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ऋग्वेद मण्डल - 10 के सूक्त 125 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 10/ सूक्त 125/ मन्त्र 6
    ऋषिः - वागाम्भृणी देवता - वागाम्भृणी छन्दः - निचृत्त्रिष्टुप् स्वरः - धैवतः

    अ॒हं रु॒द्राय॒ धनु॒रा त॑नोमि ब्रह्म॒द्विषे॒ शर॑वे॒ हन्त॒वा उ॑ । अ॒हं जना॑य स॒मदं॑ कृणोम्य॒हं द्यावा॑पृथि॒वी आ वि॑वेश ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    अ॒हम् । रु॒द्राय॑ । धनुः॑ । आ । त॒नो॒मि॒ । ब्र॒ह्म॒ऽद्विषे॑ । शर॑वे । हन्त॒वै । ऊँ॒ इति॑ । अ॒हम् । जना॑य । स॒ऽमद॑म् । कृ॒णो॒मि॒ । अ॒हम् । द्यावा॑पृथि॒वी इति॑ । आ । वि॒वे॒श॒ ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    अहं रुद्राय धनुरा तनोमि ब्रह्मद्विषे शरवे हन्तवा उ । अहं जनाय समदं कृणोम्यहं द्यावापृथिवी आ विवेश ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    अहम् । रुद्राय । धनुः । आ । तनोमि । ब्रह्मऽद्विषे । शरवे । हन्तवै । ऊँ इति । अहम् । जनाय । सऽमदम् । कृणोमि । अहम् । द्यावापृथिवी इति । आ । विवेश ॥ १०.१२५.६

    ऋग्वेद - मण्डल » 10; सूक्त » 125; मन्त्र » 6
    अष्टक » 8; अध्याय » 7; वर्ग » 12; मन्त्र » 1
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    हिन्दी (4)

    पदार्थ

    (ब्रह्मद्विषे) ब्राह्मणों के प्रति द्वेष करनेवाले (रुद्राय) क्रूर (शरवे) हिंसक को (हन्तवै-उ) हनन करने के हेतु (अहं धनुः-आ तनोमि) मैं धनुषशस्त्र को साधती हूँ (अहं जनाय) जनहितार्थ (समदं कृणोमि) मैं अहङ्कारी के साथ संग्राम करती हूँ (अहं द्यावापृथिवी) मैं द्यावापृथिवी में भलीभाँति (आ विवेश) प्रविष्ट होकर रहती हूँ ॥६॥

    भावार्थ

    पारमेश्वरी ज्ञानशक्ति ब्राह्मण के प्रति द्वेष करनेवाले क्रूर हिंसक जन को हनन करने के लिये धनुषशस्त्र को सिद्ध करना चाहिये और संग्राम में चलाना चाहिये। वह द्यावापृथिवीमय सब जगत् में आविष्ट होकर वर्त्तमान है ॥६॥

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    विषय

    अन्तः संग्राम व बहि संग्राम के करनेवाले प्रभु

    पदार्थ

    [१] राष्ट्र में प्रजाओं के कष्टों का निवारण करनेवाला राजा रुद्र है [ रुत् कष्टं द्रावयति ] । यह अपने धनुष् से प्रजा पीड़कों का संहार करता है। इसके लिए इन धनुष् आदि साधनों को प्राप्त करानेवाले प्रभु ही हैं । (अहम्) = मैं ही (रुद्राय) = इस प्रजा कष्ट विद्रावक राजा के लिए (धनुः) = धनुष को (आतनोमि) = ज्या इत्यादि से युक्त करता हूँ। जिससे वह राजा ब्रह्मद्विषे ज्ञान के साथ प्रीति न रखनेवाले (शरवे) = हिंसक पुरुष के हन्तवा उ निश्चय से हनन के लिए समर्थ हो सके। इस प्रकार राजा राष्ट्र की उन्नति में विघ्नभूत लोगों को उचित दण्ड देने का सामर्थ्य उस प्रभु से ही प्राप्त करता है । [२] लोगों का जो अपने अन्तःशत्रु काम-क्रोधादि से युद्ध चलता है उस युद्ध में भी प्रभु ही विजय प्राप्त कराते हैं। (अहम्) = मैं ही जनाय लोगों के लिए (समदम्) = [समत् = संग्राम] संग्राम को (कृणोमि) = करता हूँ । प्रभु ही इन कामादि शत्रुओं का संहार करते हैं। (अहम्) = मैं ही द्यावापृथिवी आविवेश सम्पूर्ण द्युलोक व पृथिवी लोक में व्याप्त हो रहा हूँ। सर्वत्र मेरी शक्ति ही काम कर रही है।

