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ऋग्वेद मण्डल - 1 के सूक्त 5 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 1/ सूक्त 5/ मन्त्र 5
    ऋषिः - मधुच्छन्दाः वैश्वामित्रः देवता - इन्द्र: छन्दः - निचृद्गायत्री स्वरः - षड्जः

    सु॒त॒पाव्ने॑ सु॒ता इ॒मे शुच॑यो यन्ति वी॒तये॑। सोमा॑सो॒ दध्या॑शिरः॥

    स्वर सहित पद पाठ

    सु॒त॒ऽपाव्ने॑ । सु॒ताः । इ॒मे । शुच॑यः । य॒न्ति॒ । वी॒तये॑ । सोमा॑सः । दधि॑ऽआशिरः ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    सुतपाव्ने सुता इमे शुचयो यन्ति वीतये। सोमासो दध्याशिरः॥

    स्वर रहित पद पाठ

    सुतऽपाव्ने। सुताः। इमे। शुचयः। यन्ति। वीतये। सोमासः। दधिऽआशिरः॥

    ऋग्वेद - मण्डल » 1; सूक्त » 5; मन्त्र » 5
    अष्टक » 1; अध्याय » 1; वर्ग » 9; मन्त्र » 5
    Acknowledgment

    संस्कृत (1)

    विषयः

    जगत्स्थाः पदार्थाः किमर्थाः कीदृशाः केन पवित्रीकृताश्च सन्तीत्युपदिश्यते।

    अन्वयः

    इन्द्रेण परमेश्वरेण वायुसूर्य्याभ्यां वा यतः सुतपाव्ने वीतय इमे दध्याशिरः शुचयः सोमासः सर्वे पदार्था उत्पादिताः पवित्रीकृताः सन्ति, तस्मादेतान् सर्वे जीवा यन्ति प्राप्नुवन्ति॥५॥

    पदार्थः

    (सुतपाव्ने) सुतानामाभिमुख्येनोत्पादितानां पदार्थानां पावा रक्षको जीवस्तस्मै। अत्र आतो मनिन्क्वनिब्वनिपश्च इति वनिप्प्रत्ययः। (सुताः) उत्पादिताः (इमे) सर्वे (शुचयः) पवित्राः (यन्ति) यान्ति प्राप्नुवन्ति (वीतये) ज्ञानाय भोगाय वा। वी गतिव्याप्तिप्रजनकान्त्यसनखादनेषु अस्मात् मन्त्रे वृषेषपचमनविदभूवीरा उदात्तः अनेन क्तिन्प्रत्यय उदात्तत्वं च। (सोमासः) अभिसूयन्त उत्पद्यन्त उत्तमा व्यवहारा येषु ते। सोम इति पदनामसु पठितम्। (निघं०५.५) (दध्याशिरः) दधति पुष्णन्तीति दधयस्ते समन्तात् शीर्यन्ते येषु ते। दधातेः प्रयोगः आदॄगम० (अष्टा०३.२.१७१) अनेन किन् प्रत्ययः। शॄ हिंसार्थः, ततः क्विप्॥५॥

    भावार्थः

    अत्र श्लेषालङ्कारः। ईश्वरेण सर्वेषां जीवानामुपरि कृपां कृत्वा कर्मानुसारेण फलदानाय सर्वं कार्य्यं जगद्रच्यते पवित्रीयते चैवं पवित्रकारकौ सूर्य्यपवनौ च, तेन हेतुना सर्वे जडाः पदार्था जीवाश्च पवित्राः सन्ति। परन्तु ये मनुष्याः पवित्रगुणकर्मग्रहणे पुरुषार्थिनो भूत्वैतेभ्यो यथावदुपयोगं गृहीत्वा ग्राहयन्ति, त एव पवित्रा भूत्वा सुखिनो भवन्ति॥५॥

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    हिन्दी (4)

