ऋग्वेद - मण्डल 10/ सूक्त 103/ मन्त्र 5
ब॒ल॒वि॒ज्ञा॒यः स्थवि॑र॒: प्रवी॑र॒: सह॑स्वान्वा॒जी सह॑मान उ॒ग्रः । अ॒भिवी॑रो अ॒भिस॑त्वा सहो॒जा जैत्र॑मिन्द्र॒ रथ॒मा ति॑ष्ठ गो॒वित् ॥
स्वर सहित पद पाठब॒ल॒ऽवि॒ज्ञा॒यः । स्थवि॑रः । प्रऽवी॑रः । सह॑स्वान् । वा॒जी । सह॑मानः । उ॒ग्रः । अ॒भिऽवी॑रः । अ॒भिऽस॑त्वा । स॒हः॒ऽजाः । जैत्र॑म् । इ॒न्द्र॒ । रथ॑म् । आ । ति॒ष्ठ॒ । गो॒ऽवित् ॥
स्वर रहित मन्त्र
बलविज्ञायः स्थविर: प्रवीर: सहस्वान्वाजी सहमान उग्रः । अभिवीरो अभिसत्वा सहोजा जैत्रमिन्द्र रथमा तिष्ठ गोवित् ॥
स्वर रहित पद पाठबलऽविज्ञायः । स्थविरः । प्रऽवीरः । सहस्वान् । वाजी । सहमानः । उग्रः । अभिऽवीरः । अभिऽसत्वा । सहःऽजाः । जैत्रम् । इन्द्र । रथम् । आ । तिष्ठ । गोऽवित् ॥ १०.१०३.५
ऋग्वेद - मण्डल » 10; सूक्त » 103; मन्त्र » 5
अष्टक » 8; अध्याय » 5; वर्ग » 22; मन्त्र » 5
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अष्टक » 8; अध्याय » 5; वर्ग » 22; मन्त्र » 5
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भाष्य भाग
हिन्दी (3)
पदार्थ
(बलविज्ञायः) सैन्यबल सम्पन्न करना जाननेवाला (स्थविरः) राजधर्म में प्रवृद्ध ज्येष्ठ श्रेष्ठ (सहस्वान्) साहसवान् (वाजी) बलवान् (उग्रः सहमानः) प्रतापी शत्रुओं पर अभिभूत होनेवाला-प्रभावक (प्रवीरः) प्रकृष्ट वीर (अभिवीरः) इधर-उधर वीरोंवाला-वीरवान् (अभिसत्वा) इधर-उधर युद्ध कुशलवाला (सहोजाः) बल में प्रख्यात (गोवित्) राष्ट्रभूमि को प्राप्त हुआ (इन्द्र) राजन् ! तू (जैत्रं रथम्-आ तिष्ठ) जयसाधन रथ पर विराज ॥५॥
भावार्थ
राजा या शासक राष्ट्रभूमि को प्राप्त करके विमान आदि यान पर यात्रा कर, सेन्यबलों को सम्पन्न करे, राजधर्म में कुशल हो, प्रतापी साहसवान् युद्धकुशल सैनिक से समृद्ध होवे ॥५॥
विषय
जैत्र रथ - विजयी रथ
पदार्थ
'प्रजापति', अर्थात् नेता को कैसा बनना चाहिए, यह इस मन्त्र में इन शब्दों में बतलाते हैं- १. (बलविज्ञायः) = तू बल के कारण प्रसिद्ध - known for shis vigour तथा २. (गोवित्) = [गाव:- वेदवाच:] वेदवाणियों को जानने व प्राप्त करनेवाला बनकर (जैत्रं रथमातिष्ठ) = विजयशील रथ पर आरूढ़ हो । शरीर ही रथ है जो जीवन-यात्रा की पूर्ति के लिए दिया गया है। जीवन - यात्रा की पूर्ति के लिए बल व ज्ञान दोनों ही तत्त्व आवश्यक हैं। बल रजोगुण का प्रतीक है और ज्ञान सत्त्वगुण का । केवल सत्त्व व केवल रज से नहीं, अपितु दोनों के समन्वय से ही सफलता मिलनी है। इसी बात को मन्त्र में ३-४ (अभिवीरः अभिसत्वा) = इन शब्दों से पुन: कहा है, वीरता की ओर चलनेवाला और सत्त्व की ओर चलनेवाला । सत्त्व का लक्षण ज्ञान है । एवं, वीरता व ज्ञान का अपने में समन्वय करनेवाला ही विजयी बनता है। प्रारम्भ 'बलविज्ञाय: 'शक्ति से है और समाप्ति 'गोवित्’= ज्ञान से है । बल और ज्ञान =क्षत्र और ब्रह्म मिलकर हमें विजयी बनाएँगे। वीरता की ओर चलो - सत्त्वगुण की ओर चलो तथा ५. (स्थविर:) = स्थिर मति का बनना। डाँवाँडोल व्यक्ति कभी विजयी नहीं होता । ६. (प्रवीरः) = प्रकृष्ट वीर बनना, कायर नहीं। क्या कायर कभी जीतता है ? ७. (सहस्वान्) = सहनशील - Tolerant बनें। छोटी-छोटी बातों से क्षुब्ध हो गये तो सफल न हो पाएँगे। ८. ९. (सहमान: उग्रः) = हम शत्रुओं का पराभव करनेवाले बनें, परन्तु उग्र उदात्त बने रहें- कमीनेपन पर कभी न उतर आएँ और सबसे बड़ी बात यह कि १० (सहौजाः) = हम एकता के बलवाले हों-हम परस्पर मिलकर चलें। सारा विज्ञान हमारा कल्याण तभी करेगा जब हम संज्ञानवाले होंगे। 