Loading...
अथर्ववेद > काण्ड 6 > सूक्त 141

काण्ड के आधार पर मन्त्र चुनें

  • अथर्ववेद का मुख्य पृष्ठ
  • अथर्ववेद - काण्ड 6/ सूक्त 141/ मन्त्र 2
    सूक्त - विश्वामित्र देवता - अश्विनौ छन्दः - अनुष्टुप् सूक्तम् - गोकर्णलक्ष्यकरण सूक्त

    लोहि॑तेन॒ स्वधि॑तिना मिथु॒नं कर्ण॑योः कृधि। अक॑र्तामश्विना॒ लक्ष्म॒ तद॑स्तु प्र॒जया॑ ब॒हु ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    लोहि॑तेन । स्वऽधि॑तिना । मि॒थु॒नम् । कर्ण॑यो: । कृ॒धि॒ । अक॑र्ताम्‌ । अ॒श्विना॑ । लक्ष्म॑ । तत् । अ॒स्तु॒ । प्र॒ऽजया॑ । ब॒हु ॥१४१.२॥


    स्वर रहित मन्त्र

    लोहितेन स्वधितिना मिथुनं कर्णयोः कृधि। अकर्तामश्विना लक्ष्म तदस्तु प्रजया बहु ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    लोहितेन । स्वऽधितिना । मिथुनम् । कर्णयो: । कृधि । अकर्ताम्‌ । अश्विना । लक्ष्म । तत् । अस्तु । प्रऽजया । बहु ॥१४१.२॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 6; सूक्त » 141; मन्त्र » 2

    पदार्थ -
    [हे आचार्य !] (लोहितेन) प्रकाश के साथ और (स्वधितिना) और आत्मधारण सामर्थ्य के साथ (कर्णयोः) हमारे दोनों कानों में (मिथुनम्) विज्ञान (कृधि) कर। (अश्विना) कामों में व्याप्तिवाले माता-पिता ने (लक्ष्म) [हम में] शुभ लक्षण (अकर्ताम्) किया है (तत्) वह [शुभलक्षण] (प्रजया) सन्तान के साथ (बहु) अधिक समृद्ध (अस्तु) होवे ॥२॥

    भावार्थ - जहाँ गुणी माता-पिता और आचार्य बालकों के शिक्षक होते हैं, वहाँ बालक गुणी धनी और बली होते हैं ॥२॥

    इस भाष्य को एडिट करें
    Top