    विषय

    ये संसारी पदार्थ किसलिये उत्पन्न किये गये और कैसे हैं, ये किससे पवित्र किये जाते हैं, इस विषय का प्रकाश अगले मन्त्र में किया है-

    पदार्थ

    परमेश्वर ने वा वायु और सूर्य से जिस कारण (सुतपाव्ने) अपने उत्पन्न किये हुए पदार्थों की रक्षा करनेवाले जीव के (वीतये) ज्ञान वा भोग के लिये (दध्याशिरः) जो धारण करनेवाले उत्पन्न होते हैं, तथा (शुचयः) जो पवित्र (सोमासः) जिनसे अच्छे व्यवहार होते हैं, वे सब पदार्थ जिसने (सुताः) उत्पादन करके पवित्र किये हैं, इसी से सब प्राणिलोग इन को प्राप्त होते हैं॥५॥

    भावार्थ

    इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। ईश्वर ने सब जीवों पर कृपा करके उनके कर्मों के अनुसार यथायोग्य फल देने के लिये सब कार्य्यरूप जगत् को रचा और पवित्र किया है, तथा पवित्र करने करानेवाले सूर्य्य और पवन को रचा है, उसी हेतु से सब जड़ पदार्थ वा जीव पवित्र होते हैं। परन्तु जो मनुष्य पवित्र गुणकर्मों के ग्रहण से पुरुषार्थी होकर संसारी पदार्थों से यथावत् उपयोग लेते तथा सब जीवों को उनके उपयोगी कराते हैं, वे ही मनुष्य पवित्र और सुखी होते हैं॥५॥

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    विषय

    शुचि - दीप्त व नैरोग्य 

    पदार्थ

    १. गतमन्त्र के अनुसार जब इन्द्रियों पर वासनाओं का आक्रमण न होगा तब हम सोम की रक्षा कर पाएँगे । (इमे सुताः) - ये उत्पन्न हुए-हुए सोमकण (सुतपाव्ने) - उत्पन्न हुए-हुए सोमकणों की रक्षा करनेवाले के लिए और इन सोमकणों को अपने शरीर में ही व्याप्त करनेवाले के लिए [पी लेनेवाले के लिए] (शुचयः) - पवित्रता करनेवाले होते हैं । ये हमारे जीवनों को पवित्र वृत्तिवाला बनाते हैं । हम संसार में अपवित्र साधनों से धनादि अर्जन करनेवाले नहीं बनते । टेढ़े - मेढ़े साधनों के प्रयोग की ओर हमारा झुकाव ही नहीं होता । असंयम के साथ आर्थिक अपवित्रता बढ़ती है । 
    २. ये सोम (वीतये) [वी to shine] - चमकने के लिए  , प्रकाश के लिए (यन्ति) - हमें प्राप्त होते हैं । इनकी रक्षा के द्वारा हमारी ज्ञानाग्नि दीप्त होती है । 
    ३. (सोमासः) ये सोम (दध्याशिरः) [धत्ते इति दधि  , आशृणाति] - हमारे शरीरों का धारण करनेवाले होते हैं और शरीर में होनेवाले दोषों को अंग - प्रत्यंग से [आ - समन्तात्] नष्ट कर देते हैं । इस प्रकार ये सोम जहाँ मन में अपवित्र भावनाओं को नहीं आने देते वहाँ मस्तिष्क की ज्ञानाग्नि को दीप्त करते हैं और शरीरों को स्वस्थ बनाते हैं । 


     

    भावार्थ

    भावार्थ - हम सुतपावा बनें - उत्पन्न सोमकणों को शरीर में ही व्याप्त करनेवाले बनें । इससे हमारे मन शुद्ध होंगे  , मस्तिष्क शान्त व कान्त - ज्ञानदीप्त बनेंगे और शरीर बलसम्पन्न व दोषशून्य होंगे । 

