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अथर्ववेद > काण्ड 20 > सूक्त 125

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  • अथर्ववेद - काण्ड 20/ सूक्त 125/ मन्त्र 1
    सूक्त - सुर्कीतिः देवता - इन्द्रः छन्दः - त्रिष्टुप् सूक्तम् - सूक्त-१२५

    अपे॑न्द्र॒ प्राचो॑ मघवन्न॒मित्रा॒नपापा॑चो अभिभूते नुदस्व। अपोदी॑चो॒ अप॑ शूराध॒राच॑ उ॒रौ यथा॒ तव॒ शर्म॒न्मदे॑म ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    अप॑ । इ॒न्द्र॒ । प्राच॑: । म॒घ॒ऽव॒न् । अ॒मित्रा॑न‌् । अप॑ । अपा॑च: । अ॒भि॒ऽभू॒ते॒ । नु॒द॒स्व॒ ॥ अप॑ । उदी॑च:। अप॑ । शू॒र॒ । अ॒ध॒राच॑: । उ॒रौ । यथा॑ । तव॑ । शर्म॑न् । मदे॑म ॥१२५.१॥


    स्वर रहित मन्त्र

    अपेन्द्र प्राचो मघवन्नमित्रानपापाचो अभिभूते नुदस्व। अपोदीचो अप शूराधराच उरौ यथा तव शर्मन्मदेम ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    अप । इन्द्र । प्राच: । मघऽवन् । अमित्रान‌् । अप । अपाच: । अभिऽभूते । नुदस्व ॥ अप । उदीच:। अप । शूर । अधराच: । उरौ । यथा । तव । शर्मन् । मदेम ॥१२५.१॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 20; सूक्त » 125; मन्त्र » 1

    भाषार्थ -
    (मघवन्) हे सम्पत्तिशाली, (इन्द्र) सम्राट् आप! हमारे (प्राचः) पूर्वदिशा के, (अमित्रान्) स्नेह न करनेवाले शत्रुओं को (अप नुदस्व) परे धकेलिये। (अभिभूते) हे पराभव करनेवाले! (अपाचः) पश्चिम दिशा के अमित्रों को (अप) परे धकेलिये। (उदीचः) उत्तर दिशा के अमित्रों को (अप) परे धकेलिये। (शूर) हे पराक्रमी! (अधराचः) दक्षिण दिशा के अमित्रों को (अप) परे धकेलिए, (यथा) जिस प्रकार कि (तव) आपके (उरौ शर्मन्) विस्तृत राष्ट्र में हम प्रजाजन (मदेम) प्रसन्न तथा आनन्दित रहें। [शर्मन्=गृहम् (निघं০ २.४), अर्थात् राष्ट्ररूपी गृह।]

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