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अथर्ववेद - काण्ड 20/ सूक्त 59/ मन्त्र 1
उदु॒ त्ये मधु॑ मत्त॒मा गिर॒ स्तोमा॑स ईरते। स॑त्रा॒जितो॑ धन॒सा अक्षि॑तोतयो वाज॒यन्तो॒ रथा॑ इव ॥
स्वर सहित पद पाठउत् । ऊं॒ इति॑ । त्ये । मधु॑मत्ऽतमा: । गिर॑: । स्तोमा॑स: । ई॒र॒ते॒ ॥ स॒त्रा॒ऽजित॑: । ध॒न॒सा: । अक्षि॑तऽऊतय: । वा॒ज॒ऽयन्त॑: । रथा॑:ऽइव ॥५९.१॥
स्वर रहित मन्त्र
उदु त्ये मधु मत्तमा गिर स्तोमास ईरते। सत्राजितो धनसा अक्षितोतयो वाजयन्तो रथा इव ॥
स्वर रहित पद पाठउत् । ऊं इति । त्ये । मधुमत्ऽतमा: । गिर: । स्तोमास: । ईरते ॥ सत्राऽजित: । धनसा: । अक्षितऽऊतय: । वाजऽयन्त: । रथा:ऽइव ॥५९.१॥
अथर्ववेद - काण्ड » 20; सूक्त » 59; मन्त्र » 1
भाषार्थ -
(त्ये) वे प्रसिद्ध (गिरः) वैदिक स्तुतिवाणियाँ, और (मधुमत्तमाः) अत्यन्त मधुर (स्तोमासः) सामगान, (उद्) उच्चस्वर में, हे परमेश्वर! आपके प्रति (ईरते) प्रेरित किये जा रहे हैं, (इव) जैसे कि (सत्राजितः) वस्तुतः विजय करानेवाले, (धनसाः) व्यापार द्वारा धन की प्राप्ति करानेवाले, (अक्षितोतयः) न क्षीण होनेवाली रक्षा प्रदान करनेवाले, (वाजयन्तः) गति और वेग के साधनभूत (रथाः) विमान-रथ, (उद् ईरते) ऊँचे आकाश में प्रेरित किये जाते हैं।