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ऋग्वेद मण्डल - 10 के सूक्त 146 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 10/ सूक्त 146/ मन्त्र 5
    ऋषिः - देवमुनिरैरम्मदः देवता - अरण्यानी छन्दः - निचृदनुष्टुप् स्वरः - गान्धारः

    न वा अ॑रण्या॒निर्ह॑न्त्य॒न्यश्चेन्नाभि॒गच्छ॑ति । स्वा॒दोः फल॑स्य ज॒ग्ध्वाय॑ यथा॒कामं॒ नि प॑द्यते ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    न । वै । अ॒र॒ण्या॒निः । ह॒न्ति॒ । अ॒न्यः । च॒ । इत् । न । अ॒भि॒ऽगच्छ॑ति । स्वा॒दोः । फल॑स्य । ज॒ग्ध्वाय॑ । य॒था॒ऽकाम॑म् । नि । प॒द्य॒ते॒ ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    न वा अरण्यानिर्हन्त्यन्यश्चेन्नाभिगच्छति । स्वादोः फलस्य जग्ध्वाय यथाकामं नि पद्यते ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    न । वै । अरण्यानिः । हन्ति । अन्यः । च । इत् । न । अभिऽगच्छति । स्वादोः । फलस्य । जग्ध्वाय । यथाऽकामम् । नि । पद्यते ॥ १०.१४६.५

    ऋग्वेद - मण्डल » 10; सूक्त » 146; मन्त्र » 5
    अष्टक » 8; अध्याय » 8; वर्ग » 4; मन्त्र » 5
    Acknowledgment

    हिन्दी (3)

    पदार्थ

    (अरण्यानिः) अरण्यानी (न वै-हन्ति) किसी को नहीं मारती है (अन्यः-चेत्) अन्य यदि (न-अभिगच्छति) नहीं आक्रमण करे (स्वादु फलं जग्ध्वाय) स्वादु फल को खाकर (यथाकामं नि पद्यते) यथेष्ट अपने घर को चला जाता है ॥५॥

    भावार्थ

    अरण्यानी किसी को मारती नहीं है अर्थात् उसमें रहनेवाले जंगली पशु किसी को नहीं मारते हैं, यदि कोई उन पर आक्रमण नहीं करे। अरण्यानी में वन्य फल भी खाने को मिलते हैं ॥५॥

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    विषय

    अहिंसा

    पदार्थ

    [१] (अरण्यानिः) = गति व ज्ञान में उत्तम यह वनस्थ पुरुष (वा) = निश्चय से (न हन्ति) = हिंसा नहीं करता है, (चेत्) = यदि (अन्यः) = दूसरे हिंस्र पशु (न अधिगच्छति) = इस पर आक्रमण नहीं करते । यह शिकार आदि के शौक से इन पशुओं का कभी हिंसन नहीं करता। यदि अचानक कोई हिंस्र पशु आश्रम में उपद्रव ही कर दे, तब तो उससे रक्षण आवश्यक होता ही है । [२] यह वनस्थ पुरुष (स्वादोः फलस्य जग्ध्वाय) = वन के स्वादिष्ट फलों को खाकर (यथाकामम्) = प्रभु की कामना के अनुसार (निपद्येत) = [पद् गतौ] निश्चय से कार्यों में प्रवृत्त रहता है। 'सादा खाना, सतत कार्यों में प्रवृत्त रहना' यह इसका जीवनसूत्र बन जाता है।

    भावार्थ

    भावार्थ -वनस्थ पुरुष अहिंसा की वृत्ति से चलता है। यह सादा भोजन करता हुआ सतत कार्य प्रवृत्त रहता है।

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    विषय

    उसमें ईश्वरोपासना का कर्त्तव्य। उसकी अहिंसा व्रत की साधना।

    भावार्थ

    (अरण्यानिः) वानप्रस्थी, ऋणों से मुक्त दशा के व्रतों का पालक पुरुष (न वै हन्ति) किसी की हिंसा नहीं करता। और (अन्यः इत् च) दूसरा कोई भी शत्रु होकर (न अभि गच्छति) उस पर आक्रमण नहीं करता। वह (स्वादोः) सुख से आस्वादन करने योग्य, वा अपने ही आत्मा को प्राप्त होने वाले वृक्ष का (फलस्य) फल (जग्ध्वाय) उपभोग करके (यथा-कामम्) अपने उत्तम संकल्प के अनुसार (नि पद्यते) रहता वा लोकान्तर में जाता है।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    ऋषिर्देवमुनिरैरम्मदः॥ देवता—अरण्यानी॥ छन्दः– १ विराडनुष्टुप्। २ भुरिगनुष्टुप्। ३, ५ निचृदनुष्टुप्। ४, ६ अनुष्टुप् ॥ षडृचं सूक्तम्॥

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    संस्कृत (1)

    पदार्थः

    (अरण्यानिः-न वै हन्ति) अरण्यानी न च कमपि हन्ति (अन्यः-चेत्-न अभिगच्छति) यदि कश्चिदन्यो नाक्रामेत् (स्वादुफलं जग्ध्वाय) स्वादु फलं भुक्त्वा (यथा कामं नि पद्यते) यथेष्टं स्वगृहं नियतं प्राप्नोति ॥५॥

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    इंग्लिश (1)

    Meaning

    The forest does not hurt anyone. Whoever goes to the forest without the intent to damage eats the delicious fruit and roams around as he wishes at will.

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    अरण्यानी कुणाला मारत नाही. अर्थात, त्यात राहणारे जंगली पशू कुणाला मारत नाहीत. त्यांच्यावर आक्रमण न केल्यास. अरण्यानीमध्ये वन्य फळेही खाण्यासाठी मिळतात. ॥५॥

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