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    विषय

    ये संसारी पदार्थ किसलिये उत्पन्न किये गये और कैसे हैं, ये किससे पवित्र किये जाते हैं, इस विषय का प्रकाश इस मन्त्र में किया है।

    सन्धिविच्छेदसहितोऽन्वयः

    इन्द्रेण परमेश्वरेण वायुसूर्य्याभ्यां वा यतः सुतपाव्ने वीतय इमे दध्याशिरः शुचयः सोमासः सर्वे पदार्था उत्पादिताः पवित्रीकृताः सन्ति, तस्मात् एतान् सर्वे जीवा यन्ति प्राप्नुवन्ति॥५॥

    पदार्थ

    (इन्द्रेण) परमेश्वरेण=परमेश्वर के द्वारा, (वायुसूर्य्याभ्याम्) (वा) वायु और सूर्य के द्वारा (यतः) क्योंकि (सुतपाव्ने) सुतानामाभिमुख्येनोत्पादितानां पदार्थानां पावा रक्षको जीवस्तस्मै=अपने उत्पन्न किये हुए पदार्थों की रक्षा करनेवाले जीव के, (वीतये) ज्ञानाय भोगाय वा=ज्ञान वा भोग के लिये, (इमे)=ये, (दध्याशिरः) दधति पुष्णन्तीति दधयस्ते समन्तात् शीर्यन्ते येषु ते= जो धारण और उत्पन्न करने वाले होते हैं, (शुचयः) पवित्राः= पवित्र, (सोमासः) अभिसूयन्त उत्पद्यन्त उत्तमा व्यवहारा येषु ते=जिनसे अच्छे व्यवहार होते हैं, वे सब पदार्थ, (सर्वे)=समस्त, (पदार्था)=पदार्थ, (उत्पादिताः)=उत्पन्न के हुए, (पवित्रीकृताः)=पवित्र किए हुए,  (सन्ति)=हैं, (तस्मात्)=इसलिए, (एतान्)=इन सबको (सर्वे)=समस्त, (जीवा)=जीव, (यन्ति) यान्ति प्राप्नुवन्ति=प्राप्त करते हैं॥५॥

    महर्षिकृत भावार्थ का भाषानुवाद

    इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। ईश्वर ने सब जीवों पर कृपा करके उनके कर्मों के अनुसार यथायोग्य फल देने के लिये सब कार्य्यरूप जगत् को रचा और पवित्र किया है और पवित्र करने करानेवाले सूर्य्य और पवन को रचा है। उसी हेतु से सब जड़ पदार्थ वा जीव पवित्र होते हैं। परन्तु जो मनुष्य पवित्र गुणकर्मों के ग्रहण से पुरुषार्थी होकर संसारी पदार्थों से ठीक प्रकार से उपयोग लेकर ग्रहण करते हैं, वे ही पवित्र होकर सुखी होते हैं॥५॥ 

    पदार्थान्वयः(म.द.स.)

    (इन्द्रेण) परमेश्वर के द्वारा (वा) या (वायुसूर्य्याभ्याम्) वायु और सूर्य के द्वारा (यतः) क्योंकि (सुतपाव्ने) अपने द्वारा उत्पन्न किये हुए पदार्थों की रक्षा करने वाले जीव के लिये, (वीतये) ज्ञान और भोग के लिये, (इमे) ये (दध्याशिरः) जो धारण और उत्पन्न करने वाले होते हैं, [ऐसे] (शुचयः) पवित्र (सोमासः) जिनसे अच्छे व्यवहार होते हैं, वे (सर्वे) समस्त (पदार्था) पदार्थ (उत्पादिताः) उत्पन्न के हुए और (पवित्रीकृताः) पवित्र किए हुए  (सन्ति) हैं। (तस्मात्) इसलिए (एतान्) इन सबको (सर्वे) समस्त (जीवा) जीव (यन्ति) प्राप्त करते हैं॥५॥

