ऋग्वेद - मण्डल 1/ सूक्त 68/ मन्त्र 6
यस्तुभ्यं॒ दाशा॒द्यो वा॑ ते॒ शिक्षा॒त्तस्मै॑ चिकि॒त्वान्र॒यिं द॑यस्व ॥
स्वर सहित पद पाठयः । तुभ्य॑म् । दाशा॑त् । यः । वा॒ । ते॒ । शिक्षा॑त् । तस्मै॑ । चि॒कि॒त्वान् । र॒यिम् । द॒य॒स्व॒ ॥
स्वर रहित मन्त्र
यस्तुभ्यं दाशाद्यो वा ते शिक्षात्तस्मै चिकित्वान्रयिं दयस्व ॥
स्वर रहित पद पाठयः। तुभ्यम्। दाशात्। यः। वा। ते। शिक्षात्। तस्मै। चिकित्वान्। रयिम्। दयस्व ॥
ऋग्वेद - मण्डल » 1; सूक्त » 68; मन्त्र » 6
अष्टक » 1; अध्याय » 5; वर्ग » 12; मन्त्र » 6
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अष्टक » 1; अध्याय » 5; वर्ग » 12; मन्त्र » 6
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भाष्य भाग
संस्कृत (1)
विषयः
पुनस्तौ कीदृशावित्युपदिश्यते ॥
अन्वयः
येनेश्वरेण विद्युता विश्वे प्रेषाः प्राप्यन्ते ऋतस्य धीतिर्विश्वायुश्च भवति तमाश्रित्य ये ऋतस्य मध्ये वर्त्तमाना विद्वांसोऽपांसि चक्रुः। य एतद्विद्यां तुभ्यं दाशाद्वा तव सकाशाद् गृह्णीयात्। यश्चिकित्वांस्ते तुभ्यं शिक्षां दाशाद् वा तव सकाशाद् गृह्णीयात्तस्मै स्वं रयिं दयस्व देहि ॥ ३ ॥
पदार्थः
(ऋतस्य) सत्यस्य विज्ञानस्य परमात्मनः कारणस्य वा (प्रेषाः) प्रेष्यन्ते ये प्रकृष्टमिष्यन्ते बोधसमूहास्ते (ऋतस्य) स्वरूपप्रवाहरूपेण सत्यस्य (धीतिः) धारणम् (विश्वायुः) विश्वं सर्वमायुर्यस्माद्यस्य वा (विश्वे) सर्वे (अपांसि) न्याय्यानि कर्माणि (चक्रुः) कुर्वन्ति (यः) (तुभ्यम्) ईश्वरोपासकाय धर्मपुरुषार्थयुक्ताय (दाशात्) पूर्णां विद्यां दद्यात् (यः) (वा) पक्षान्तरे (ते) तुभ्यम् (शिक्षात्) साध्वीं शिक्षां कुर्यात् (तस्मै) महात्मने (चिकित्वान्) ज्ञानवान् (रयिम्) सुवर्णादिधनम् (दयस्व) देहि ॥ ३ ॥
भावार्थः
अत्र श्लेषालङ्कारः मनुष्यैर्नहीश्वररचनया विना जडात्कारणात्किंचित्कार्यमुत्पत्तुं विनष्टुं च शक्यते। नह्याधारेण विनाऽऽधेयं स्थातुमर्हति। नहि कश्चित् कर्म्मणा विना स्थातुं शक्नोति ये विद्वांसः सन्तो विद्यादिशुभगुणान् ददति वा य एतेभ्यो गृह्णन्ति, तेषामेव सदा सत्कारः कर्त्तव्यो नान्येषामिति बोद्धव्यम् ॥ ३ ॥
हिन्दी (3)
विषय
फिर वे ईश्वर और विद्वान् कैसे हैं, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥
पदार्थ
जिस ईश्वर वा विद्युत् अग्नि से (विश्वे) सब (प्रेषाः) अच्छी प्रकार जिनकी इच्छा की जाती है, वे बोधसमूह को प्राप्त होते हैं (ऋतस्य) सत्य विज्ञान तथा कारण का (धीतिः) धारण और (विश्वायुः) सब आयु प्राप्त होती है, उसका आश्रय करके जो (ऋतस्य) स्वरूप प्रवाह से सत्य के बीच वर्त्तमान विद्वान् लोग (अपांसि) न्याययुक्त कामों को (चक्रुः) करते हैं (यः) वा मनुष्य इस विद्या को (तुभ्यम्) ईश्वरोपासना, धर्म, पुरुषार्थयुक्त मनुष्य के लिये (दाशात्) देवे वा उससे ग्रहण करे (यः) जो (चिकित्वान्) ज्ञानवान् मनुष्य (ते) तेरे लिये (शिक्षात्) शिक्षा करे वा तुझ से शिक्षा लेवे (तस्मै) उसके लिये आप (रयिम्) सुवर्णादि धन को (दयस्व) दीजिये ॥ ३ ॥
