Sidebar
अथर्ववेद - काण्ड 6/ सूक्त 59/ मन्त्र 1
अ॑न॒डुद्भ्य॒स्त्वं प्र॑थ॒मं धे॒नुभ्य॒स्त्वम॑रुन्धति। अधे॑नवे॒ वय॑से॒ शर्म॑ यच्छ॒ चतु॑ष्पदे ॥
स्वर सहित पद पाठअ॒न॒डुत्ऽभ्य॑: । त्वम् । प्र॒थ॒मम् । धे॒नुऽभ्य॑:। त्वम् । अ॒रु॒न्ध॒ति॒ ।अधे॑नवे । वय॑से । शर्म॑ । य॒च्छ॒ । चतु॑:ऽपदे ॥५९.१॥
स्वर रहित मन्त्र
अनडुद्भ्यस्त्वं प्रथमं धेनुभ्यस्त्वमरुन्धति। अधेनवे वयसे शर्म यच्छ चतुष्पदे ॥
स्वर रहित पद पाठअनडुत्ऽभ्य: । त्वम् । प्रथमम् । धेनुऽभ्य:। त्वम् । अरुन्धति ।अधेनवे । वयसे । शर्म । यच्छ । चतु:ऽपदे ॥५९.१॥
अथर्ववेद - काण्ड » 6; सूक्त » 59; मन्त्र » 1
भाषार्थ -
(अरुन्धति) हे घावों को ठीक करने वाली ! (त्वम्) तू (प्रथमम्) प्रथम (अनडुद्भ्यः) शकट के वहन करने वाले बैलों के लिये, (त्वम्) तू (धेनुभ्य:) दूध देने वाली गौओं के लिये, (अधेनवे) न दूध देने वाली (वयसे) छोटी आयु वाली गौ के लिये, (चतुष्पदे) तथा अन्य चौपाए पशु के लिये (शर्म) सुख (यच्छ) प्रदान कर।
टिप्पणी -
[अरुन्धति= अरूंषि धयति पिबतीति, तत्सम्बुद्धौ। घावों को पी कर सुखा देने वाली, स्वस्थ कर देने वाली औषध [सहदेवी, मन्त्र २]।