    भावार्थ

    भावार्थ - राजा को राष्ट्रपालन की शक्ति प्रभु से ही प्राप्त होती है। एक मनुष्य को काम- क्रोधादि को जीतने की शक्ति भी प्रभु ही देते हैं।

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    विषय

    वाग् आम्भृणी। परमात्मा का आत्मशक्ति वर्णन। आत्म विभूति प्रकाश।

    भावार्थ

    (अहं) मैं (ब्रह्मद्विषे शरवे) ब्राह्मणों, वेद, और प्रभु को प्रेम न करने वाले हिंसक शत्रुवर्ग को (हन्तवे) नाश करने के लिये (रुद्राय धनुः) दुष्टों को रुलाने वाले क्षात्र वर्ग के धनुष को (आ तनोमि) सर्वत्र तानता हूं, (अहं) मैं (जनाय) मनुष्यों के उपकार के लिये (स-मदं कृणोमि) हर्ष प्राप्त करने के अवसर वा संग्राम को करता हूँ, (अहम्) मैं (द्यावा पृथिवी आ विवेश) आकाश और भूमि दोनों को व्यापता हूँ।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    ऋषिर्वाग् आम्भृणी॥ देवता—वाग् आम्भृणी॥ छन्द:- १, ३, ७, ८ विराट् त्रिष्टुप्। ४, ५ त्रिष्टुप्। ६ निचृत् त्रिष्टुप्। २ पादनिचृज्जगती। अष्टर्चं सूक्तम्॥

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    मन्त्रार्थ

    (ब्रह्मद्विषे रुद्राय शरवे) ब्राह्मण-वेदज्ञ के प्रति द्वेष करने वाले क्रूर हिंसक का (हन्तवै-उ) हनन करने के लिए (अहं धनु:-आतनोमि) मैं धनुष को तानती हूं (अहं जनाय) मैं जनमात्र के हितार्थ (समदं कृणोमि) अहितैषी के साथ संग्राम करती हूं (अहं द्यावापृथिवी-आविवेश) मैं द्युलोक से पृथिवीलोक तक में प्रविष्ट हो रही हूँ ॥६॥

    विशेष

    ऋषिः- वागाम्भृणी "अम्भृणः महन्नाम" [ निघ० ३।३ महान् परमात्मा की प्रचारिका व्यक्ति ] देवता-वागम्भृणी (परमात्मा की ज्ञानशक्ति पारमेश्वरी अनुभूति)

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    संस्कृत (1)

    पदार्थः

    (ब्रह्मद्विषे रुद्राय शरवे) ब्राह्मणानां द्वेष्टारं क्रूरं हिंसकम् ‘सर्वत्र द्वितीयायां चतुर्थी व्यत्ययेन’ (हन्तवै-उ) हन्तुं खलु “तुमर्थे से… तवैतवेङ्तवेनः” [अष्टा० ३।४।९] इति तवै प्रत्ययः (अहं धनुः-आ तनोमि) अहं धनुः साधयामि (अहं जनाय समदं कृणोमि) अहं जनमात्राय-जनहितार्थे तदहितकारिणा सह सङ्ग्रामं करोमि ‘सम् पूर्वकात्’ “मद तृप्तियोगे” [चुरादि०] क्विप्-अन्योऽन्यस्य रक्तपातं कृत्वा ‘सम्यक् तृप्यन्ति यत्र स सङ्ग्रामः’ (अहं द्यावापृथिवी) (आ विवेश) अहं द्युलोकपृथिवीलोकञ्च समन्तात्प्रविश्य तिष्ठामि ॥६॥

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    इंग्लिश (1)

    Meaning

    I draw the bow for Rudra, powers of justice and punishment, to eliminate the forces of hate and violence against lovers and observers of piety and divinity. I fight for the people and create felicity and joy for them, and I reach and pervade the heaven and earth.

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    पारमेश्वरी ज्ञानशक्ती ब्राह्मणांचा द्वेष करणाऱ्या क्रूर हिंसक लोकांचे हनन करण्यासाठी धनुष्यबाण धारण करते व युद्धात अहंकारी लोकांबरोबर युद्ध करते. ती द्यावा पृथ्वीमय सर्व जगात प्रविष्ट असते. ॥६॥

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