    संस्कृत भाग

    पदार्थः(महर्षिकृतः)- (सुतपाव्ने) सुतानामाभिमुख्येनोत्पादितानां पदार्थानां पावा रक्षको जीवस्तस्मै। अत्र आतो मनिन्क्वनिब्वनिपश्च इति वनिप्प्रत्ययः। (सुताः) उत्पादिताः (इमे) सर्वे (शुचयः) पवित्राः (यन्ति) यान्ति प्राप्नुवन्ति (वीतये) ज्ञानाय भोगाय वा। वी गतिव्याप्तिप्रजनकान्त्यसनखादनेषु अस्मात् मन्त्रे वृषेषपचमनविदभूवीरा उदात्तः अनेन क्तिन्प्रत्यय उदात्तत्वं च। (सोमासः) अभिसूयन्त उत्पद्यन्त उत्तमा व्यवहारा येषु ते। सोम इति पदनामसु पठितम्। (निघं०५.५) (दध्याशिरः) दधति पुष्णन्तीति दधयस्ते समन्तात् शीर्यन्ते येषु ते। दधातेः प्रयोगः आदॄगम० (अष्टा०३.२.१७१) अनेन किन् प्रत्ययः। शॄ हिंसार्थः, ततः क्विप्॥५॥
    विषयः- जगत्स्थाः पदार्थाः किमर्थाः कीदृशाः केन पवित्रीकृताश्च सन्तीत्युपदिश्यते।

    अन्वयः- इन्द्रेण परमेश्वरेण वायुसूर्य्याभ्याम् वा यतः सुतपाव्ने वीतय इमे दध्याशिरः शुचयः सोमासः सर्वे पदार्था उत्पादिताः पवित्रीकृताः सन्ति, तस्मात् एतान् सर्वे जीवा यन्ति प्राप्नुवन्ति॥५॥

    भावार्थः(महर्षिकृतः)- अत्र श्लेषालङ्कारः। ईश्वरेण सर्वेषां जीवानामुपरि कृपां कृत्वा कर्मानुसारेण फलदानाय सर्वं कार्य्यं जगद्रच्यते पवित्रीयते चैवं पवित्रकारकौ सूर्य्यपवनौ च, तेन हेतुना सर्वे जडाः पदार्था जीवाश्च पवित्राः सन्ति। परन्तु ये मनुष्याः पवित्रगुणकर्मग्रहणे पुरुषार्थिनो भूत्वैतेभ्यो यथावदुपयोगं गृहीत्वा ग्राहयन्ति, त एव पवित्रा भूत्वा सुखिनो भवन्ति॥५॥

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    विषय

    ईश्वर का वर्णन, राजा के कर्त्तव्य ।

    भावार्थ

    ( सुतपाव्ने ) ऐश्वर्यों के रक्षा करने वाले राजा के ( वीतये ) उपभोग के लिये ही ( इमे ) ये ( दध्याशिरः ) प्रजाओं को धारण पोषण करने वालों के आश्रय योग्य ( शुचयः ) शुद्ध, पवित्र, सदाचारी ( सोमासः ) राष्ट्र के पदाधिकारी गण ( यन्ति ) प्राप्त होते हैं। जीव के पक्ष में—उत्पन्न पदार्थों के रक्षा करने या उनको भोगने में समर्थ पुरुष के भोग के लिये ये समस्त पवित्र ऐश्वर्य प्राप्त होते हैं । इति नवमो वर्गः ॥

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    १–१० मधुच्छन्दा ऋषिः । इन्द्रो देवता ॥ गायत्र्यः । दशर्चं सूक्तम् ॥

