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अथर्ववेद - काण्ड 16/ सूक्त 9/ मन्त्र 1
सूक्त - प्रजापति
देवता - आर्ची अनुष्टुप्
छन्दः - यम
सूक्तम् - दुःख मोचन सूक्त
जि॒तम॒स्माक॒मुद्भि॑न्नम॒स्माक॑म॒भ्यष्ठां॒ विश्वाः॒ पृत॑ना॒ अरा॑तीः ॥
स्वर सहित पद पाठजि॒तम् । अ॒स्माक॑म् । उत्ऽभि॑न्नम् । अ॒स्माक॑म् । अ॒भि । अ॒स्था॒म् । विश्वा॑: । पृत॑ना: । अरा॑ती: ॥९.१॥
स्वर रहित मन्त्र
जितमस्माकमुद्भिन्नमस्माकमभ्यष्ठां विश्वाः पृतना अरातीः ॥
स्वर रहित पद पाठजितम् । अस्माकम् । उत्ऽभिन्नम् । अस्माकम् । अभि । अस्थाम् । विश्वा: । पृतना: । अराती: ॥९.१॥
अथर्ववेद - काण्ड » 16; सूक्त » 9; मन्त्र » 1
भाषार्थ -
(जितम्) जो जीता है वह (अस्माकम्) हमारा हो गया है, (उद्भिन्नम्) पृथिवी का उद्भेदन कर के जो वनोपवन हुए हैं वे (अस्माकम्) हमारे हो गये हैं, (विश्वाः) शत्रु की सब (अरातीः) अदानी अर्थात् कंजूस प्रजाओं, और (पृतनाः) सेनाओं पर (अभ्यष्ठाम्) मैं अधिष्ठित हुआ हूं, या उन के समक्ष विजयी रूप में खड़ा हूं।
टिप्पणी -
[मन्त्र में राजा की उक्ति है। अथवा जितम्, उद्भिन्नम् = भावेक्त, अर्थात् जीत हमारी हुई है, शत्रुदल का उद्भेदन हमने किया है। अभ्यष्ठाम् = अध्यष्ठाम्। यथा "स्वज श्वाभिष्ठितो दश" (अथर्व० ५।१४।१०), अभिष्ठित अर्थात् अधिष्ठित, पादाक्रान्त हुए सांप की तरह कीट। दश =डस, काट। दशन =दांत ]