Sidebar
अथर्ववेद - काण्ड 20/ सूक्त 122/ मन्त्र 1
रे॒वती॑र्नः सध॒माद॒ इन्द्रे॑ सन्तु तु॒विवा॑जाः। क्षु॒मन्तो॒ याभि॒र्मदे॑म ॥
स्वर सहित पद पाठरे॒वती॑: । न॒: । स॒ध॒ऽमादे॑ । इन्द्रे॑ । स॒न्तु॒ । तु॒विऽवा॑जा: ॥ क्षु॒ऽमन्त॑: । याभि॑: । मदे॑म ॥१२२.१॥
स्वर रहित मन्त्र
रेवतीर्नः सधमाद इन्द्रे सन्तु तुविवाजाः। क्षुमन्तो याभिर्मदेम ॥
स्वर रहित पद पाठरेवती: । न: । सधऽमादे । इन्द्रे । सन्तु । तुविऽवाजा: ॥ क्षुऽमन्त: । याभि: । मदेम ॥१२२.१॥
अथर्ववेद - काण्ड » 20; सूक्त » 122; मन्त्र » 1
भाषार्थ -
(नः) हमारी (रेवतीः) धनसम्पत्-वाली प्रजाएँ, (सधमादे) हमारे साथ उपासनायज्ञ में मिलकर उपासना की मस्ती में (तुविवाजाः) बहुत आध्यात्मिक-बल प्राप्त कर, (इन्द्रे सन्तु) परमेश्वर में आत्मसमर्पण करती रहें। (याभिः) जिन प्रजाओं द्वारा हम उपासक, (क्षुमन्तः) अन्नादि-सामग्री पाकर, (मदेम) प्रसन्न रहें। [क्षु=अन्नम् (निघं০ २.७)।]