अथर्ववेद - काण्ड 20/ सूक्त 26/ मन्त्र 4
यु॒ञ्जन्ति॑ ब्र॒ध्नम॑रु॒षं चर॑न्तं॒ परि॑ त॒स्थुषः॑। रोच॑न्ते रोच॒ना दि॒वि ॥
स्वर सहित पद पाठयु॒ञ्जन्ति॑ । ब्र॒ध्नम् । अ॒रु॒षम् । चर॑न्तम् । परि॑ । त॒स्थुष॑: । रोच॑न्ते । रो॒च॒ना । दि॒वि ॥२६.४॥
स्वर रहित मन्त्र
युञ्जन्ति ब्रध्नमरुषं चरन्तं परि तस्थुषः। रोचन्ते रोचना दिवि ॥
स्वर रहित पद पाठयुञ्जन्ति । ब्रध्नम् । अरुषम् । चरन्तम् । परि । तस्थुष: । रोचन्ते । रोचना । दिवि ॥२६.४॥
अथर्ववेद - काण्ड » 20; सूक्त » 26; मन्त्र » 4
विषय - राजा और ईश्वर का वर्णन
भावार्थ -
विद्वान् पुरुप (व्रध्नम्) समस्त राष्ट्र को उत्तम व्यवस्था में बांधने वाला, (अरुषम्) अग्नि के समान देदीप्यमान् (तस्थुषः) वृक्ष पर्वतादि स्थित पदार्थों के ऊपर (चरन्तम्) वायु के समान बलपूर्वक विचरण करने वाले पुरुष को राजपद पर (युञ्जन्ति) नियुक्त करते हैं। (दिवि) उसके विजयोद्योग एवं विजय कार्य या स्वर्ग के समान उत्तम राज्य में (रोचना) नक्षत्रों के समान तेजस्वी का प्रजागण (रोचन्ते) आनन्द प्रसन्नता पूर्वक निवास करते हैं।
टिप्पणी -
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर - १-३ शुनःशेपः ४-६ मधुच्छन्दाः ऋषिः। इन्द्रो देवता। १६ गायत्र्यः षडृचं सूक्तम्॥
इस भाष्य को एडिट करें