अथर्ववेद - काण्ड 20/ सूक्त 48/ मन्त्र 1
अ॒भि त्वा॒ वर्च॑सा॒ गिरः॑ सि॒ञ्चन्ती॒राच॑र॒ण्यवः॑। अ॒भि व॒त्सं न धे॒नवः॑ ॥
स्वर सहित पद पाठअ॒भि । त्वा॒ । वर्च॑सा । गिर॒: । सिञ्च॑न्ती: । आच॑र॒ण्यव॑: ॥ अ॒भि । व॒त्सम् । न । धे॒नव॑: ॥४८.१॥
स्वर रहित मन्त्र
अभि त्वा वर्चसा गिरः सिञ्चन्तीराचरण्यवः। अभि वत्सं न धेनवः ॥
स्वर रहित पद पाठअभि । त्वा । वर्चसा । गिर: । सिञ्चन्ती: । आचरण्यव: ॥ अभि । वत्सम् । न । धेनव: ॥४८.१॥
अथर्ववेद - काण्ड » 20; सूक्त » 48; मन्त्र » 1
विषय - ईश्वरोपासना।
भावार्थ -
हे (इन्द्र) परमेश्वर (धेनवः) गौएं (वत्सम् अभि न) जिस प्रकार अपने प्रिय बच्छे के प्रति वेग से दौड़ती हुई आती हैं उसी प्रकार (आा चरण्यवः) सब ओर से आने वाली और समस्त दिशाओं में जाने वाली अर्थात् सब पक्षों में लगने वाली (गिरः) वेदवाणियां (सिञ्चन्तीः) ज्ञान-रस का प्रवाह बहाती हुईं भी (वर्चसा) तेज से, कान्ति मुग्ध होकर (त्वा अभि) तुमको ही प्राप्त होती हैं। अर्थात् परमेश्वर में इतना बल, पराक्रम, क्षमता है कि सब पक्षों में लगने वाली वाणियां भी परमेश्वर पर ही चरितार्थ होती हैं।
टिप्पणी -
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ऋषि | देवता | छन्द | स्वर - १-३ इन्द्रः। ४-६ सार्पराज्ञी सूर्यो वा देवता। गायत्र्यः। षडृचं सूक्तम्॥ ‘अभित्वा’ इति द्वाभ्यां सूक्ताभ्यां खिलौ इति बृहत् सर्वा०।
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