भावार्थ
इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। मनुष्यों को ऐसा जानना चाहिये ईश्वर की रचना के विना जड़ कारण से कुछ भी कार्य उत्पन्न वा नष्ट होने तथा आधार के विना आधेय भी स्थित होने को समर्थ नहीं हो सकता और कोई मनुष्य कर्म से विना क्षण भर भी स्थित नहीं हो सकता। जो विद्वान् लोग विद्या आदि उत्तम गुणों को अन्य सज्जनों के लिये देते तथा उनसे ग्रहण करते हैं, उन्हीं दोनों का सत्कार करें, औरों का नहीं ॥ ३ ॥
विषय
ऋत
पदार्थ
१. हे प्रभो ! आपकी कृपा से हमारे जीवनों में सदा (ऋतस्य) = ऋत की, सत्य की ही (प्रेषाः) = प्रेरणाएँ प्राप्त हों । हम अन्तः स्थित आपसे दी जानेवाली सत्य की प्रेरणाओं को सुनें । हम (ऋतस्य धीतिः) = ऋत का ध्यान व पान करनेवाले बनें । हमारा जीवन ऋतमय हो । अनृत को छोड़कर हम सत्य को प्राप्त करें । (विश्वायुः) = आप ही हमें सम्पूर्ण जीवन को प्राप्त करानेवाले हैं । २. आपमें ही (विश्वे) = सब (अपांसि) = कर्मों को (चक्रः) = करते हैं - “तस्मिन्नपो मातरिश्वा दधाति” - जीव प्रभु में ही कर्मों को धारण करता है । वस्तुतः क्रियामात्र प्रभु की शक्ति से हो रही है, जीव को अज्ञानवश कर्तृत्व का अहंकार हो जाता है । ज्ञानी पुरुष तो सब कर्मों को प्रभु - अर्पण करके ही संसार में चलते हैं । ३. हे प्रभो । (यः) = जो भी (तुभ्यम् दाशात्) = आपके प्रति अपने को दे डालता है, (वा यः) = या जो (ते शिक्षात्) = आपसे शक्तिसम्पन्न होने की कामना करता है अथवा आपसे ज्ञान ग्रहण करना चाहता है (तस्मै) = उसके लिए (चिकित्वान्) = पूर्ण ज्ञानी होते हुए आप (रयिम्) = धनों को (दयस्व) = दीजिए [दय - दान] । आप अपने ज्ञान से उसके लिए क्या हितकारक है, यह जानते ही हैं । बस, उसी हितकर धन को आप शरणागत व्यक्ति को प्राप्त कराइए ।
भावार्थ
भावार्थ - प्रभुकृपा से हमारा जीवन ऋतमय हो । हम प्रभु में स्थित होकर कार्य करनेवाले बनें । हम प्रभु के प्रति अपना अर्पण करें । प्रभु हमें आवश्यक धन अवश्य प्राप्त कराएँगे ।
विषय
विषय (भाषा)- फिर वे ईश्वर और विद्वान् कैसे हैं, इस विषय का उपदेश इस मन्त्र में किया है ॥
सन्धिविच्छेदसहितोऽन्वयः
