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अथर्ववेद - काण्ड 20/ सूक्त 43/ मन्त्र 1
भि॒न्धि विश्वा॒ अप॒ द्विषः॒ बाधो॑ ज॒ही मृधः॑। वसु॑ स्पा॒र्हं तदा भ॑र ॥
स्वर सहित पद पाठभि॒न्धि । विश्वा॑: । अप॑ । द्विष॑: । परि॑ । बाध॑: । ज॒हि । मृध॑: ॥ वसु॑ । स्पा॒र्हम् । तत । आ । भ॒र॒ ॥४३.१॥
स्वर रहित मन्त्र
भिन्धि विश्वा अप द्विषः बाधो जही मृधः। वसु स्पार्हं तदा भर ॥
स्वर रहित पद पाठभिन्धि । विश्वा: । अप । द्विष: । परि । बाध: । जहि । मृध: ॥ वसु । स्पार्हम् । तत । आ । भर ॥४३.१॥
अथर्ववेद - काण्ड » 20; सूक्त » 43; मन्त्र » 1
भाषार्थ -
हे परमेश्वर! (विश्वाः) सब प्रकार की (द्विषः) हमारी द्वेषभावनाओं को (भिन्धि) छिन्न-भिन्न कर दीजिए, (अप) और उन्हें हम से अलग कर दीजिए। (बाधः) सब विघ्न-बाधाओं को (परि) पूर्णरूप से (अप) हमसे अलग कर दीजिए। देवासुर-संग्राम में (मृधः) संग्रामकारी कामादि शत्रुओं का (जहि) हनन कर दीजिए। (स्पार्हं तत् वसु) स्पृहणीय वह मोक्ष-धन (आ भर) हमें प्राप्त कराइए।
टिप्पणी -
[बाधः=योगाभ्यास में बाधाओं अर्थात् विक्षेपों को योगदर्शन में “अन्तराय” कहा है। इन अन्तरायों के कारण चित्त विक्षिप्त हो जाता है। ओ३म् का जप तथा परमेश्वरीय भावनाओं द्वारा ये अन्तराय हट जाते हैं। ये अन्तराय निम्नलिखित हैं। यथा—व्याधि, स्त्यान (चित्त का भारीपन), संशय, प्रमाद (समाधि के साधनों का अनुष्ठान न करना), आलस्य, अविरति (विषयों से वैराग्य का न होगा), भ्रान्तिदर्शन, अलब्धभूमिकत्व (किसी भी समाधि-भूमि तक न पहुँच पाना), अनवस्थितत्व (चित्त की चञ्चलता), (योग০ १.३०-३२)।]