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ऋग्वेद मण्डल - 10 के सूक्त 103 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 10/ सूक्त 103/ मन्त्र 13
    ऋषिः - अप्रतिरथ ऐन्द्रः देवता - इन्द्रो मरुतो वा छन्दः - विराडनुष्टुप् स्वरः - गान्धारः

    प्रेता॒ जय॑ता नर॒ इन्द्रो॑ व॒: शर्म॑ यच्छतु । उ॒ग्रा व॑: सन्तु बा॒हवो॑ऽनाधृ॒ष्या यथास॑थ ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    प्र । इ॒त॒ । जय॑त । न॒रः॒ । इन्द्रः॑ । वः॒ । शर्म॑ । य॒च्छ॒तु॒ । उ॒ग्राः । वः॒ । स॒न्तु॒ । बा॒हवः॑ । अ॒ना॒धृ॒ष्याः । यथा॑ । अस॑थ ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    प्रेता जयता नर इन्द्रो व: शर्म यच्छतु । उग्रा व: सन्तु बाहवोऽनाधृष्या यथासथ ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    प्र । इत । जयत । नरः । इन्द्रः । वः । शर्म । यच्छतु । उग्राः । वः । सन्तु । बाहवः । अनाधृष्याः । यथा । असथ ॥ १०.१०३.१३

    ऋग्वेद - मण्डल » 10; सूक्त » 103; मन्त्र » 13
    अष्टक » 8; अध्याय » 5; वर्ग » 23; मन्त्र » 7
    Acknowledgment

    हिन्दी (3)

    पदार्थ

    (नरः) हे सेनानायको ! (प्र इत) युद्ध के लिये प्रगति करो-प्रकृष्टरूप से जाओ (जयत) जय प्राप्त करो (वः) तुम्हारे लिये (इन्द्र) राजा (शर्म यच्छतु) सुख प्रदान करे-प्रदान करता है-प्रदान करेगा (वः) तुम्हारी (बाहवः) भुजाएँ (उग्राः सन्तु) ऊँचे बलवाली होवें-हैं तथा (अनाधृष्याः) अन्य द्वारा अधर्षणीय और अशिथिल तुम वीर होवो ॥१३॥

    भावार्थ

    सैनिक जनों को युद्ध के लिए जाने में कोई सङ्कोच नहीं करना चाहिये, किन्तु जाकर विजय पाना चाहिये। सैनिकों की भुजाएँ बलवाली हों और शत्रुओं से वे दबाने जानेवाले-हराये जानेवाले न बनें, राजा को शासक को उनके लिए सब प्रकार के सुख की व्यवस्था करनी चाहिये ॥१३॥