सन्धिच्छेदसहितोऽन्वयः- येन ईश्वरेण विद्युता विश्वे प्रेषाः प्राप्यन्ते ऋतस्य धीतिः विश्वायुः च भवति तम् आश्रित्य ये ऋतस्य मध्ये वर्त्तमाना विद्वांसः अपांसि चक्रुः। य एतत् विद्यां तुभ्यं दाशाद् वा तव सकाशाद् गृह्णीयात्। यः चिकित्वान् ते {शिक्षात्} तुभ्यं शिक्षां दाशाद् वा तव सकाशाद् गृह्णीयात् तस्मै स्वं रयिं दयस्व देहि ॥३॥
पदार्थ
पदार्थः- (येन)=जिस, (ईश्वरेण)=ईश्वर द्वारा और (विद्युता) =आकाशीय विद्युत् द्वारा, (विश्वे) सर्वे=समस्त, (प्रेषाः) प्रेष्यन्ते ये प्रकृष्टमिष्यन्ते बोधसमूहास्ते= जिनकी प्रकृष्ट रूप से कामना की जाती है, उनका ज्ञान करानेवाले समूह, (प्राप्यन्ते)=प्राप्त कराये जाते हैं, (ऋतस्य) स्वरूपप्रवाहरूपेण सत्यस्य=सत्य के स्वरूप रूपी प्रवाह से, (धीतिः) धारणम्=धारण, (च)=और, (विश्वायुः) विश्वं सर्वमायुर्यस्माद्यस्य वा= समस्त आयुवाला, (भवति)=होता है। (तम्)=उसका, (आश्रित्य)=आश्रय लेकर, (ये) =जो, (ऋतस्य) सत्यस्य विज्ञानस्य परमात्मनः कारणस्य वा=सत्य स्वरूप विशेष ज्ञानवाले अथवा परमेश्वर के कारणों के, (मध्ये) =मध्य में, (वर्त्तमाना)=उपस्थित, (विद्वांसः)=विद्वान् लोग, (अपांसि) न्याय्यानि कर्माणि=न्याय पूर्वक कर्मों को, (चक्रुः) कुर्वन्ति=करते हैं। (यः)=जो, (एतत्)=इस, (विद्याम्)=विद्या को, (तुभ्यम्)=तुम्हारे लिये, (दाशात्) पूर्णां विद्यां दद्यात्=पूर्ण विद्या देता है, (वा) पक्षान्तरे=अथवा, (तव) =तुम्हारी, (सकाशाद्)=समीपता से, (गृह्णीयात्)=ग्रहण करता है, (यः)=जो, (चिकित्वान्) ज्ञानवान् = ज्ञानवान्, (ते) तुभ्यम्= तुम्हारे लिये, {शिक्षात्} साध्वीं शिक्षां कुर्यात्=उत्तम शिक्षा देता है, (तुभ्यम्) ईश्वरोपासकाय धर्मपुरुषार्थयुक्ताय=ईश्वर के उपासक के लिये और धर्म व पुरुषार्थ से युक्त के लिये, (शिक्षाम्)= शिक्षा, (वा) पक्षान्तरे =अथवा, (दाशात्) पूर्णां विद्यां दद्यात्=पूर्ण विद्या देता है। (तव)=तुम्हारी, (सकाशाद्)=समीपता से, (गृह्णीयात्)= ग्रहण करता है। (तस्मै) महात्मने= उच्च विचार वाले, (स्वम्) =सम्पत्ति, (रयिम्) सुवर्णादिधनम् = सुवर्ण आदि धन को, (दयस्व) देहि=दीजिये॥३॥
महर्षिकृत भावार्थ का भाषानुवाद
महर्षिकृत भावार्थ का अनुवादक-कृत भाषानुवाद- इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। मनुष्यों के द्वारा ईश्वर की रचना के विना जडता के कारण से कोई भी उत्पत्ति और विनाश का कार्य नहीं हो सकता है। धारण किये विना आधेय स्थापित करने में समर्थ नहीं हो सकता है और किसी कर्म के विना स्थित नहीं किया जा सकता है। जो विद्वान् होते हुए विद्या आदि शुभ गुणों को देते हैं और जो इन्हें ग्रहण करते हैं, उनका ही सदा सत्कार करना चाहिए, अन्यों का नहीं, ऐसा जानना चहिए ॥३॥ (ऋग्वेद ०१.६८.०३)
पदार्थान्वयः(म.द.स.)
