अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 8/ मन्त्र 12
ऋषिः - भृग्वङ्गिराः
देवता - सर्वशीर्षामयापाकरणम्
छन्दः - अनुष्टुब्गर्भा ककुम्मती चतुष्पदोष्णिक्
सूक्तम् - यक्ष्मनिवारण सूक्त
59
उ॒दरा॑त्ते क्लो॒म्नो नाभ्या॒ हृद॑या॒दधि॑। यक्ष्मा॑णां॒ सर्वे॑षां वि॒षं निर॑वोचम॒हं त्वत् ॥
स्वर सहित पद पाठउ॒दरा॑त् । ते॒ । क्लो॒म्न: । नाभ्या॑: । हृद॑यात् । अधि॑ । यक्ष्मा॑णम् । सर्वे॑षाम् । वि॒षम् । नि: । अ॒वो॒च॒म् । अ॒हम् । त्वत् ॥१३.१२॥
स्वर रहित मन्त्र
उदरात्ते क्लोम्नो नाभ्या हृदयादधि। यक्ष्माणां सर्वेषां विषं निरवोचमहं त्वत् ॥
स्वर रहित पद पाठउदरात् । ते । क्लोम्न: । नाभ्या: । हृदयात् । अधि । यक्ष्माणम् । सर्वेषाम् । विषम् । नि: । अवोचम् । अहम् । त्वत् ॥१३.१२॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
समस्त शरीर के रोग नाश का उपदेश। इस सूक्त का मिलान अ० का० २ सूक्त ३३ से करो।
पदार्थ
(ते) तेरे (उदरात्) उदर से, (क्लोम्नः) फेफड़े से, (नाभ्याः) नाभी से और (हृदयात् अधि) हृदय से भी, (सर्वेषाम्) सब (यक्ष्माणाम्) क्षयरोगों के (विषम्) विष को (त्वत्) तुझ से (अहम्) मैंने (निः) निकालकर (अवोचम्) बता दिया है ॥१२॥
भावार्थ
जैसे उत्तम वैद्य निदान पूर्व बाहिरी और भीतरी रोगों का नाश करके मनुष्यों को हृष्ट-पुष्ट बनाता है, वैसे ही विद्वान् लोग विचारपूर्वक अविद्या को मिटा कर आनन्दित होते हैं ॥१॥ यही भावार्थ २ से २२ तक अगले मन्त्रों में जानो ॥
टिप्पणी
१२−(क्लोम्नः) अ० २।३३।३। फुप्फुसात्। पिपासास्थानात् (अधि) अपि। अन्यत् सुगमम् ॥
विषय
सर्वाङ्ग नीरोगता
पदार्थ
१. (बलास:) = शरीर के बल का नाशक कफ़-रोग (आस:) = बाहर फेंका हुआ (भवतु) = हो थूक के रूप में बाहर फेंक दिया जाए। (आमयत्) = रोगकारी पदार्थ (मूत्रं भवतु) = मूत्ररूप होकर बाहर आ जाए। (सर्वेषाम्) = सब (यक्ष्माणाम्) = रोगों के (विषम्) = विष को (अहम्) = मैं (त्वत्) = तेरे शरीर से (निर् अवोचम्) = बाहर निकालकर बताऊँ, अर्थात् तुझे नीरोग कर दूँ। २. (तव उदरात्) = तेरे उदर से (काहाबाहम्) = खाँसी आदि को लानेवाला (बिलम्) = फूटन रोग [कास आव] अङ्गों को कड़ कड़ानेवाला रोग (बहिः निर्द्रवतु) = बाहर निकल जाए। (ते उदरात्) = तेरे उदर से (क्लोन:) = कलेजे से, (नाभ्या:) = नाभि से और (हृदयात् अधि) = हदय से भी सब रोगों के विष को मैं तेरे शरीर से बाहर कर दूँ।
भावार्थ
कफ़-रोग थूक के रूप में, अन्य रोगकारी पदार्थ मूत्र के रूप में शरीर से पृथक् हो जाएँ। खाँसी करनेवाला फूटन रोग भी शरीर से पृथक् हो जाए। हमारा उदर, क्लोम, नाभि व हृदय सब स्वस्थ हों।
भाषार्थ
(ते) तेरे (उदरात्) पेट से, (क्लोम्नः) फेफड़े से, (नाभ्याः) नाभि से, (हृदयात् अधि) हृदय से, (सर्वेषाम् यक्ष्माणम्) सब प्रकार के यक्ष्मों के (विषम्) विष को (त्वत्) तुझ से (अहम्) मैंने (निर् अवोचम्) निकाल देने की विधि कह दी है।
विषय
शरीर के रोगों का निवारण।
भावार्थ
(ते उदरात्) तेरे पेट से (क्लोम्नः) ‘क्लोम’, कलेजे से, (नाभ्याः) नाभी से और (हृदयात् अधि) हृदय से भी (सर्वेषां यक्ष्माणां विषम्) समस्त प्रकार के रोगों के विष को (अहं त्वत् निर अवोचम्) मैं तेरे शरीर से बाहर कर दूं।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
भृग्वङ्गिराः ऋषिः। सर्वशीर्षामयापाकरणं देवता। १, ११, १३, १४, १६, २० अनुष्टुभः। १२ अनुष्टुब्गर्भाककुमती चतुष्पादुष्णिक। १५ विराट् अनुष्टुप्, २१ विराट पथ्या बृहती। २२ पथ्यापंक्तिः। द्वाविंशर्चं सूक्तम्॥
इंग्लिश (4)
Subject
Cure of Diseases
Meaning
I have spoken to you of the formula of the removal of the root and poison of all consumptive diseases from your abdomen, lungs, navel and the heart all over.
Translation
Out of, your stomach, out of your right lung, out of your navel and out of your heart, -the poison of all wasting diseases, I have expelled from you by my advice.
Translation
Let the disease run away from your belly from your lungs, from your novel and from your heart as I have uprooted the poison-tant of all consumptions from you.
Translation
Forth from thy belly and thy lungs, forth from thy belly and thy heart, I have evoked the poison of all wasting diseases out of thee.
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
१२−(क्लोम्नः) अ० २।३३।३। फुप्फुसात्। पिपासास्थानात् (अधि) अपि। अन्यत् सुगमम् ॥
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