Sidebar
अथर्ववेद - काण्ड 6/ सूक्त 59/ मन्त्र 3
वि॒श्वरू॑पां सु॒भगा॑म॒च्छाव॑दामि जीव॒लाम्। सा नो॑ रु॒द्रस्या॒स्तां हे॒तिं दू॒रं न॑यतु॒ गोभ्यः॑ ॥
स्वर सहित पद पाठवि॒श्वऽरू॑पाम् । सु॒ऽभगा॑म् । अ॒च्छ॒ऽआव॑दामि । जी॒व॒लाम् । सा । न॑: । रु॒द्रस्य॑ । अ॒स्ताम् । हे॒तिम् । दू॒रम् । न॒य॒तु॒ । गोभ्य॑: ॥५९.३॥
स्वर रहित मन्त्र
विश्वरूपां सुभगामच्छावदामि जीवलाम्। सा नो रुद्रस्यास्तां हेतिं दूरं नयतु गोभ्यः ॥
स्वर रहित पद पाठविश्वऽरूपाम् । सुऽभगाम् । अच्छऽआवदामि । जीवलाम् । सा । न: । रुद्रस्य । अस्ताम् । हेतिम् । दूरम् । नयतु । गोभ्य: ॥५९.३॥
अथर्ववेद - काण्ड » 6; सूक्त » 59; मन्त्र » 3
भाषार्थ -
(विश्वरूपाम्) नाना रूपों वाली (सुभगाम्) उत्तम ऐश्वर्य प्रदान करने वाली, (जीवलाम्) जीवन देने वाली, [सहदेवी औषध] को, (अच्छ) तुम्हारे प्रति, (आवदामि) मैं कहता हूँ। (सा) वह ओषधि (रुद्रस्य) रुलाने वाली विद्युत् के (अस्ताम्) फेंके गए, (हेतिम्) हनन करने वाले वज्र को (न:) हमारी (गोभ्यः) गोओं से, (दूर) दूर (नयतु) ले जाय, रखें। अर्थात् गोशाला का निर्माण इस प्रकार का होना चाहिये कि उस पर विद्युत् का प्रभाव न हो सके।
टिप्पणी -
[सहदेवी ओषधि दो प्रकार की होती है सहदेवी और सहदेवी बड़ी। सहदेवी के फूल बैंगनी रंग के और बीज काली जीरी के समान होते हैं। इस का पौधा त्रिदोष, क्षय तथा दमा खांसी में लाभदायक होता है, तथा फूल, ज्वर नाशक होते हैं। "बनौषधि चन्द्रोदय" चन्द्रराज भण्डारी, ज्ञान मन्दिर, भानपुरा। यह स्वास्थ्य तथा जीवनरूपी ऐश्वर्य प्रदान करती तथा गौओं को नीरोग करती है]।