पदार्थान्वयः(म.द.स.)- (येन) जिस (ईश्वरेण) ईश्वर के द्वारा और (विद्युता) आकाशीय विद्युत् द्वारा (विश्वे) समस्त [वस्तुएँ], (प्रेषाः) जिनकी प्रकृष्ट रूप से कामना की जाती है, उनका ज्ञान करानेवाले समूह (प्राप्यन्ते) प्राप्त कराये जाते हैं। [वह] (ऋतस्य) सत्य के स्वरूपरूपी प्रवाह से (धीतिः) धारण किये जानेवाला (च) और (विश्वायुः) समस्त आयुवाला (भवति) होता है। (तम्) उसका (आश्रित्य) आश्रय लेकर (ये) जो (ऋतस्य) सत्य स्वरूप विशेष ज्ञानवाले अथवा परमेश्वर के कारणों के (मध्ये) मध्य में (वर्त्तमाना) उपस्थित (विद्वांसः) विद्वान् लोग (अपांसि) न्याय पूर्वक कर्मों को (चक्रुः) करते हैं। (यः) जो (एतत्) इस (विद्याम्) विद्या को (तुभ्यम्) तुम्हारे लिये (दाशात्) पूर्ण रूप से देता है, (वा) अथवा (तव) तुम्हारी (सकाशाद्) समीपता से (गृह्णीयात्) ग्रहण करता है। (यः) जो (चिकित्वान्) ज्ञानवान् (ते) तुम्हारे लिये {शिक्षात्} उत्तम शिक्षा देता है। (तुभ्यम्) ईश्वर के उपासक के लिये और धर्म व पुरुषार्थ से युक्त के लिये (शिक्षाम्) शिक्षा (वा) अथवा (दाशात्) पूर्ण विद्या देता है। (तव) तुम्हारी (सकाशाद्) समीपता से (गृह्णीयात्) ग्रहण करता है। (तस्मै) उच्च विचारवाले के लिये (स्वम्) सम्पत्ति, (रयिम्) सुवर्ण आदि धन को (दयस्व) दीजिये॥३॥
संस्कृत भाग
स्वर सहित पद पाठ ऋ॒तस्य॑ । प्रेषाः॑ । ऋ॒तस्य॑ । धी॒तिः । वि॒श्वऽआ॑युः । विश्वे॑ । अपां॑सि । च॒क्रुः॒ ॥ यः । तुभ्य॑म् । दाशा॑त् । यः । वा॒ । ते॒ । शिक्षा॑त् । तस्मै॑ । चि॒कि॒त्वान् । र॒यिम् । द॒य॒स्व॒ ॥ विषयः- पुनस्तौ कीदृशावित्युपदिश्यते ॥ भावार्थः(महर्षिकृतः)- अत्र श्लेषालङ्कारः मनुष्यैर्नहीश्वररचनया विना जडात्कारणात्किंचित्कार्यमुत्पत्तुं विनष्टुं च शक्यते। नह्याधारेण विनाऽऽधेयं स्थातुमर्हति। नहि कश्चित् कर्म्मणा विना स्थातुं शक्नोति ये विद्वांसः सन्तो विद्यादिशुभगुणान् ददति वा य एतेभ्यो गृह्णन्ति, तेषामेव सदा सत्कारः कर्त्तव्यो नान्येषामिति बोद्धव्यम् ॥३॥
इंग्लिश (3)
Meaning
Agni, first impulse of creative intelligence, wielder of the laws of Truth and laws of evolution, life of the universe, all the forces of existence do your bidding and perform their action. Lord all percipient and omniscient, whosoever be intelligent and give away charity in homage to you or learn from your eternal Word and universal acts, bless him/her with the wealth of the world.
