अथर्ववेद - काण्ड 15/ सूक्त 15/ मन्त्र 1
सूक्त - अध्यात्म अथवा व्रात्य
देवता - दैवी पङ्क्ति
छन्दः - अथर्वा
सूक्तम् - अध्यात्म प्रकरण सूक्त
तस्य॒व्रात्य॑स्य ॥
स्वर सहित पद पाठतस्य॑ । व्रात्य॑स्य ॥१५.१॥
स्वर रहित मन्त्र
तस्यव्रात्यस्य ॥
स्वर रहित पद पाठतस्य । व्रात्यस्य ॥१५.१॥
अथर्ववेद - काण्ड » 15; सूक्त » 15; मन्त्र » 1
भाषार्थ -
(तस्य) उस (व्रात्यस्य) व्रतपति तथा प्राणिवर्गों के हितकारी परमेश्वर की [सृष्टि में]-