर्थ है उत्पत्ति। अंग्रेजी भाषा में वीर्य को "semen" कहते हैं। सोमन् और semen में श्रुतिसाम्य भी है, और अर्थसाम्य भी]।

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    विषय

    गण्डमाला की चिकित्सा और सुसाध्य के लक्षण।

    भावार्थ

    हे (इन्द्र) बलवान् जीव ! तू (कलशे) अपने देह के कलश भाग अर्थात् ग्रीवा से लेकर नाभि तक के भाग में (धृषत्) बाह्य रोगों के विनाशकारी बल से युक्त होकर (वसूनाम्) देह में बसने वाले प्राणों के (सम्-अरे) संग्राम में (वृत्र-हा) जीवन के विघ्नभूत रोग के नाशकारी (सोमम्) स्वच्छ वायु रूप अमृत का (पिब) पान कर। और हे (शूर) रोगनाशक जीव ! तू (माध्यन्दिने) दिन के मध्य काल के (सबने) सवन में बलिवैश्वदेव अतिथि यज्ञ आदि के अवसर पर स्वयं भी (आ-वृषस्व) सब प्रकार अन्न आदि खाकर पुष्ट हो। और (रयि-स्थानः) शरीर के धनस्वरूप रयि = अर्थात् प्राण में स्थिति प्राप्त करके (अस्मासु) हम इन्द्रियगण में भी (रयिम्) उस प्राण को (आ धेहि) प्रदान कर। इससे हम सब बलवान् नीरोग रहेंगे।

    टिप्पणी

    ‘रयि स्थानो’ इति पाठः, ऋ०॥

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    अथर्वा ऋषिः। अपचित-भिषग् देवता। १ विराड् अनुष्टुप्। ३, ४ अनुष्टुप्। २ परा उष्णिक्। ५ भुरिग् अनुष्टुप्। ६ त्रिष्टुप्। षडर्चं सूक्तम्॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Cure of Excrescences

    Meaning

    Bold and resolute Indra, virile and generous lover of life, drink the joyous soma of life in the cup of good health. Heroic warrior, in the battle of life for the winning of wealth, honour and excellence, you are breaker of the clouds of darkness and dispeller of dust. Come, join the mid-day session of yajna and bring us showers of wealth. Indeed, you yourself are the treasure centre of wealth and excellence. Bring us the wealth of health, honour and excellence, and freedom from disease. (The real cure of disease is prevention, to be Indra, potent virile by Brahmacharya upto twenty- five years, sexual discipline with continence as a married man and abstinence in old age.)

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    Subject

    Indrah

    Translation

    O resplendent one, O brave killer of evil enemy in the battle for treasures, may you drink the curative juice from the jug unhesitating. At the midday libation, may you drink yourself full. Being a store of riches, may you confirm riches in us.

    Comments / Notes

    MANTRA NO 7.81.2AS PER THE BOOK

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    Translation

    O Indra, the Almighty Divinity; Thou art fearless bold and the destroyer of all obstacles coming in the war of worldly affairs. Please protect Soma, the soul who is residing in the pitcher, the body and shower upon us Thy blessings in all the time of noon when we perform yajna Thou art the master of all wealth and so Brant us riches.

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    Translation

    O powerful soul, equipped with the power of avoiding diseases in the body from the neek to the navel, drink thou the pure air, the destroyer of disease that shortens life, in the battle of breaths that reside in the body. O disease-killing soul at the time of entertaining guests in mid-day, eat nice food and grow strong. Thyself possessing the riches of breath, grant us the same riches!

    Footnote

    Us: organs.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    ६−(धृषत्) ञिधृषा प्रागल्भ्ये-शतृ, छान्दसः शः। हे प्रगल्भ (पिब) (कलशे) अ० ३।१२।७। संसाररूपे घटे वर्तमानम् (सोमम्) अमृतरसम् (इन्द्र) हे परमैश्वर्यवन् जीव (वृत्रहा) शत्रुनाशकः (शूर) वीर (समरे) रणे (वसूनाम्) धनानां निमित्ते (माध्यन्दिने) अ० ७।७२।३। मध्याह्ने भवे (सवने) अ० ७।७२।३। काले स्थाने वा (आ) सर्वतः (वृषस्व) बली भव (रयिस्थानः) रायो धनानि तिष्ठन्ति यस्मिन्त्सः (रयिम्) धनम् (अस्मासु) (धेहि) धर ॥

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