'संघ में शक्ति है', इस तत्त्व को हम कभी भूल न जाएँ । घर में पति-पत्नी का मेल होता है तो वहाँ अवश्य सफलता उपस्थित होती है । ११. वाजी='Sacrifice'= त्यागवाला । त्याग के बिना विजय सम्भव नहीं- मेल भी सम्भव नहीं । एवं प्रस्तुत मन्त्र में विजय प्राप्ति के ११ तत्त्वों का प्रतिपादन हुआ है। इनको अपनाकर हम सच्चे प्रजापति बनें।
भावार्थ
भावार्थ- हमारे जीवन का एक सिरा शक्ति हो और दूसरा ज्ञान । इनके द्वारा हम यथार्थ प्रजापति बनें ।
विषय
सेनापति के कर्त्तव्य।
भावार्थ
हे (इन्द्र) ऐश्वर्यवान् ! तू (बल-विज्ञायः) सब बलों को विशेष रूप से जानने वाला, सेना बल, और शस्त्रास्त्र, यन्त्रादि बलों का उत्तम ज्ञाता हो। (स्थविरः) तू महान्, ज्ञान-वृद्ध, अनुभव वृद्ध और युद्ध में स्थिर, (प्रवीरः) उत्तम वीर्यवान्, शूरवीर, बलवान् पुरुषों से सम्पन्न, (सहस्वान्) शत्रु विजयकारी बल से सम्पन्न, (वाजी) बल, ज्ञान, धन का स्वामी, (सहमानः) शत्रु दल का पराजय करता हुआ, (उग्रः) अति तीक्ष्ण, भयंकर, (अभिवीरः) वीरों से घिरा हुआ वा वीर्यवान् पुरुषों को पराजय करने में समर्थ, (अभि-सत्वा) बलवान् पुरुषों से सम्पन्न, (सहोः-जाः) शत्रु पराजयकारी, बल में निष्ठ, उसमें विख्यात, पराक्रमी, (गोवित्) भूमि को युद्धादि से प्राप्त करने वाला, है। हे (इन्द्र) ऐश्वर्यवन् ! शत्रुहन्ता ! तू (जैत्रं रथम्) विजयकारी रथ पर (आतिष्ठ) विराज।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
ऋषिरप्रतिरथ ऐन्द्रः॥ देवता—१—३,५–११ इन्द्रः। ४ बृहस्पतिः। १२ अप्वा। १३ इन्द्रो मरुतो वा। छन्दः–१, ३–५,९ त्रिष्टुप्। २ स्वराट् त्रिष्टुप्। ६ भुरिक् त्रिष्टुप्। ७, ११ निचृत् त्रिष्टुप्। ८, १०, १२ विराट् त्रिष्टुप्। १३ विराडनुष्टुप्। त्रयोदशर्चं सूक्तम्॥
संस्कृत (1)
पदार्थः
(बलविज्ञायः) सैन्यबलं कर्त्तुं जानाति सः “बलविज्ञायः-यो बलं बलयुक्तं सैन्यं कर्त्तुं जानाति सः” [यजु० १७।३७ दयानन्दः] (स्थविरः) राजधर्मे प्रवृद्धः “स्थविरः-वृद्धो विज्ञानराजधर्म-व्यवहारः” [यजु० १७।३७ दयानन्दः] (सहस्वान्) साहसवान् (वाजी) बलवान् (उग्रः सहमानः) प्रतापी शत्रून्-अभिभवन् सन् (प्रवीरः) प्रकृष्टवीरः (अभिवीरः) अभिगतो वीरैः स वीरवान् (अभिसत्वा) अभितः सत्वानो युद्धकुशलाः यस्य सः “अभिसत्त्वाः-अभितः सत्त्वानो युद्धविद्वांसः…यस्य सः” [यजु० १७।३७ दयानन्दः] (सहोजाः) बलेन प्रख्याताः (गोवित्) राष्ट्रभूमेर्लब्धा सन् (इन्द्र) राजन् ! (जैत्रं रथम्-आ तिष्ठ) जयसाधनं रथमाविराजस्व ॥५॥
इंग्लिश (1)
Meaning
Indra, tactical organiser of deployable forces, venerable, strong, undisturbed and invulnerable, stout and brave, challenging, impetuous, blazing, steadfast, commander of the brave, highly intelligent, valiant, illustrious, pray ascend the chariot of victory over rebellious lands.
मराठी (1)
भावार्थ
राजा किंवा शासक यांनी राष्ट्रभूमीला प्राप्त करून विमान इत्यादी यानाने यात्रा करावी. सैन्यबल संपन्न करावे. राजा राजधर्मात कुशल असावा. पराक्रमी, साहसी, युद्धकुशल सैनिकांनी समृद्ध व्हावे. ॥५॥
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