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    विषय

    उत्कृष्ट प्रयत्न- प्रशंसनीय श्रम

    पदार्थ

    'नर' शब्द की भावना 'न- रम्' इस संसार में ही न रम जाने की है। संसार में रहते हुए भी इसमें न फँसना - आवश्यकता से अधिक धन की भावना को अपने में दृढमूल न होने देनेवाला मनुष्य ही 'नर' है। ये लोग ही संसार में आकर आध्यात्ममार्ग में भी आगे बढ़ा करते हैं । मन्त्र में कहते हैं कि नरः=अपने को आगे और आगे ले चलनेवाले मनुष्यो ! [नृ नये] (प्रेत) = आगे बढ़ो, यह धन तुम्हारे जीवन यात्रा के मार्ग में रुकावट बनकर न खड़ा हो जाए। (जयत) = इस विघ्न को जीत लो, बस यही तो सबसे बड़ा विघ्न है। इसका मोहक स्वरूप यह है कि "इसके बिना तुम्हारी संसार - यात्रा नहीं चलेगी, नमक भी तो न मिल सकेगा। कोई बन्धु-बान्धव तुम्हें पूछेगा नहीं, समाज में तुम्हारी प्रतिष्ठा न होगी", परन्तु वास्तविकता इससे भिन्न है। धन सीमितरूप में सहायक है, लोभ को जन्म देकर यह महान् विघ्न बन जाता है। वेद कहता है कि (इन्द्रः) = वह सब ऐश्वर्यों का स्वामी प्रभु (वः) = तुम्हें (शर्म यच्छतु) = शरण दे। धन ने क्या शरण देनी। धनों के स्वामी के चरणों की शरण प्राप्त हो जाने पर इस तुच्छ धन का महत्त्व ही क्या रह जाता है ? जब मनुष्य धन का दास नहीं रहता, तब उसे कभी भी टेढ़े-मेढ़े साधनों से नहीं कमाता । वेद का यही आदेश है कि (वः) = तुम्हारे (बाहवः) = प्रयत्न [बाह्र प्रयत्ने] (उग्राः सन्तु) = उत्कृष्ट हों । वस्तुतः धन का दास न रहने पर मनुष्य कभी भी अन्याय्य मार्ग से इसका सञ्चय नहीं करता । वेद कहता है कि प्रभु की शरण पकड़ो - उत्कृष्ट श्रम करो (यथा) = जिससे तुम (अनाधृष्याः) = लोभादि से न कुचले जानेवाले (असथ) = हो जाओ। मनुष्य का यही ध्येय होना चाहिए कि वह कभी अन्याय से अर्थ का संचय करना न चाहे । यही उन्नति का मार्ग है ।

    भावार्थ

    भावार्थ- हम आगे पढ़ें, लोभ को जीतें, प्रभु की शरण ग्रहण करें, उत्कृष्ट श्रम करते हुए ही धनार्जन करें।

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    विषय

    वीरों का प्रोत्साहन।

    भावार्थ

    हे (नरः) वीर नायको ! (प्र इत) आगे बढ़ो। (जयत) विजय लाभ करो। (इन्द्रः) ऐश्वर्यवान् प्रभु, स्वामी (वः शर्म यच्छतु) तुम्हें सुख प्रदान करे। (वः बाहवः) आप लोगों की बाहुएं (उग्राः) ऐसी बलशाली हों (यथा) कि तुम लोग (अनाधण्याः असथ) कभी पराजित न होने वाले होवो। इति त्रयोविंशो वर्गः॥

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    ऋषिरप्रतिरथ ऐन्द्रः॥ देवता—१—३,५–११ इन्द्रः। ४ बृहस्पतिः। १२ अप्वा। १३ इन्द्रो मरुतो वा। छन्दः–१, ३–५,९ त्रिष्टुप्। २ स्वराट् त्रिष्टुप्। ६ भुरिक् त्रिष्टुप्। ७, ११ निचृत् त्रिष्टुप्। ८, १०, १२ विराट् त्रिष्टुप्। १३ विराडनुष्टुप्। त्रयोदशर्चं सूक्तम्॥

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    संस्कृत (1)

    पदार्थः

    (नरः) हे सेनानायकाः ! (प्र इत) युद्धाय प्रगच्छत (जयत) जयं प्राप्नुत (वः) युष्मभ्यं (इन्द्रः) राजा (शर्म यच्छतु) सुखं प्रयच्छति प्रददाति प्रदास्यति वा (वः-बाहवः-उग्राः सन्तु) युष्माकं बाहव उद्गूर्णबलवन्तः सन्ति तथा (अनाधृष्याः) अन्येनाधर्षणीयाः-यथा हि यूयं वीरा भवथ ॥१३॥

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    इंग्लिश (1)

    Meaning

    Go forward, leading lights, achieve your goals and win your victories. May Indra, lord omnipotent of honour and glory, bless you with peace and fulfilment. Let your arms be strong and bold so that you may live an active life of irresistible honour and joy without fear.

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    सैनिकांनी युद्धात जाण्याचा संकोच करता कामा नये तर विजय प्राप्त केला पाहिजे. सैनिकांचे बाहू बलवान असावेत व शत्रूकडून ते दबले जाणारे, हार मानणारे नसावेत. राजा किंवा शासकाने त्यांच्यासाठी सर्व प्रकारच्या सुखाची व्यवस्था केली पाहिजे. ॥१३॥

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