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    या मंत्रात श्लेषालंकार आहे. ईश्वराने सर्व जीवांवर कृपा करून त्यांच्या कर्मानुसार यथायोग्य फळ देण्यासाठी सर्व कार्यजगत निर्माण केलेले आहे व पवित्र केलेले आहे. पवित्र करणारे व करविणारे सूर्य व पवन निर्माण केलेले आहेत. त्यामुळेच सर्व जड पदार्थ व जीव पवित्र होतात; परंतु जी माणसे पवित्र गुणकर्म स्वीकारून पुरुषार्थी बनून जगातील पदार्थांचा यथायोग्य उपयोग करून घेतात व सर्व जीवांना त्यांचा उपयोग करवून देतात, तीच माणसे पवित्र व सुखी होतात. ॥ ५ ॥

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    इंग्लिश (4)

    Meaning

    All these bright and pure creations of the soma- yajna of science and meditation, sweet and vitalising as nectar-sweet delicacies of milk and curds (are created by Indra through His light and wind energy) and flow for the beneficiary, humanity, for their pleasure, protection and promotion.

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    Subject of the mantra

    Why all these worldly substances were produced and how are these? Who has sanctified them? This subject has been elucidated in this mantra.

    Etymology and English translation based on Anvaya (logical connection of words) of Maharshi Dayanad Saraswati (M.D.S)-

    (indreṇa)=By God, (vā)=or, (vāyusūryyābhyām)=by air and Sun, (yataḥ=because, (sutapāvne)=living beings protect substances produced by them, (vītaya)=for knowledge and consumption, (ime)=these two. (dadhyāśiraḥ)=which are holders and producers, [aise]=such, (śucayaḥ)=sacrosanct, (somāsaḥ)= those with whom behave properly, (sarve)=all, (padārthā)=substances, (utpāditāḥ)=produced, [aura]=and, (pavitrīkṛtāḥ)=sanctified, (santi)=are, (tasmāt)=so, (etān)=to these, (sarve)=all, (jīvā)=living beings, (yanti)=obtain.

    English Translation (K.K.V.)

    By the God or by the wind and the Sun, because for the living being who preserves the things created by Him, for knowledge and enjoyment, these are those who possess and create. Such pious ones who have good habits, all things have been created and sanctified. That's why all living beings receive all of these.

    TranslaTranslation of gist of the mantra by Maharshi Dayanandtion of gist of the mantra by Maharshi Dayanand

    In this mantra there is paronomasia as figurative. God, having mercy on all living beings, has created and sanctified all the functional worlds and created the Sun and the wind to sanctify them in order to give due rewards according to their deeds. For that reason all inert matter or living beings are pure. But those people who, being virtuous by the adoption of holy virtues, take proper use of worldly objects and accept them, they become pure and happy.

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    Translation

    These heart-throbs, coming as prayers, are sweet expressions of our gratitude and devotion. Assuredly, they will fetch blessings from merciful God for our enlightenment and prosperity.

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    Subject [विषय - स्वामी दयानन्द]

    How are these things of the world, what is their purpose and how are they purified is taught in the fifth Mantra.

    Translation [अन्वय - स्वामी दयानन्द]

    (1) God has created and purified all these objects of the world which are perishable, for the enjoyment and knowledge of the souls who protect them by proper use. They enjoy them. (2) The sun and the air also purify all these objects of the world. It is they that make them more useful.

    Commentator's Notes [पदार्थ - स्वामी दयानन्द]

    N/A

    Purport [भावार्थ - स्वामी दयानन्द]

    It is God who out of Kindness, creates this world for giving fruits of the actions performed by the souls. It is that absolutely Pure God Who purifies the world and the souls through the sun and the air. But only those persons who make proper use of them and are industrious in acquiring virtues themselves and prompt others also to do so, become pure and happy.

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    हिंगलिश (1)

    Subject

    Importance of R&D अनुसंधान का महत्व

    Word Meaning

    (सोमासो दध्याशिर:) अनुसंधान के ज्ञान से (सुतपाव्ने सुता) उत्पन्न हो कर सुख समृद्धि के साधनों की(सोमासो दध्याशिर:) नदियां बह चलती हैं. Results of Research and development (सुतपाव्ने सुता) create a running stream of products & processes for wellbeing.

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