Sidebar
अथर्ववेद - काण्ड 20/ सूक्त 82/ मन्त्र 2
शिक्षे॑य॒मिन्म॑हय॒ते दि॒वेदि॑वे रा॒य आ कु॑हचि॒द्विदे॑। न॒हि त्वद॒न्यन्म॑घवन्न॒ आप्यं॒ वस्यो॒ अस्ति॑ पि॒ता च॒न ॥
स्वर सहित पद पाठशिक्षे॑यम् । इत् । म॒ह॒ऽय॒ते । दि॒वेऽदि॑वे । रा॒य: । आ । कु॒ह॒चि॒त्ऽविदे॑ ॥ न॒हि । त्वत् । अ॒न्यत् । म॒घ॒ऽव॒न् । न॒: । आप्य॑म् । वस्य॑: । अस्ति॑ । पि॒ता । च॒न ॥८२.२॥
स्वर रहित मन्त्र
शिक्षेयमिन्महयते दिवेदिवे राय आ कुहचिद्विदे। नहि त्वदन्यन्मघवन्न आप्यं वस्यो अस्ति पिता चन ॥
स्वर रहित पद पाठशिक्षेयम् । इत् । महऽयते । दिवेऽदिवे । राय: । आ । कुहचित्ऽविदे ॥ नहि । त्वत् । अन्यत् । मघऽवन् । न: । आप्यम् । वस्य: । अस्ति । पिता । चन ॥८२.२॥
अथर्ववेद - काण्ड » 20; सूक्त » 82; मन्त्र » 2
विषय - प्रभु ही पिता हैं, प्रभु ही बन्धु हैं
पदार्थ -
१. (कुहचिद् विदे) = [यत्र कुत्र चिद् विद्यमानाय]-जहाँ कहीं भी [किसी भी देश में] निवास करनेवाले (महयते) = प्रभु के पूजक के लिए (दिवे-दिवे) = प्रतिदिन (इत्) = निश्चय से (राय:) = धनों को (आशिक्षेयम्) = सर्वथा देनेवाला बनूं। २. हे (मघवन्) = ऐश्वर्यशालिन् प्रभो! (त्वद् अन्यत्) = आपसे भिन्न (न:) = हमारा (आप्यम्) = बन्धु (नहि अस्ति) = नहीं है। आपसे भिन्न (वस्य:) = प्रशस्त पिता चन पिता भी नहीं है। प्रभु ही हमारे पिता हैं, प्रभु ही बन्धु हैं। प्रभु-प्रदत्त धनों को हम प्रभु के उपासकों के लिए ही देनेवाले हों।
भावार्थ - दैशिक भेदभावों को छोड़कर हम सब प्रभु के उपासकों के लिए धनों को देनेवाले हों। प्रभु को ही पिता व बन्धु जानें। प्रभु को ही सब धनों का दाता समझें। प्रभु को पिता व बन्धु जाननेवाला यह व्यक्ति शान्त जीवनवाला 'शंयु' होता है। यह प्रभु का उपासन करता हुआ कहता है -
इस भाष्य को एडिट करें