Subject [विषय - स्वामी दयानन्द]
The same subject is continued-
Translation [अन्वय - स्वामी दयानन्द]
Those learned persons who take shelter in God who is embodiment of Truth and gives life to all, by whom all divine virtues and knowledge are attained and do noble deeds are very fortunate. O learned persons who ever gives to thee who art a righteous man and devoted to God perfect knowledge and who ever being wise (Mahatma) gives thee good education, give to him gold and other forms of wealth.
Commentator's Notes [पदार्थ - स्वामी दयानन्द]
(ॠतस्य ) सत्यस्य विज्ञानस्य परमात्मनः कारणस्य वा = Of the true knowledge, of God. (प्रेषा:) ये प्रकृष्टमिष्यन्ते बोधसमूहाः = Desirable knowledge. (चिकित्वान) ज्ञानवान् = Englightened person.
Purport [भावार्थ - स्वामी दयानन्द]
There is Shleshalankara or double entendre. Men should know that without God, from inanimate matter nothing can be produced, nothing can stand without a support. No one can remain without any action. Those learned persons who give education and other good virtues to the people and receive knowledge from others, should be respected and not others.
Subject of the mantra
Then, how that God and scholar are/This has been preached in this mantra.
Etymology and English translation based on Anvaya (logical connection of words) of Maharshi Dayanad Saraswati (M.D.S)-
(yena) =by whom, (īśvareṇa) =by god, (vidyutā) =by celestial electricity, (viśve) =all, [vastueṁ]= things, (preṣāḥ)=groups that provide knowledge of what is deeply desired, (prāpyante)=are obtained, [vaha]=that, (ṛtasya)=by the flow of truth, (dhītiḥ)= is imbibed, (ca) =and, (viśvāyuḥ)= is everlasting, (bhavati) =is, (tam) =his, (āśritya) =taking shelter, (ye) =who, (ṛtasya) =Those who have special knowledge of the true form or the reasons of God, (madhye) =midst, (varttamānā) =present, (vidvāṃsaḥ) =scholars, (apāṃsi) =to act justly, (cakruḥ) =do, (yaḥ) =those, (etat) =this, (vidyām) =to knowledge, (tubhyam) =for you, (dāśāt) =gives fully, (vā) =or, (tava) =your, (sakāśād) =by wealth, (gṛhṇīyāt) =receives, (yaḥ) =who, (cikitvān)=knowledgeable, (te) =for you, {śikṣāt} =gives excellent education, (tubhyam)=for the worshiper of God and for those full of righteousness and effort. (śikṣām) =education, (vā) =or, (dāśāt)=gives this knowledge completely, (tava) =your, (sakāśād) =by wealth, (gṛhṇīyāt) =receives, (tasmai)=for someone with high thoughts, (rayim)=wealth, gold etc. (dayasva) =give.
English Translation (K.K.V.)
The God, through whom celestial electricity and all the things which are deeply desired are made available to the people who provide knowledge for them. He is imbibed by the flow of truth and is everlasting. By taking refuge in Him, those who have special knowledge of the true form or the learned people present in the midst of God's causes, perform their actions in a just manner. Who gives this knowledge completely for you, or accepts it from your proximity. The knowledgeable one, who gives the best education for you. It gives education or complete knowledge to the worshiper of God and to those who have righteous and the gratification of desire, acquirement of wealth, discharge of duty, and final emancipation. He receives from your proximity. Give wealth like property, gold etc. to someone with high thoughts.
TranslaTranslation of gist of the mantra by Maharshi Dayanandtion of gist of the mantra by Maharshi Dayanand
There is paronomasia as a figurative in this mantra. Without God's creation, no work of creation and destruction can take place by human beings due to stupidity. One cannot be able to establish without support, holding and cannot be established without any action. It should be known that one who, being a scholar, gives auspicious qualities like knowledge etc. and only those who accept them, should always be respected and not others.
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